
आपने एक कहानी तो सुनी ही होगी जिसमें एक गरीब वृद्ध केस जीतने के बाद जज को धन्यवाद देते हुआ दुआ करता है की ईश्वर उन्हें दरोगा बना दे तभी जज साहब बुजुर्ग से कहते है की बाबा क्या आपको पता नही की जज दरोगा से बहुत बड़ा होता है । बुजुर्ग बोला नही साहब मेरे लिए तो अब दरोगा ही बड़ा है क्यों की जिस केस को खत्म करने में आपको सालों लग गए और मेरे हजारों रुपए खर्च हो गए। इसी केस को हमारे क्षेत्र के दरोगा जी उसी दिन खत्म करने को कह रहे थे बस दस हजार की मांग कर रहे थे अगर मैं तभी दरोगा जी को दस हजार रूप दे देता तो केस उसी दिन खत्म हो जाता।
कुछ यही आलम उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का भी है जहां के थानाध्यक्ष जनपद के पुलिस अधीक्षक के आदेश भी नहीं मानते और फरियादी भटकते नजर आते हैं।
दरअसल पूरा मामला अशोक लाट अंशल स्थल का है जहां कमासिन थाना क्षेत्र अंतर्गत कंदोहरा गांव के निवासी न्याय की आश में अंशन पर बैठे हैं। पीड़ितों ने बताया की उनके परिवार के सदस्य पर 31 दिसंबर 2024 को नामजद और कुछ अज्ञात लोगों ने जानलेवा हमला किया था जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं थी और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी जिसके बाद वह कमासिन थाना पहुंचे जहां के थानाध्यक्ष ने उन्हें बबेरू थाना पहुंचा दिया वह बबेरू थाना पहुंचे तो वहां के थानाध्यक्ष ने भी भगा दिया फिर पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल से मिले जिन्होंने मुकदमा लिखने और कार्रवाई करने का आदेश दिया पर फिर भी मुकदमा नही लिखा गया वो लोग अनशन पर बैठे तो बबेरू पुलिस मुकदमा लिखने और कार्रवाई करने का आश्वासन देकर ले गई और थाने में दो घंटे बैठाए रहे और धमकाते रहे । जिसके बाद वह एक बार फिर धरने पर बैठने को मजबूर हैं।

यह कोई पहला मामला नहीं है ऐसे कई मामले अलग अलग थानों से सामने आ चुके हैं जहां एसपी और अपर एसपी के आश्वासन के बावजूद कार्रवाई शून्य रही।
इस लचर कार्यशैली का बस एक ही कारण नजर आता है जनपद के पुलिस अधीक्षक का अपने अधिनस्थो पर अधिक भरोसा और जरूरत से ज्यादा छूट देना इतना ही नहीं फरियादियों की समस्याओं को गंभीरता से न लेने को कड़ी भी कहीं न कहीं नजर आ रही है जिसके चलते भ्रष्ट कर्मचारियों की चांदी ही चांदी हो रही है। अब देखने वाली बात यह होगी की ऐसी कार्यशैली का अंजाम क्या होता है।