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पढ़िए श्री राम कथा का एक अंश – अद्भुत है प्रभु श्री राम की लीला – राम राम कह जा – प्रभु श्री राम कह जा

धर्म – इस कथा से जानिए कि देवी देवताओं का अपमान करने के बाद होता है क्या, जल्द पढ़िए
 

धार्मिक कथा – प्रभु श्री राम की लीला में एक अंश में यह भी बताया गया है कि जो भी इंसान अगर किसी देवी या देवता का अपमान करता है तो उसके साथ क्या होता है। इसके लिए प्रभु श्री राम ने एक धोबी को लिया था। जिसने माता सीता के प्रति अपमानित जैसे शब्दों का प्रयोग किया था।

 
फिर आगे पढ़िए पूरी कथा
 
  • जब भगवान श्रीराम अपने धाम को चले उस समय उनके साथ अयोध्या के सभी पशु – पक्षी, पेड़- पौधे मनुष्य भी उनके साथ चल पड़े।

    * उन मनुष्यो में सीता माता की निंदा करने वाला धोबी भी साथ में था।

    * भगवान ने उस धोबी का हाथ अपने हाथ में पकड़ रखा था और उनको अपने साथ लिए चल रहे थे।

    * जिस – जिस ने भगवान को जाते देखा वे सब भगवान के साथ चल पड़े कहते हैं कि वहाँ के पर्वत भी  उनके साथ चल पड़े।

    * सभी पशु पक्षी पेड़ पौधे पर्वत और मनुष्यों ने जब साकेत धाम में प्रवेश होना चाहा तब साकेत का द्वार खुल गया

    * पर जैसे ही उस निंदनीय धोबी ने प्रवेश करना चाहा तो द्वार बंद हो गया।

    * साकेत द्वार ने भगवान से कहा महाराज ! आप भले ही इनका हाथ पकड़ लें पर ये जगत जननी माता सीता जी की निंदा कर चुका है

    * इसलिए ये इतना बड़ा पापी है की मेरे द्वार से साकेत में प्रवेश नही कर सकता।

    * जिस समय भगवान सब को लेकर साकेत जा रहे थे उस समय सभी देवी – देवता आकाश मार्ग से देख रहे थे , कि माता जी की निंदा करने वाले पापी धोबी को भगवान कहां भेजते है।

    * भगवान ने द्वार बन्द होते ही इधर – उधर देखा तो ब्रह्मा जी ने सोचा कि कहीं भगवान इस पापी को मेरे ब्रह्म लोक में न भेज दें ,

    * वे हाथ हिला – हिला कर कहने लगे , महाराज ! इस पापी के लिए मेरे ब्रह्म लोक में कोई स्थान नही है।

    * इंद्र ने सोचा कि कहीं मेरे इन्द्र लोक में न भेज दें , इंद्र भी घबराये , वे भी हाथ हिला – हिला कर कहने लगे , महाराज ! इस पापी के लिए मेरे इन्द्र लोक में भी कोई स्थान नहीं है।

    * ध्रुव जी ने सोचा की कहीं इस पापी को मेरे ध्रुव लोक में भेज दिया तो इसका पाप इतना बड़ा है कि ….

    * इसके पाप के बोझ से मेरा ध्रुव लोक गिर कर नीचे आ जाएगा ऐसा विचार कर ध्रुव जी भी हाथ हिला – हिला कर कहने लगे

    * महाराज ! आप इस पापी को मेरे पास भी मत भेजिएगा।

    * जिन – जिन देवताओं का एक अपना अलग से लोक बना हुआ था उन सभी देवताओं ने उस निंदनीय पापी धोबी को अपने लोक में रखने से मना कर दिया।

    * भगवान खड़े – खड़े मुस्कुराते हुए सब का चेहरा देख रहे हैं पर कुछ बोलते नहीं !!

    * उन देवताओअं की भीड़ में यमराज भी खड़े थे , यमराज ने सोचा की ये किसी लोक में जाने का अधिकारी नही है अब इस पापी को भगवान कहीं मेरे यहाँ न भेज दें

    * और माता की निंदा करने वाले को में अपनी यमपुरी में नहीं रख सकता वे घबराकर उतावली वाणी से बोले ,

    * महाराज ! महाराज ! ये इतना बड़ा पापी है कि इसके लिए मेरी यमपुरी में भी कोई जगह नहीं है।

    * उस समय धोबी को घबराहट होने लगी कि मेरी दुर्बुद्धि ने इतना निंदनीय कर्म करवा दिया की यमराज भी मुझे नहीं रख सकते !

    * भगवान ने धोबी की घबराहट देख कर धोबी की और संकेत से कहा तुम घबराओ मत ! मैं अभी तुम्हारे लिए एक नए साकेत का निर्माण करता हूँ ,

    तब भगवान ने उस धोबी के लिए एक अलग साकेत धाम बनाया।

    यहाँ एक चौपाई आती है !

    सिय निंदक अघ ओघ नसाए ।
    लोक बिसोक बनाइ बसाए ।।

    * ऐसा अनुभव होता है की आज भी वो धोबी अकेला ही उस साकेत में पड़ा है जहा न कोई देवी देवता है न भगवान ,

    * न वो किसी को देख सकता है और न कोई देवता उसको देख सकते हैं।

तात्पर्य यह है कि भगवान अथवा किसी भी देवी देवता की निंदा करने वालों के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है।

ऊं नमो नारायणाय
                 जय सियाराम ….!