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मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान: मेहंदी पर विवाद

मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान: लठ पूजन से शुरू हुई ये पहल

मुजफ्फरनगर में 'लठ जिहाद' का ऐलान: लठ पूजन के दौरान हिंदूवादी नेताओं का लठ जिहाद ऐलान, करवा चौथ पर मेहंदी विवाद
मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान: पूजन के बाद लठ का प्रदर्शन करते लोग

मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हाल ही में हिंदूवादी नेताओं ने एक अनोखा ऐलान किया है। करवा चौथ के मौके पर ‘लठ जिहाद’ की घोषणा करते हुए ‘संयुक्त हिंदू मोर्चा’ ने खुलेआम मुस्लिम युवकों को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने हिंदू महिलाओं को मेहंदी लगाई, तो लठ तैयार है। ‘लठ पूजन’ के नाम पर लाठियों की पूजा कर, मोर्चा के नेताओं ने गुरुवार से इस नए अभियान की शुरुआत की। इसके साथ ही, “पहले निवेदन, फिर आवेदन और अगर तब भी नहीं माने, तो दे-दनादन” का नारा भी दिया गया।

इस घटना ने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इस मसले को गहराई से देखने पर कई सवाल खड़े होते हैं। क्या वाकई ये सही तरीका है? क्या हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के साथ भारत की गंगा-जमुनी तहजीब इस तरह की पहल से खतरे में पड़ रही है?

मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान:  धार्मिक रंग या हास्य का पुट?

मुजफ्फरनगर के पुराने तहसील मार्केट में आयोजित इस ‘लठ पूजन’ कार्यक्रम ने लोगों के बीच खासा कौतूहल पैदा किया। मोटी-मोटी लाठियों की मंत्रोच्चारण के साथ पूजा की गई, जोकि आमतौर पर किसी लड़ाई या आत्मरक्षा के लिए होती है। मजेदार बात यह है कि इस आयोजन में धार्मिक विचारधारा को एक तरह से हास्यास्पद रंग दे दिया गया।

संयुक्त हिंदू मोर्चा के संस्थापक मनोज सैनी ने इसे ‘लठ जिहाद’ का नाम देते हुए साफ शब्दों में कहा कि “पहले निवेदन, फिर आवेदन, और फिर दे-दनादन”। इस कथन ने कई लोगों को हंसी में डाल दिया, लेकिन सवाल यह है कि समाज में ऐसी बातों का प्रभाव क्या होगा? क्या ऐसी सोच से हम अपने समाज को जोड़ सकते हैं या केवल धर्म के नाम पर अलगाव पैदा कर रहे हैं?

मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान: मेहंदी विवाद वास्तविक समस्या या अतिशयोक्ति?

हिंदूवादी संगठनों का कहना है कि मुस्लिम युवक अपनी पहचान छिपाकर हिंदू महिलाओं को मेहंदी लगाने की कोशिश करते हैं, जिसे उन्होंने ‘मेहंदी जिहाद’ का नाम दिया है। यह दावा सुनने में जितना अजीब लगता है, उतना ही हास्यप्रद भी है। इस तरह के आरोपों से क्या वाकई समाज में असली मुद्दों पर ध्यान दिया जा रहा है, या फिर ऐसे बेबुनियाद मुद्दे उठाकर हम समाज में नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं?

हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच आए दिन इस तरह की तकरारें होती रहती हैं, लेकिन यह जरूरी है कि हम ऐसे मसलों को गंभीरता से न लें, बल्कि उन्हें तर्कसंगत और शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाएं।

प्रशासन की नाकामी या समाज की सोच में बदलाव?

इस पूरे मामले में प्रशासन की भी थोड़ी बहुत नाकामी साफ नजर आती है। अगर समय रहते प्रशासन ने ऐसे संगठनों की हरकतों पर रोक लगाई होती, तो शायद ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती। बावजूद इसके, हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर क्यों हमारे समाज में धार्मिक विभाजन इतना गहरा हो रहा है। क्या प्रशासन पूरी तरह से ऐसे मुद्दों पर ध्यान दे रहा है, या फिर समाज में बढ़ती नफरत पर अंकुश लगाने में वो विफल हो रहा है?

गंगा-जमुनी तहजीब को भूलता समाज

मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान: भारत हमेशा से अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता रहा है, जहां हिंदू-मुस्लिम मिलकर त्योहार मनाते थे, साथ में खुशियां बांटते थे। लेकिन इस तरह के विवाद इस आपसी भाईचारे को कमजोर कर रहे हैं। मेहंदी जैसे त्योहारों को धर्म के चश्मे से देखना हमारी परंपराओं को और भी पेचीदा बना देता है। क्या ये वही समाज है, जिसने एकता में अनेकता का पाठ पढ़ा है?

क्या यह असली मुद्दा है या केवल शोशेबाजी?

हिंदूवादी नेताओं का यह अभियान असल में क्या सिखाता है? क्या यह समाज को सही दिशा में ले जा रहा है, या फिर केवल धार्मिक विद्वेष फैला रहा है? लठ पूजन जैसे अनोखे और मजाकिया घटनाओं के पीछे असली मकसद क्या है, इसे समझना जरूरी है। लठ पूजा और ‘दे-दनादन’ जैसी धमकियों से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। इससे केवल विभाजन और बढ़ता है, और वह भी एक ऐसे समाज में जो पहले से ही कई समस्याओं से जूझ रहा है।

समाज को क्या सीख लेनी चाहिए?

इस घटना से समाज को यह सीख लेनी चाहिए कि धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों पर संयम रखना जरूरी है। किसी भी तरह की हिंसा, चाहे वह ‘लठ जिहाद’ के नाम पर हो या किसी और नाम पर, समाज के लिए हानिकारक है। पति-पत्नी के रिश्ते हों, या फिर हिंदू-मुस्लिम के आपसी संबंध, हर रिश्ते में प्यार, विश्वास और आपसी समझ की जरूरत होती है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब ही उसकी असली पहचान है, और इसे बचाने के लिए हमें धार्मिक कट्टरता से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत है।

इस घटना को हल्के मजाकिया तरीके से देखते हुए यह कह सकते हैं कि लठ जिहाद का यह अनोखा तरीका शायद ही किसी समस्या का समाधान करेगा। बल्कि यह उन गंभीर मुद्दों से हमारा ध्यान भटकाने का एक जरिया है, जिन्हें हमें सुलझाने की जरूरत है।मुजफ्फरनगर में ‘लठ जिहाद’ का ऐलान।

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