गाजियाबाद में जलभराव से डूबी मर्सिडीज, कार मालिक ने मांगा 5 लाख मुआवजा — नगर निगम को भेजा लीगल नोटिस!
Ghaziabad: जब मर्सिडीज सड़क पर डूबी, तो भ्रष्टाचार सतह पर आ गया!
गाजियाबाद की चमचमाती सड़कों पर चलने वाली लाखों की मर्सिडीज जब बारिश के पानी में डूब गई — तब पहली बार किसी आम आदमी ने नगर निगम की “नाली सफाई” के नाम पर चल रहे करोड़ों के भ्रष्टाचार को सीधी चुनौती दे दी।
वसुंधरा निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता अमित किशोर ने अपनी क्षतिग्रस्त मर्सिडीज को मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोलने का हथियार बना लिया है। उन्होंने गाजियाबाद नगर आयुक्त को कानूनी नोटिस भेजकर न सिर्फ 5 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति की मांग की, बल्कि ये भी पूछा – “जनता का टैक्स आखिर जाता कहां है?”
23 जुलाई: जब सड़क पर बनी ‘झील’ में डूब गई मर्सिडीज!
साहिबाबाद से वसुंधरा जाते वक्त 23 जुलाई की रात अमित किशोर की मर्सिडीज जलभराव में फंस गई। पानी इतना भर चुका था कि पूरा वाहन अंदर से डूबकर मशीनरी फेल कर गया। नतीजा — क्रेन बुलवाकर कार को नोएडा सर्विस सेंटर भिजवाना पड़ा, जहां ₹5 लाख का भारी-भरकम बिल बना।
Ghaziabad: नगर निगम को कानूनी झटका, कार मालिक ने भेजा नोटिस
इस मामले में अधिवक्ता प्रेम प्रकाश की ओर से गाजियाबाद नगर आयुक्त को कानूनी नोटिस जारी किया गया है, जिसमें न सिर्फ कार मरम्मत की रकम की मांग की गई है, बल्कि मानसिक पीड़ा के लिए हर्जाना भी मांगा गया है।
नोटिस में सीधे-सीधे लिखा है कि –
“यदि 15 दिन के भीतर संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो मामला उच्च न्यायालय, लोकायुक्त और अन्य मंचों पर ले जाया जाएगा।”
Ghaziabad: जनता की नाराज़गी, सफाई के नाम पर करोड़ों डकार रहा है निगम?
अमित किशोर ने बात करते हुए साफ कहा –
“मेरी कार खराब होना मुद्दा नहीं है। मुद्दा है कि गाजियाबाद नगर निगम हर साल सफाई पर करोड़ों रुपये का बजट पास करवाता है, लेकिन ज़मीन पर कोई काम नहीं होता।
नाले गंदगी से भरे हैं, सड़कों पर अतिक्रमण पसरा है और ‘बरसात की तैयारी’ केवल दिखावे की जाती है। यही वजह है कि जलभराव में मेरी कार डूब गई।”
अधिवक्ता प्रेम प्रकाश का बयान: यह सिर्फ कार की क्षति नहीं, एक आंदोलन है!
अमित किशोर के वकील प्रेम प्रकाश ने कहा:
“यह सिर्फ एक वाहन का मसला नहीं है, यह पूरे नागरिक तंत्र की असफलता की जाँच का मुद्दा है। अगर जिम्मेदारों की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में और गाड़ियां डूबेंगी, और शायद जानें भी जाएं।”
सवालों के घेरे में नगर निगम:
क्या मानसून से पहले सफाई कार्य केवल कागज़ों में होता है?
क्या नाले की सफाई और अतिक्रमण हटाने के नाम पर जनता को सिर्फ मूर्ख बनाया जा रहा है?
करोड़ों का बजट कहां खर्च होता है, जब बारिश की एक रात में पूरा शहर जलमग्न हो जाता है?
जवाब चाहिए, दिखावा नहीं!
इस खबर का मकसद सिर्फ एक कार की कहानी नहीं, एक सिस्टम की नाकामी का पर्दाफाश है। जब टैक्स देने वाला आम आदमी अपनी गाड़ी जलभराव में डुबोकर न्याय की गुहार लगाता है, तो यह केवल मुआवज़े का नहीं, जन जिम्मेदारी और जवाबदेही का सवाल बन जाता है।
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