Lenskart की गाइडलाइन: आईवियर कंपनी Lenskart एक बार फिर विवादों में है। इस बार वजह बना एक वायरल ड्रेस कोड गाइडलाइन का स्क्रीनशॉट, जिसमें कर्मचारियों के पहनावे और धार्मिक प्रतीकों को लेकर कुछ नियम बताए गए हैं। इस गाइडलाइन को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है।
वायरल गाइडलाइन में क्या लिखा है?
सोशल मीडिया पर वायरल इस गाइडलाइन में कर्मचारियों के लिए कुछ स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं:
- हिजाब या पगड़ी पहनने की अनुमति है, लेकिन रंग काला होना चाहिए
- हिजाब ऐसा हो जो सीने तक कवर करे, लेकिन कंपनी का लोगो नहीं ढके
- कलरफुल स्टोन वाली अंगूठियां पहनने की अनुमति नहीं (ब्लैक, ब्लू, ग्रीन, रेड आदि)
- बिंदी/क्लचर की अनुमति नहीं
- धार्मिक धागे या कलाई बैंड (कलावा) हटाने होंगे
इन नियमों ने लोगों का ध्यान खींचा और विवाद शुरू हो गया।
So these images were shared with me by someone whom I trust. I have no way of confirming this, but I checked with two diff AI platforms and they think these appear to be authentic and are from the Lenskart academy style guide. I would like someone to dig deeper and check if these… pic.twitter.com/NUgyblbb0K
— Shefali Vaidya. 🇮🇳 (@ShefVaidya) April 15, 2026
बिंदी-तिलक बनाम हिजाब पर छिड़ी बहस
जैसे ही यह गाइडलाइन सामने आई, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (Twitter) पर यूजर्स ने सवाल उठाने शुरू कर दिए।
लोगों का कहना है कि अगर हिजाब की अनुमति है, तो बिंदी, तिलक और कलावा पर रोक क्यों?
CEO पीयूष बंसल की सफाई
विवाद बढ़ने के बाद कंपनी के फाउंडर और CEO Peyush Bansal ने सफाई देते हुए कहा कि वायरल हो रहा यह डॉक्यूमेंट पुराना (outdated) है और कंपनी की मौजूदा पॉलिसी को नहीं दर्शाता।
“अब कोई प्रतिबंध नहीं” – कंपनी का दावा
पीयूष बंसल ने स्पष्ट किया कि कंपनी में बिंदी, तिलक या किसी भी धार्मिक प्रतीक पर कोई बैन नहीं है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ग्रूमिंग पॉलिसी समय के साथ अपडेट होती रहती है।
“कर्मचारी ही कंपनी की पहचान”
CEO ने कहा कि देशभर में काम करने वाले हजारों कर्मचारी अपनी संस्कृति और धर्म को गर्व के साथ अपनाते हैं और वही कंपनी की असली पहचान हैं।
पुराने डॉक्यूमेंट से बढ़ा भ्रम
कंपनी के अनुसार, यह विवाद एक पुराने डॉक्यूमेंट के वायरल होने से हुआ, जिससे गलतफहमी फैली। कंपनी ने इस पर खेद जताया है।
पुराने डॉक्यूमेंट से बढ़ा भ्रम, लेकिन पुराने नियमों पर भी उठे सवाल
कंपनी के अनुसार, यह विवाद एक पुराने डॉक्यूमेंट के वायरल होने से हुआ, जिससे गलतफहमी फैली और इस पर खेद भी जताया गया।
लेकिन अब बहस सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर यह गाइडलाइन पुरानी है, तो पहले ऐसी पॉलिसी बनाई ही क्यों गई थी?
सोशल मीडिया पर यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या उस समय कंपनी में धार्मिक प्रतीकों को लेकर अलग-अलग मानक लागू थे? और अगर थे, तो क्या यह नीति भेदभावपूर्ण थी?
यानी विवाद अब सिर्फ “आउटडेटेड डॉक्यूमेंट” का नहीं, बल्कि कंपनी की पुरानी सोच और नीतियों पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).