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पीलीभीत में कृषि अधिकारी पर हमला, बैठक में थप्पड़ की गूंज – अफसर भागे

पीलीभीत में कृषि अधिकारी पर हमला, लोकतंत्र के मंच पर बरसी थप्पड़ों की गूंज: पीलीभीत की जिला पंचायत बैठक बनी अखाड़ा, अधिकारी की पिटाई से मचा हड़कंप

बैठक बनी बवाल: विकास योजनाओं की चर्चा के बीच गूंजा थप्पड़

पीलीभीत में जिला पंचायत की बृहस्पतिवार को हुई बोर्ड बैठक उस समय हंगामे में तब्दील हो गई, जब एक युवक ने जिला कृषि अधिकारी नरेंद्र पाल को सार्वजनिक रूप से थप्पड़ जड़ दिया। यह घटना उस वक्त हुई जब कृषि अधिकारी सदन में खाद की उपलब्धता को लेकर जवाब दे रहे थे। थप्पड़ मारने के बाद युवक ने अधिकारी का गिरेबान पकड़कर गाली-गलौज भी की, जिससे बैठक में मौजूद अफसर सकते में आ गए और कई अधिकारी बिना कुछ कहे बैठक स्थल छोड़कर बाहर निकल गए।

पीलीभीत में कृषि अधिकारी पर हमला: खाद की किल्लत बनी विवाद की वजह, जवाब नहीं भाया तो हो गया हमला

बैठक में जिला पंचायत सदस्य खाद की कमी को लेकर सवाल उठा रहे थे। कृषि अधिकारी नरेंद्र पाल ने जवाब देना शुरू ही किया था कि एक सदस्य से तीखी बहस होने लगी। इसी दौरान एक युवक—जिसकी पहचान अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है—सदन में मौजूद जनता क्षेत्र से उठकर सीधा अधिकारी तक पहुंचा और थप्पड़ जड़ दिया।

मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, युवक बेहद आक्रोशित था और उसके हावभाव से साफ था कि वह पहले से ही आक्रोशित मन:स्थिति में था। उसने अधिकारी को धक्का भी दिया और अपशब्द कहे।

पीलीभीत में कृषि अधिकारी पर हमला: वीडियो आया सामने, सोशल मीडिया पर वायरल, अफसरों में दहशत

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है, जिसमें स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि अधिकारी खड़े होकर कुछ कह रहे हैं और अचानक युवक आकर हमला कर देता है। वीडियो वायरल होने के बाद अब प्रशासन और जिला पंचायत की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

अफसरों का विश्वास टूटा, बैठक बीच में छोड़ी

थप्पड़ कांड के बाद कृषि अधिकारी नरेंद्र पाल ने वहां से निकलना ही बेहतर समझा और बैठक अधूरी छोड़ दी। उनके साथ अन्य अधिकारी भी उठकर बाहर चले गए। एक जिला स्तरीय बैठक में इस तरह की हाथापाई प्रशासन के लिए न केवल शर्मनाक है बल्कि यह बताता है कि अफसर और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद का संकट कितना गहरा गया है।

जनता के गुस्से की आग प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल

खाद की कमी जैसे मुद्दे किसान वर्ग के लिए अत्यंत संवेदनशील हैं। जब जनता और जनप्रतिनिधियों को लगता है कि अधिकारी जवाबदेही से बच रहे हैं, तो आक्रोश स्वाभाविक है। लेकिन किसी भी हाल में हाथापाई लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकती। सवाल यह भी उठ रहा है कि बैठक में किसी ने युवक को रोका क्यों नहीं? सुरक्षा व्यवस्था कहाँ थी?

अब कौन है वह युवक? पुलिस करेगी जांच या मामला दबेगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि थप्पड़ मारने वाला युवक कौन था? क्या वह कोई जिला पंचायत सदस्य था या किसी सदस्य का प्रतिनिधि? क्या उसके खिलाफ पुलिस में कोई शिकायत दर्ज हुई है? प्रशासन ने अब तक इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यदि इस मामले की सही जांच नहीं हुई तो यह भविष्य में और बड़ी घटनाओं की नींव बन सकती है।

जवाबदेही बनाम असहिष्णुता: लोकतंत्र की मर्यादा पर प्रहार

यह घटना केवल एक थप्पड़ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों की मर्यादा पर चोट है। अधिकारी जवाब दे रहे थे—चाहे उनका जवाब संतोषजनक हो या नहीं, लेकिन असहमति का मतलब हाथ उठाना नहीं होता। यदि हर सवाल का जवाब इसी तरह से माँगा जाएगा तो अधिकारी सदनों में काम कैसे करेंगे? यह स्थिति प्रशासन और जनप्रतिनिधियों दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय है।

क्या कार्रवाई होगी? प्रशासन और जिला पंचायत की भूमिका पर टिकी निगाहें

अब निगाहें जिला प्रशासन और जिला पंचायत अध्यक्ष की ओर हैं कि वे इस पूरे मामले को कैसे सुलझाते हैं। क्या आरोपी युवक के खिलाफ कोई कार्यवाही की जाएगी या मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

जनता की भी यह अपेक्षा है कि ऐसी घटनाओं को सामान्य न मानकर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी लोकतांत्रिक मंच को अखाड़ा न समझे।

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