जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: दिल्ली में सरकारी आवास में आग लगने के बाद सामने आए कथित कैश कांड ने देश की न्यायपालिका को हिला दिया। इसी विवाद के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है। हालांकि इस्तीफा कब भेजा गया, इसकी आधिकारिक तारीख सामने नहीं आई, लेकिन इसकी जानकारी मीडिया में शुक्रवार को सामने आई। आइए पूरे मामले को आसान और क्रमवार तरीके से समझते हैं।
14 मार्च 2025: आग और कैश मिलने का मामला
14 मार्च 2025 की रात करीब 11:35 बजे दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई। उस समय वे दिल्ली हाईकोर्ट में जज के रूप में तैनात थे।
जब दिल्ली फायर सर्विस की टीम मौके पर पहुंची और आग बुझाई, तो स्टोर रूम से ₹500-₹500 के जले हुए नोटों के बंडल बरामद हुए। इस खुलासे ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया।
घर में कैश नहीं होने का दावा
इस घटना के बाद जस्टिस वर्मा ने अपने बचाव में कहा कि उनके घर के स्टोर रूम में कोई नकदी नहीं रखी गई थी और उन्हें साजिश के तहत फंसाया जा रहा है।
हालांकि, 21 मार्च को कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि उनके घर से करीब 15 करोड़ रुपये कैश मिला था, जिससे विवाद और गहरा गया।
दिल्ली से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर
मामले के तूल पकड़ने के बाद 22 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का ट्रांसफर कर दिया।
इसके बाद उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शपथ ली, लेकिन जांच पूरी होने तक उन्हें कोई न्यायिक जिम्मेदारी नहीं दी गई और काम से दूर रखा गया।
महाभियोग प्रस्ताव: संसद में शुरू हुई कार्रवाई
कैश कांड सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया।
146 सांसदों के समर्थन के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया और जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।
हालांकि, जस्टिस वर्मा ने इस प्रस्ताव को चुनौती दी और कहा कि:
- राज्यसभा में प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ
- फिर भी लोकसभा ने अकेले जांच समिति बना दी
- यह प्रक्रिया गलत और असंवैधानिक है
सुप्रीम कोर्ट में मामला
इस पूरे विवाद को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
6 जनवरी को कोर्ट ने कहा कि जांच समिति के गठन में कुछ खामियां नजर आती हैं।
सुनवाई के दौरान बेंच में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे।
8 जनवरी को कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया, लेकिन जस्टिस वर्मा को संसदीय समिति के सामने जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया गया।
लोकसभा स्पीकर को नोटिस और सवाल
इससे पहले 16 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को नोटिस जारी किया था।
कोर्ट ने सवाल उठाया कि:
- राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज होने के बाद भी लोकसभा में समिति कैसे बनी?
- संसद में मौजूद कानूनी विशेषज्ञों ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया?
जांच समिति पर विवाद
जस्टिस वर्मा की याचिका में कहा गया कि:
- जांच पैनल भारतीय संविधान का उल्लंघन करता है
- जज को हटाने से पहले दोनों सदनों की सहमति जरूरी है
- सिर्फ लोकसभा स्पीकर द्वारा समिति बनाना गलत है
हालांकि, 7 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पहले की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने नई याचिका दायर की।
जजों की जांच का कानून क्या कहता है?
1968 के जज (जांच) अधिनियम के अनुसार:
- किसी भी जज को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है
- प्रस्ताव स्वीकार होने पर स्पीकर या चेयरमैन 3 सदस्यीय जांच समिति बनाते हैं
- इस समिति में आमतौर पर शामिल होते हैं:
- सुप्रीम कोर्ट का जज
- हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस
- एक विधि विशेषज्ञ
आखिरकार इस्तीफा
जांच, विवाद और महाभियोग प्रक्रिया के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया है।
हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि:
- इस्तीफा कब भेजा गया
- क्या इसे स्वीकार किया गया
लेकिन इतना तय है कि यह मामला भारतीय न्यायपालिका के लिए एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।
जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा: जस्टिस वर्मा का मामला सिर्फ एक जज का विवाद नहीं, बल्कि न्यायपालिका की पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है।
आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट का फैसला और जांच रिपोर्ट इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).