अयोध्या में वनवास समाप्त हुए वर्षों बीत चुके थे। प्रभु श्रीराम और माता सीता की कृपा से प्रजा सुखमय जीवन व्यतीत कर रही थी। इसी बीच एक संध्या को सरयू तट पर टहलते हुए भरत ने अपने बड़े भाई श्रीराम से एक गूढ़ प्रश्न किया।
भरत ने कहा — भैया, माता कैकई ने मंथरा के साथ मिलकर जो षड्यंत्र रचा, उसके कारण आपको वनवास और महाराज दशरथ की मृत्यु हुई। क्या यह राजद्रोह नहीं था? और यदि हां, तो आपने उन्हें दंड क्यों नहीं दिया? एक राजा के रूप में आपका निर्णय क्या था?”
श्रीराम मुस्कुराए और उत्तर दिया — भरत, जिस माता ने तुम जैसे धर्मपरायण पुत्र को जन्म दिया हो, उसे दंड कैसे दिया जा सकता है? पर यदि तुम नागरिक के रूप में यह प्रश्न कर रहे हो, तो जान लो कि अपने सगे संबंधियों को कोई दंड न देना ही सबसे कठोर दंड है।
माता कैकई ने अपने अपराध का भार जीवन भर ढोया। उन्होंने पति खोया, पुत्रों का स्नेह खोया और सुख खोया। यह पीड़ा ही उनका सबसे बड़ा दंड रही।”
राम की आंखें नम हो उठीं। उन्होंने आगे कहा — और सोचो भरत, यदि वनवास न होता तो यह संसार भाइयों के स्नेह और समर्पण को कैसे जान पाता? मैंने तो केवल माता-पिता की आज्ञा मानी, पर तुम और लक्ष्मण ने मेरे लिए चौदह वर्ष का वनवास भोगा। यही भ्रातृप्रेम दुनिया के लिए सबसे बड़ा संदेश है।
इस संवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि श्रीराम का जीवन केवल धर्मपालन ही नहीं बल्कि परिवार और समाज के लिए एक गहरा आदर्श भी है। वनवास ने संसार को यह सिखाया कि भाइयों का संबंध केवल रक्त का नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और समर्पण का होता है।