श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही इदगाह केस में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस: क्या हुआ अब तक?
मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के पास मौजूद शाही इदगाह मस्जिद को लेकर 1968 में एक समझौता हुआ था, जिसमें दोनों स्थलों को साथ रहने की अनुमति मिली थी। लेकिन 2023 से इस मुद्दे पर नई कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जब हिंदू पक्ष ने दावा किया कि यह मस्जिद एक प्राचीन मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। तब से अब तक कुल 18 से अधिक मुकदमें अदालत में चल रहे हैं। हाल ही में इन सभी मुकदमों को अलग-अलग मामलों से जोड़कर एक साथ सुना जा रहा है ।
हाईकोर्ट का ताज़ा फैसला: “डिस्प्यूटेड स्ट्रक्चर” नहीं
4 जुलाई 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक एकल पीठ ने हिंदू पक्ष की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने शाही इदगाह मस्जिद को ‘डिस्प्यूटेड स्ट्रक्चर’ घोषित करने की गुहार लगाई थी ।
न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने स्पष्ट कहा कि भविष्य की सुनवाई में मस्जिद को विवादित बताना मामला अभी तय नहीं किया जा सकता और इस चरण पर इसे खारिज करना ही उचित है ।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस: क्या था दावेदारों का रुख?
याचिका दायर करने वाले प्रमुख अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह समेत अन्य हिंदू पक्षकारों का कहना है कि यह मस्जिद भगवान कृष्ण की जन्मभूमि पर बनी थी, मस्जिद समिति एवं यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने वादों को स्थगित करने या याचिका को वापस लेने का प्रयोजन रखा था, लेकिन उन्हें अभी तक संतुष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस: मुकदमों की वर्तमान स्थिति
संयोग से या निर्देश के तहत, 18 मुकदमे एक साथ सुनवाई के लिए जुड़े गए हैं ।
उच्च न्यायालय ने ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को भी जांच में शामिल किया है, जिससे मस्जिद परिसर की संरचना और इमारती स्थिति का मुआयना किया जा सके ।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मस्जिद की विवादित प्रकृति साक्ष्यों के आधार पर मुकदमे के अंतिम निर्णय पर तय की जाएगी, अभी नहीं ।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस: अब आगे क्या होगा?
2023 के बाद से चल रहे सुनवाई में अगला चरण ‘फ्रेमिंग ऑफ इश्यूज़’ पर निर्देशित है, ताकि स्पष्ट किया जा सके कि पक्षकारों के मुख्य दावे और उत्तर क्या होंगे ।
सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं चल रही थीं, लेकिन वहां से भी अभी कोई स्थायी रोक नहीं मिली है ।
निष्पक्ष प्रक्रिया अभी जारी है
अब तक हाईकोर्ट ने यह सफाई दी है कि
मस्जिद को ‘विवादित संरचना’ कहना जल्दबाजी होगी
पुरातात्विक व कानूनी जाँच पूरी किए बिना कोई संवेदनशील निर्णय नहीं लिया जाएगा।
इससे स्पष्ट है कि न्याय-प्रक्रिया संतुलित है, और अंतिम निर्णय न्यायालय आधारित साक्ष्यों पर निर्भर रहेगा।
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