UP News: उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में चिकित्सा जगत से लापरवाही का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। डॉक्टरों की बड़ी गलती के कारण एक महिला को अपनी जान गंवानी पड़ी। ऑपरेशन के दौरान महिला के पेट में तौलिया छोड़ दिया गया, जिसके चलते वह पांच महीने तक असहनीय दर्द से तड़पती रही। गरीब परिवार का सारा पैसा इलाज में खर्च हो गया, लेकिन महिला को बचाया नहीं जा सका।
ऑपरेशन के बाद भी नहीं हुआ आराम
दरअसल, पीलीभीत के मिश्राइन गोटिया गांव की रहने वाली खीलावती को ब्लीडिंग की समस्या थी। इलाज के लिए उसे देवीपुरा स्थित जेएमबी मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। जुलाई महीने में डॉक्टर हिमांशु और आशा ने उसका ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के पांचवें दिन महिला को घर भेज दिया गया, लेकिन उसके पेट में दर्द बना रहा।
महिला के पति उमा शंकर ने बताया, “पत्नी के पेट में दर्द कम नहीं हुआ। कई बार हॉस्पिटल ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि पेट में सूजन और जख्म है। 3-4 महीने तक इलाज चला, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।”
तीसरे ऑपरेशन में निकाला गया तौलिया
जब खीलावती की हालत और बिगड़ने लगी, तो परिवार उसे जिला अस्पताल लेकर गया। यहां सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड किया गया, लेकिन डॉक्टरों ने तौलिया होने की बात नहीं बताई। हालत गंभीर होने पर बाहरी डॉक्टरों को सीटी स्कैन दिखाया गया। तब पता चला कि ऑपरेशन के दौरान पेट में तौलिया छोड़ा गया था।
उमा शंकर अपनी पत्नी को लेकर बरेली के दर्पण हॉस्पिटल पहुंचे, जहां तीसरी बार ऑपरेशन कर तौलिया निकाला गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। खीलावती की हालत और बिगड़ गई और 5 दिसंबर को उसने दम तोड़ दिया।
गरीब परिवार के सामने आर्थिक संकट
पीड़ित महिला के पति उमा शंकर मजदूरी करते हैं। उन्होंने बताया, “पत्नी को बचाने के लिए जो कुछ भी था, सब खर्च कर दिया। डेढ़ लाख रुपये इलाज में लग गए। अब न पैसा बचा और न मेरी पत्नी। मेरी मांग है कि दोषी डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई हो और मेरे परिवार की आर्थिक मदद की जाए।”
प्रशासन और अधिकारियों का बयान
पीलीभीत के मुख्य चिकित्सा अधिकारी आलोक कुमार ने कहा, “यह मामला अभी संज्ञान में नहीं आया है। अगर कोई शिकायत मिलती है तो निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की जाएगी।” पीड़ित ने जिलाधिकारी और एसपी से मामले की शिकायत की है।
निष्कर्ष
यह मामला चिकित्सा के क्षेत्र में लापरवाही की गंभीरता को उजागर करता है। गरीब परिवारों को न केवल आर्थिक संकट झेलना पड़ता है, बल्कि उनकी जिंदगियां भी खतरे में पड़ जाती हैं। इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता की आवश्यकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।