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Pilibhit Shocking News: जिंदा आदमी को कागजों में कर दिया ‘मृत’, रोक दी पेंशन! DM ने लिया बड़ा एक्शन, VDO सस्पेंड..

Pilibhit Shocking News: जिंदा आदमी को कागजों में कर दिया ‘मृत’, रोक दी पेंशन! DM ने लिया बड़ा एक्शन, VDO सस्पेंड..

Pilibhit Shocking News: पीलीभीत में वृद्धावस्था पेंशन के सत्यापन में ऐसी गंभीर लापरवाही सामने आई, जिसने सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। बीरवल पुत्र दुलीराम जिंदा थे, लेकिन सत्यापन के दौरान उन्हें रिकॉर्ड में मृतक दर्शा दिया गया। इसके बाद उनकी वृद्धावस्था पेंशन भी रुक गई। मामला जिलाधिकारी आलोक कुमार की जनसुनवाई तक पहुंचा तो जांच कराई गई और प्रथम दृष्टया लापरवाही सामने आने पर ग्राम विकास अधिकारी पवन पटेल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। प्रशासन ने साफ संदेश दिया है कि पात्र व्यक्ति को सरकारी योजना के लाभ से वंचित करने वाली लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

पीलीभीत में जिंदा लाभार्थी को कागजों में मृत दिखाया

पीलीभीत में वृद्धावस्था पेंशन के सत्यापन के दौरान बीरवल पुत्र दुलीराम के मामले में गंभीर चूक सामने आई। वह जीवित थे, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृतक दर्शा दिया गया। इसका सीधा असर उनकी वृद्धावस्था पेंशन पर पड़ा और पेंशन का लाभ रुक गया।

सरकारी कागज में किसी जीवित व्यक्ति को मृत घोषित करना सिर्फ एक छोटी प्रशासनिक गलती नहीं है। इसका असर उस व्यक्ति के अधिकार, सम्मान और आर्थिक सुरक्षा पर पड़ता है। खासकर वृद्धावस्था पेंशन जैसी योजना पर निर्भर लाभार्थी के लिए ऐसी गलती परेशानी बढ़ाने वाली होती है।

‘किसी ने बता दिया’ पर हुआ सत्यापन?

पंचायत सहायक और प्रधान पुत्र से मिली जानकारी का हवाला

जांच के दौरान ग्राम विकास अधिकारी ने बताया कि पंचायत सहायक और प्रधान पुत्र से मिली जानकारी के आधार पर लाभार्थी को मृतक दर्शाया गया था।

लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति की जिंदगी और सरकारी रिकॉर्ड में उसकी मृत्यु तय करने के लिए सिर्फ किसी के बता देने भर को पर्याप्त माना जा सकता है?

पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजना में सत्यापन का मतलब केवल नाम के आगे टिक लगाना नहीं होता। इसमें सही लाभार्थी की पहचान, उसकी वास्तविक स्थिति की पुष्टि और सरकारी रिकॉर्ड का जमीनी हकीकत से मिलान जरूरी है।

अगर बिना पर्याप्त पुष्टि के किसी जीवित बुजुर्ग को मृत घोषित कर दिया जाए, तो उस व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है, जिसके भरोसे गरीब और बुजुर्ग अपनी सामाजिक सुरक्षा की उम्मीद रखते हैं।

एक गलत एंट्री का खामियाजा बीरवल ने भुगता

कागज पर गलती हुई, लेकिन परेशानी लाभार्थी को उठानी पड़ी

सरकारी रिकॉर्ड में हुई गलत प्रविष्टि का सीधा असर बीरवल पर पड़ा। उनकी वृद्धावस्था पेंशन बंद हो गई और अपने हक के लिए उन्हें जिलाधिकारी की जनसुनवाई तक पहुंचना पड़ा।

यानी रिकॉर्ड में गलती भले ही कुछ समय में हुई हो, लेकिन उसे ठीक कराने के लिए एक बुजुर्ग को शिकायत करनी पड़ी, जांच का इंतजार करना पड़ा और यह साबित करना पड़ा कि वह जीवित हैं।

यहीं से यह मामला सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी व्यवस्था के काम करने के तरीके पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

जिस व्यक्ति को सरकार सामाजिक सुरक्षा देने के लिए पेंशन दे रही है, उसी व्यक्ति को अपने जिंदा होने का प्रमाण देने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर क्यों लगाने पड़ें?

