हनुमानजी और विभीषण का संवाद: नमस्कार भक्तों! आज हम एक महत्वपूर्ण और रहस्यमयी प्रसंग पर चर्चा करेंगे, जो अहंकारी रावण की लंका दहन से जुड़ा हुआ है। यह कहा जाता है कि वीर हनुमानजी ने अपनी पूंछ से लंका को जलाकर रावण के अहंकार को तोड़ दिया था। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी ने लंका को पूरी तरह से अग्नि के हवाले नहीं किया था? दरअसल, लंका का एक हिस्सा ऐसा था जिसे उन्होंने जानबूझकर नहीं जलाया। अगर आप इस रहस्य की सच्चाई जानना चाहते हैं, तो आगे पढ़िए।
हनुमानजी ने अशोक वाटिका क्यों नहीं जलाई?
जब हनुमानजी ने लंका का दहन किया, तो उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहीं पर माता सीता को रखा गया था। इसके अलावा, उन्होंने विभीषण के भवन को भी इसलिए नहीं जलाया क्योंकि वहां तुलसी का पौधा लगा हुआ था और द्वार पर भगवान विष्णु के शंख, चक्र और गदा का पावन चिन्ह अंकित था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि विभीषण के भवन के ऊपर ‘राम’ नाम अंकित था, जिसे देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को जलाने से परहेज किया।
हनुमानजी का विभीषण के प्रति दृष्टिकोण
जब विभीषण ने श्रीराम की शरण मांगी, तो सुग्रीव ने उन्हें शत्रु का भाई और दुष्ट मानकर पकड़कर दंड देने की सलाह दी। इस पर हनुमानजी ने विभीषण को दुष्ट नहीं बल्कि शिष्ट बताया और श्रीराम से उनके शरण देने की वकालत की। हालांकि, श्रीराम ने सुग्रीव के प्रस्ताव को अनुचित बताया, लेकिन हनुमानजी ने विभीषण को शरण देना उचित समझा और उन्हें शिष्ट मानने पर जोर दिया।
हनुमानजी की सलाह
हनुमानजी ने कहा कि विभीषण ने विनम्रता के साथ शरण की याचना की है और ऐसा करने वालों को मैं हमेशा अभयदान देता हूं। यह मेरा व्रत है, इसलिए विभीषण को शरण दी जानी चाहिए।
विभीषण का हनुमानजी के प्रति समर्पण
इंद्रादि देवताओं के बाद, धरती पर सर्वप्रथम विभीषण ने ही हनुमानजी की शरण ली थी और उनकी स्तुति की थी। विभीषण को भी हनुमानजी की तरह चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त हुआ है। विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में ‘हनुमान वडवानल स्तोत्र’ की रचना की, जो आज भी अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है।
समापन
यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि हनुमानजी की शरण में आने से सभी प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है। जैसा कि विभीषण को हनुमानजी की शरण में आकर शांति और सुरक्षा प्राप्त हुई, वैसे ही भक्तों को भी श्री हनुमानजी की शरण में रहने से सुख और समृद्धि मिलती है।