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‘मनोज भावुक’ ने भावुक कर दिया नालंदा फेस्टिवल, ‘भोजपुरी’ भाषा को लेकर जो कहा.. सिनेमा-सरकारें, दोनों पर ‘?’

nalanda-literature-festival-2025-manoj-bhavuk-bhojpuri-language-voice

भारतीय सिनेमा अगर सच में भारत की आवाज़ बनना चाहता है, तो उसे महानगरों की भाषा से बाहर निकलकर गांव, कस्बों और खेत-खलिहानों की बोली को अपनाना होगा। यही बात नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल 2025 में भोजपुरी सिनेमा के इतिहासकार और गीतकार मनोज भावुक ने बेहद सधे, लेकिन तीखे शब्दों में कही। उनकी बातों ने सिर्फ तालियां नहीं बटोरीं, बल्कि एक गंभीर बहस को भी जन्म दिया।

नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल में उठी भाषा की आवाज़

राजगीर कन्वेंशन सेंटर में आयोजित नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल के ‘Words to Screen’ सत्र में मनोज भावुक ने भारतीय सिनेमा और भाषाओं के रिश्ते पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका होती है।

“संवाद नहीं, पूरा जीवन बोलता है”

मनोज भावुक ने कहा—

“जब हम अपनी बोलियों के साथ पर्दे पर आते हैं, तो संवाद नहीं, पूरा जीवन बोलता है। अगर सिनेमा भाषाई विविधता को अपनी ताकत बना ले, तो वह ज्यादा लोकतांत्रिक, समावेशी और सच में भारतीय बन सकता है।”

उनके मुताबिक, सिनेमा तभी जनता से जुड़ेगा जब वह जनता की भाषा में बोलेगा।

भोजपुरी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों?

मनोज भावुक ने भोजपुरी भाषा के साथ हो रहे भेदभाव पर सीधा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब एक ही देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली संस्कृत, मराठी, नेपाली, संथाली, डोगरी और मणिपुरी जैसी भाषाओं को संवैधानिक मान्यता मिल सकती है, तो फिर 30 करोड़ से अधिक लोगों की भाषा भोजपुरी को यह हक क्यों नहीं?

लिपि बहाना नहीं, नीयत का सवाल

उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भोजपुरी ने अपनी प्राचीन लिपि कैथी और महाजनी छोड़कर देवनागरी को अपनाया, फिर भी उसे भाषा नहीं बल्कि ‘बोली’ कहकर हाशिये पर रखा गया। मनोज भावुक के अनुसार, यह सिर्फ लिपि का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सोच का मामला है।

सिनेमा को जड़ों से जोड़ने की अपील

मनोज भावुक ने कहा कि अगर भारतीय सिनेमा अपनी जड़ों से कट जाएगा, तो वह सिर्फ बाजार का उत्पाद बनकर रह जाएगा। लेकिन अगर वह भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली जैसी भाषाओं को सम्मान देगा, तो उसकी आत्मा मजबूत होगी।

भाषा से बनेगा समावेशी भारत

उनकी बातों का सार यही था कि भाषा को छोटा या बड़ा कहने की सोच ही गलत है। हर भाषा अपने साथ संस्कृति, इतिहास और समाज लेकर आती है। सिनेमा अगर इन्हें जगह देता है, तो वह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम भी बन सकता है।

मनोज भावुक का स्पष्ट संदेश

मनोज भावुक का संदेश साफ था—
भाषा को सम्मान दीजिए, सिनेमा अपने आप समृद्ध हो जाएगा।
उनकी यह बात न सिर्फ फिल्मकारों के लिए, बल्कि नीति-निर्माताओं और समाज के हर उस व्यक्ति के लिए है, जो भारतीय भाषाओं की असली ताकत को समझना चाहता है।