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Cyber crime: दुनिया और भारत का पहला साइबर क्राइम आपके पैदा होने से भी पहले हुआ था! जानिए..

Cyber crime: आज के समय में जब साइबर क्राइम सुनते ही हमारे दिमाग में हैकिंग, ऑनलाइन फ्रॉड और डिजिटल चोरी जैसे शब्द आते हैं, तब यकीन करना मुश्किल होता है कि इस तरह का अपराध हमारे पैदा होने से भी पहले हो चुका था। तकनीक का इस्तेमाल जहां तरक्की के लिए किया गया, वहीं अपराधियों ने भी इसे हथियार बना लिया। आइए जानते हैं देश और दुनिया का पहला साइबर क्राइम और उससे जुड़े चौंकाने वाले किस्से।

दुनिया का पहला साइबर क्राइम

दुनिया में पहला बड़ा साइबर अपराध 1970 के दशक में सामने आया। 1971 में अमेरिकी इंजीनियर जॉन ड्रेपर (John Draper) ने फोन नेटवर्क की कमियों का फायदा उठाकर “फ्री कॉलिंग” का तरीका खोज लिया। इसे “फ्रीकिंग (Phreaking)” कहा गया। वह एक खिलौने वाली सीटी (Captain Crunch whistle) से फोन सिस्टम को इस तरह कंट्रोल करते थे कि बिना पैसे दिए लंबी दूरी की कॉल लगाई जा सके। यह घटना दुनिया का पहला साइबर क्राइम मानी जाती है।

भारत का पहला साइबर क्राइम

भारत में पहला दर्ज साइबर क्राइम 1999 में हुआ था। यह मामला इंटरनेट से संबंधित फ्रॉड और हैकिंग का था। बैंगलुरु के एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अमेरिका की एक कंपनी से क्रेडिट कार्ड की जानकारी चुरा ली और ऑनलाइन खरीदारी कर डाली। यह भारत का पहला केस था जिसे आईटी ऐक्ट 2000 के तहत जांचा गया। इसी के बाद भारत में साइबर अपराधों को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए गए।

बने नए कानून

इन घटनाओं के बाद भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (Information Technology Act, 2000) लागू किया। इसमें हैकिंग, डेटा चोरी, फर्जी ई-मेल, ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर पोर्नोग्राफी जैसे अपराधों को परिभाषित कर सजा तय की गई। यह भारत में साइबर अपराधों से लड़ने के लिए पहला ठोस कदम था।

सोचिए, जब इंटरनेट आम लोगों तक पहुँचा भी नहीं था, तब अपराधी इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। यही वजह है कि साइबर सुरक्षा को लेकर दुनियाभर की सरकारें लगातार नए कानून बना रही हैं। आने वाले समय में साइबर क्राइम और भी जटिल रूप ले सकता है, इसलिए डिजिटल सावधानी रखना आज हर किसी के लिए बेहद जरूरी है