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Manipur Violence: 6 नागा युवकों की लाशें मिलीं, फिर भड़की मणिपुर की आग.. महिलाओं को बनाया जा रहा ‘ह्यूमन शील्ड’

Manipur Violence: 6 नागा युवकों की लाशें मिलीं, फिर भड़की मणिपुर की आग.. महिलाओं को बनाया जा रहा 'ह्यूमन शील्ड'

Manipur Violence: मणिपुर एक बार फिर हिंसा की आग में झुलस रहा है। पिछले करीब एक महीने से कुकी और नागा समुदायों के बीच खूनी संघर्ष जारी है। हालात तब और बिगड़ गए जब 13 मई को अगवा किए गए 6 नागा युवकों के शव बरामद हुए। इसके बाद सेनापति, कांगपोकपी और उखरुल जिलों में तनाव हिंसक रूप ले चुका है। अपहरण, हत्याएं, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि 2023 की तरह इस बार मणिपुर हिंसा पर न तो दिल्ली में राजनीतिक हलचल दिख रही है और न ही विपक्ष का कोई बड़ा विरोध नजर आ रहा है।

6 नागा युवकों के शव मिलने के बाद फिर भड़की हिंसा

13 मई को अगवा किए गए छह नागा युवकों के शव बुधवार को बरामद किए गए। शवों को पोस्टमार्टम के लिए इम्फाल स्थित जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज भेजा गया।

जैसे ही यह खबर पहाड़ी जिलों तक पहुंची, माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। सोशल मीडिया पर कुकी गांवों में आगजनी के वीडियो वायरल होने लगे, जबकि सेनापति में नागा पीपुल्स फ्रंट के कार्यालय में तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं।

आखिर कुकी और नागा समुदायों में संघर्ष क्यों हो रहा है?

मणिपुर की भौगोलिक संरचना में घाटी वाले क्षेत्रों में मुख्य रूप से मैतेई समुदाय रहता है, जबकि पहाड़ी इलाकों में कुकी और नागा जनजातियां निवास करती हैं।

साल 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा हुई थी, लेकिन इस बार संघर्ष पूरी तरह कुकी और नागा समुदायों के बीच है। दोनों समुदायों के बीच जमीन, प्रशासनिक नियंत्रण और पारंपरिक क्षेत्रों पर वर्चस्व को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है।

नागा संगठनों का आरोप है कि कुकी सशस्त्र समूह उनके पारंपरिक इलाकों में अतिक्रमण कर रहे हैं। वहीं मई महीने में चर्च से जुड़े तीन सम्मानित नागा नेताओं की हत्या के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ गए।

अपहरण और बंधक बनाने की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार हिंसा के दौरान दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के नागरिकों का अपहरण किया। बताया जाता है कि 48 से अधिक लोगों को बंधक बनाया गया था।

इनमें महिलाएं, बच्चे और धार्मिक प्रशिक्षण ले रहे युवा पादरी भी शामिल थे। बाद में कुछ लोगों को रिहा कर दिया गया, लेकिन सभी बंधकों की सुरक्षित वापसी नहीं हो सकी। यही वजह रही कि तनाव लगातार बढ़ता गया।

सेना और सुरक्षा बलों के सामने बड़ी चुनौती

मणिपुर में सुरक्षा बलों की स्थिति बेहद जटिल बनी हुई है। चाहे 2023 का मैतेई-कुकी संघर्ष हो या मौजूदा कुकी-नागा हिंसा, विभिन्न समुदायों के उग्रवादी समूह अक्सर सेना और पुलिस को अपने विरोधी के रूप में देखते हैं।

कई उग्रवादी संगठन पड़ोसी देश म्यांमार में भी सक्रिय बताए जाते हैं। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन स्थानीय है और कौन सीमा पार से आया है।

कई जगहों पर सुरक्षा बलों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए हैं। कुछ घटनाओं में सैनिकों पर पेट्रोल बम फेंकने के आरोप भी सामने आए हैं।

महिलाओं को बनाया जा रहा है ‘ह्यूमन शील्ड’

इस हिंसा का सबसे चिंताजनक पहलू महिलाओं का संघर्ष के मोर्चे पर इस्तेमाल किया जाना है।

जब भी सेना या सुरक्षा बल किसी उग्रवादी समूह के खिलाफ कार्रवाई करने पहुंचते हैं, बड़ी संख्या में महिलाएं सड़क पर उतरकर रास्ता रोक देती हैं। इससे सुरक्षा बलों की कार्रवाई प्रभावित होती है क्योंकि वे महिलाओं के खिलाफ बल प्रयोग करने से बचते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कई मामलों में उग्रवादी संगठन महिलाओं को ‘ह्यूमन शील्ड’ के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

2023 की हिंसा और मौजूदा संघर्ष में क्या फर्क है?

साल 2023 में मणिपुर की हिंसा मुख्य रूप से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच थी। उस समय मामला राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया था।

संसद से लेकर टीवी चैनलों तक इस पर व्यापक बहस हुई। विपक्ष ने केंद्र और राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए और अविश्वास प्रस्ताव तक लाया गया।

लेकिन इस बार हालात अलग हैं। वर्तमान संघर्ष कुकी और नागा समुदायों के बीच है, जो दोनों ही जनजातीय समुदाय हैं।

धार्मिक एंगल की चर्चा क्यों हो रही है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हिंसा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कम चर्चा होने की एक वजह इसका धार्मिक स्वरूप भी माना जा रहा है।

2023 की हिंसा में एक पक्ष मुख्य रूप से हिंदू मैतेई समुदाय था और दूसरा पक्ष मुख्य रूप से ईसाई कुकी समुदाय। इसलिए उस संघर्ष को धार्मिक और सांप्रदायिक नजरिए से भी देखा गया।

वहीं वर्तमान संघर्ष में कुकी और नागा दोनों समुदाय मुख्य रूप से ईसाई हैं। ऐसे में इसे हिंदू बनाम ईसाई या बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक संघर्ष के रूप में पेश करना संभव नहीं है। हालांकि हिंसा के कारण जटिल हैं और इनमें जमीन, पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक विवाद जैसे कई पहलू शामिल हैं।

तीन साल से संकट में फंसा है मणिपुर

मणिपुर पिछले तीन वर्षों से लगातार जातीय तनाव और हिंसा का सामना कर रहा है। मई 2023 से शुरू हुई हिंसा में अब तक 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

इसके अलावा 60 हजार से अधिक लोग अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हुए हैं। राज्य में सरकार और प्रशासन लगातार हालात सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पहाड़ी जिलों में अभी भी तनाव बना हुआ है।

मणिपुर में शांति बहाली सबसे बड़ी चुनौती

कुकी-नागा संघर्ष ने साफ कर दिया है कि मणिपुर की समस्या केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यह वर्षों से चले आ रहे जातीय, सामाजिक और राजनीतिक विवादों का परिणाम है।

6 नागा युवकों के शव मिलने के बाद एक बार फिर हिंसा भड़क उठी है और सुरक्षा एजेंसियों के सामने कानून-व्यवस्था बहाल करना बड़ी चुनौती बन गया है। जब तक सभी पक्षों के बीच भरोसा कायम नहीं होता और स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक मणिपुर में शांति की राह आसान नहीं दिख रही।