डीएम आलोक कुमार ने मामले को गंभीरता से लिया

जांच के बाद ग्राम विकास अधिकारी पर कार्रवाई

मामला जिलाधिकारी आलोक कुमार की जनसुनवाई तक पहुंचा तो प्रशासन ने इसे सामान्य शिकायत की तरह नहीं लिया। जिलाधिकारी के निर्देश पर संबंधित अधिकारियों से मामले की जांच कराई गई।

जिला पंचायत राज अधिकारी के पत्र और खंड विकास अधिकारी मरौरी की जांच आख्या के आधार पर सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) ने प्रकरण की जांच की।

जांच में प्रथम दृष्टया ग्राम विकास अधिकारी पवन पटेल की गंभीर लापरवाही सामने आई। लाभार्थी को गलत तरीके से मृत दर्शाए जाने के कारण वह वृद्धावस्था पेंशन के लाभ से वंचित हुआ।

इसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई में देरी नहीं की। पवन पटेल, ग्राम विकास अधिकारी, विकास खंड मरौरी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

डीएम का साफ संदेश—पात्र का हक रोका तो जवाबदेही तय होगी

‘गलती हो गई’ कहकर मामला खत्म नहीं होगा

इस कार्रवाई से प्रशासन ने साफ संदेश दिया है कि शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्ति तक पहुंचाना सिर्फ एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि संबंधित अधिकारी-कर्मचारी की जिम्मेदारी भी है।

अगर किसी कर्मचारी या अधिकारी की लापरवाही से पात्र लाभार्थी का हक रुकता है तो उसकी जिम्मेदारी तय होगी। यानी अब केवल यह कहकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता कि ‘गलती हो गई।’

सवाल यह भी है कि गलती किससे हुई, क्यों हुई, सत्यापन किस स्तर पर हुआ, लाभार्थी को कितने समय तक नुकसान हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। इन सवालों का जवाब तय करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।

एक बीरवल का मामला नहीं, पूरी व्यवस्था के लिए चेतावनी

पेंशन सत्यापन में छोटी गलती भी बड़ा नुकसान कर सकती है

यह मामला सिर्फ एक लाभार्थी की पेंशन बहाल होने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इससे पूरे पेंशन सत्यापन तंत्र को सीख लेने की जरूरत है।

सरकारी रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति को मृत दिखा देना केवल एक गलत एंट्री नहीं है। ऐसी गलती का असर पेंशन के अलावा राशन, आवास, छात्रवृत्ति या दूसरी सरकारी योजनाओं के लाभ पर भी पड़ सकता है।

इसलिए सत्यापन करने वाले प्रत्येक कर्मचारी को यह समझना होगा कि उसके सामने सिर्फ एक फाइल या रिकॉर्ड नहीं होता। उस रिकॉर्ड के पीछे किसी परिवार की उम्मीद और किसी बुजुर्ग की सामाजिक सुरक्षा जुड़ी होती है।

पीलीभीत प्रशासन का कड़ा संदेश

जनकल्याणकारी योजनाओं में लापरवाही पर होगी कार्रवाई

पीलीभीत प्रशासन की इस कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि जनकल्याणकारी योजनाओं में लापरवाही को सिर्फ फाइल पर दर्ज टिप्पणी बनाकर नहीं छोड़ा जाएगा।

जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि पात्र लाभार्थियों को अनावश्यक रूप से योजनाओं से वंचित करने, सत्यापन में लापरवाही बरतने या पदीय दायित्वों के निर्वहन में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।

यह संदेश उन सभी जिम्मेदार कर्मचारियों के लिए भी है, जिनके हाथ में सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के सत्यापन की जिम्मेदारी है।

कागज पर किसी गरीब या बुजुर्ग को ‘मृत’ लिखना भले आसान हो, लेकिन उसके हक को रोकने की जिम्मेदारी से बचना अब आसान नहीं होगा। बीरवल के मामले में हुई कार्रवाई ने यही सवाल सामने रखा है कि सरकारी रिकॉर्ड में एक गलती किसी की जिंदगी को कितनी बड़ी परेशानी में डाल सकती है।

आखिर सरकारी कुर्सी सिर्फ अधिकार नहीं देती, उसके साथ जवाबदेही भी आती है। पीलीभीत में हुई इस कार्रवाई का सीधा संदेश यही है—पात्र का हक रोका तो जिम्मेदारी तय होगी और लापरवाही मिली तो कार्रवाई भी होगी।