पीलीभीत: नवजात की रहस्यमयी मौत… डॉक्टरों की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल! DM के आदेश पर कब्र से निकाला गया शव, अस्पताल प्रशासन में मचा हड़कंप
पीलीभीत में स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। वह भी इतना बड़ा कि जिलाधिकारी को खुद हस्तक्षेप करना पड़ा, पुलिस बल बुलानी पड़ी, और दफनाए जा चुके नवजात के शव को कब्र से निकालकर पोस्टमॉर्टम कराना पड़ा।
सोचिए… एक मां जिसने 9 महीने अपनी कोख में बच्चा रखा, जब उसने जन्म दिया तो अस्पताल में उसे “बच्चा मर गया” कहकर छुट्टी दे दी गई। परिजनों ने जब नवजात के शरीर पर चोट के निशान देखे और डॉक्टरों से पूछताछ की तो उन्हें जवाब की जगह मिला— अभद्रता, धमकी और जबरन कागजों पर साइन!
यही कारण है कि अब पूरा मामला सिर्फ “नवजात की मौत” नहीं रहा, बल्कि एक संभावित चिकित्सीय लापरवाही और जवाबदेही के अभाव की गंभीर कहानी बन गया है।
यह था पूरा मामला – शहर के मैत्री बाग निवासी मृदुल सिन्हा की दास्तान
मैत्री बाग निवासी मृदुल सिन्हा ने 2 दिसंबर को अपनी गर्भवती पत्नी प्रिया सिन्हा को मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महिला अस्पताल में भर्ती कराया था।
3 दिसंबर की सुबह प्रसव हुआ… लेकिन कुछ ही देर बाद अस्पताल ने नवजात की मृत्यु की सूचना दे दी।
यहीं से दर्द और अविश्वास की शुरुआत हुई।
परिजनों का आरोप – नवजात के शरीर पर थे चोट के निशान
मृदुल सिन्हा ने आरोप लगाया कि
नवजात के शरीर पर साफ चोट के निशान थे
स्टाफ ने उनसे कठोर और अभद्र व्यवहार किया
सवाल पूछने पर डराने-धमकाने लगे
और अंत में जबरन कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर प्रसूता को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया
ये आरोप अपने आप में किसी अस्पताल के लिए बहुत गंभीर हैं—
जहां परिजनों को सांत्वना मिलनी चाहिए, वहां उन्हें धमकियां मिलीं।
DM तक पहुंची शिकायत— आखिर क्यों?
परिजन एक हफ्ते से न्याय के लिए भटकते रहे।
लेकिन अस्पताल प्रशासन ने न कोई सुनवाई की, न कोई जवाब।
आखिरकार मृदुल सिन्हा ने जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह से मुलाकात की और पूरे मामले का सच सामने रखा।
आरोप इतने गंभीर थे कि DM ने तुरंत एक्शन लिया और नवजात का पोस्टमॉर्टम करने के आदेश दे दिए।
यह बात खुद बताती है कि मामला कितना संदेहास्पद था।
सवाल यह भी है—
क्या अस्पताल प्रशासन जानबूझकर पोस्टमॉर्टम से बचना चाहता था?
DM के आदेश पर कब्र से शव निकाला गया – पुलिस व प्रशासन की टीम पहुँची मुक्तिधाम
शुक्रवार को
सीओ सिटी दीपक चतुर्वेदी,
नायब तहसीलदार परितोष,
पुलिस फोर्स और प्रशासनिक टीमें
मुक्तिधाम पहुँचीं।
वहां नवजात के शव को कब्र से बाहर निकाला गया और पंचनामा कर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया।
यह कार्रवाई स्पष्ट दिखाती है कि—
नवजात की मौत प्राकृतिक नहीं, संदिग्ध है। और जिला प्रशासन इसे गंभीरता से जांचना चाहता है।
अस्पताल प्रशासन में हड़कंप— डॉक्टरों की कार्यशैली पर क्यों उठे सवाल?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
नवजात के शरीर पर चोट के निशान कैसे पड़े?
प्रसव के बाद तुरंत मौत कैसे हो गई?
पोस्टमॉर्टम से पहले परिवार को क्यों रोका गया?
परिजनों को धमकाने की जरूरत क्यों पड़ी?
अगर अस्पताल सही था, तो वे जांच से क्यों घबरा रहे थे?
अस्पताल प्रशासन की यही चुप्पी और डर इस मामले को और गहरा संदेहास्पद बनाते हैं।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बनेगी सबसे बड़ा सबूत
पुलिस व अधिकारियों ने कहा—
“नवजात की मौत का असली कारण पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद ही साफ होगा।”
अगर चोट या गला दबने, लापरवाही, गलत ट्रीटमेंट, ऑक्सीजन कमी या किसी भी तरह की चिकित्सीय त्रुटि के निशान मिलते हैं, तो मामला सीधे
चिकित्सीय लापरवाही
IPC की गंभीर धाराएं
और अस्पताल प्रशासन पर कड़ी कार्रवाई
की तरफ बढ़ सकता है।
DM ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया —“सत्य छुपेगा नहीं, दोषी कोई भी हो बख्शा नहीं जाएगा”
पीलीभीत जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने पूरे प्रकरण पर गंभीर रुख अपनाते हुए कहा कि परिजनों द्वारा प्रसव के दौरान चिकित्सीय लापरवाही के आरोप बेहद संवेदनशील और चिंताजनक हैं। उन्होंने बताया कि परिजन नवजात के सिर पर चोटों के निशान होने की बात कह रहे हैं, जिसकी पुष्टि हेतु प्रशासन ने कब्र से शव निकलवाकर पोस्टमॉर्टम कराने का निर्णय लिया। DM ने स्पष्ट चेतावनी दी कि “यदि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में परिजनों के आरोपों की पुष्टि होती है, तो दोषी डॉक्टरों और संबंधित स्टाफ पर सबसे कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाएगी। किसी भी हाल में लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
यह बयान साफ दर्शाता है कि जिला प्रशासन इस मामले को सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि गंभीर नैतिक और चिकित्सीय जवाबदेही का सवाल मानकर जांच को पूरी पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ा रहा है।
अस्पतालों में लापरवाही का बढ़ता खतरा— समाज के लिए बड़ी चेतावनी
यह घटना एक संकेत है कि
हमारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में कितनी खामियां,
कितना अव्यवस्थित प्रबंधन,
और कितनी जवाबदेही की कमी है।
जब एक नवजात की मौत तक को सामान्य मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल है।
क्यों यह मामला सिर्फ “नवजात मौत” नहीं बल्कि “सिस्टम की लापरवाही” का आइना है?
यह घटना बताती है कि
मरीजों की सुरक्षा
अस्पतालों की पारदर्शिता
डॉक्टरों की जवाबदेही
और स्वास्थ्य व्यवस्था के मानक
सभी पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
DM द्वारा कब्र से शव निकलवाना यह साबित करता है कि मामला बेहद गंभीर है और किसी भी कीमत पर सच्चाई सामने लानी ही लानी है।
पीलीभीत पुलिस और प्रशासन अब इस पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है—
जो यह तय करेगी कि नवजात की मौत प्राकृतिक थी या लापरवाही का परिणाम।