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Bihar Voter List Scam: 65 लाख नाम गायब, 12 जिंदा को मृत दिखाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Bihar Voter List Scam: 65 लाख वोटरों के नाम गायब, ’12 जीवित लोगों को मृत दिखाया’ – सुप्रीम कोर्ट में गरमा गया मामला

बिहार में चल रहे Special Intensive Revision (SIR) अभियान के तहत मतदाता सूची अपडेट करने की प्रक्रिया में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिन्होंने न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश में लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर, सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर दावा किया गया कि लाखों मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटा दिए गए, तो दूसरी ओर अदालत को बताया गया कि एक ही क्षेत्र में 12 जीवित लोगों को मृत दिखा दिया गया। इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से सख्त सवाल पूछे हैं और विस्तृत डेटा पेश करने का आदेश दिया है।

Bihar Voter List Scam:मामले की पृष्ठभूमि

चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) की शुरुआत की थी, जिसमें बूथ-लेवल अधिकारियों (BLOs) के जरिए घर-घर जाकर सत्यापन होना था। इसका मकसद था — मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम हटाना और नए पात्र लोगों के नाम जोड़ना। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान कई गड़बड़ियों के आरोप सामने आए।

Bihar Voter List Scam:सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं और आरोप

एक याचिका में दावा किया गया कि SIR के दौरान ड्राफ्ट मतदाता सूची से 65 लाख नाम गायब हो गए हैं। इसमें मांग की गई कि चुनाव आयोग इन हटाए गए नामों की पूरी सूची, हटाने के कारणों सहित, सार्वजनिक करे।

 एडवोकेट कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि एक क्षेत्र में 12 ऐसे लोग थे जिन्हें मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वे पूरी तरह जीवित हैं। उन्होंने कहा, “ये केवल एक उदाहरण है, अगर गहराई से जांच हो तो ऐसे सैकड़ों मामले मिल सकते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधे कहा—

“हमें यह स्पष्ट बताइए कि यह 65 लाख नाम किन परिस्थितियों में ड्राफ्ट लिस्ट से गायब हुए। पूरी डिटेल, सबूत और प्रक्रिया का ब्यौरा पेश करें।”

अदालत ने यह भी पूछा कि अगर कोई व्यक्ति ड्राफ्ट सूची में नहीं है, तो क्या उसे मतदाता सूची से हटाना माना जाएगा?

Bihar Voter List Scam:ईसीआई का पक्ष

चुनाव आयोग ने अदालत में कहा—

ड्राफ्ट सूची अंतिम नहीं होती, यह सिर्फ प्रारंभिक प्रकाशन है।

किसी नाम को स्थायी रूप से हटाने से पहले फॉर्म-7 नोटिस जारी किया जाता है और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है।

आयोग ने यह भी कहा कि उन्हें कानूनी रूप से हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करने की बाध्यता नहीं है।

BLO की भूमिका पर सवाल

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कई BLOs ने फील्ड वेरिफिकेशन में लापरवाही की। इसके चलते:

मृत व्यक्तियों के नाम सूची में बरकरार रहे।

कई जीवित व्यक्तियों को मृत या अनुपस्थित दिखाकर सूची से हटा दिया गया।

राजनीतिक प्रतिक्रिया

कुछ विपक्षी नेताओं ने SIR प्रक्रिया को “पारदर्शिता विहीन” और “जनता के वोटिंग अधिकार पर हमला” बताया। उनका कहना है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने की प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई में चुनाव आयोग को सभी आवश्यक डेटा, प्रक्रिया का विस्तृत विवरण और हटाए गए नामों की स्थिति पर स्पष्ट जवाब देने का आदेश दिया है। अदालत ने संकेत दिया है कि यदि प्रक्रिया में अनियमितताएं पाई जाती हैं तो SIR को लेकर बड़े निर्देश जारी किए जा सकते हैं।

बिहार SIR विवाद अब सिर्फ राज्य का मामला नहीं रह गया, यह भारत की पूरी चुनावी प्रणाली की पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों की रक्षा से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद यह साबित होता है कि गड़बड़ियां व्यापक स्तर पर हुईं, तो यह न सिर्फ चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली बल्कि लोकतंत्र की नींव पर भी सवाल खड़ा करेगा।

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