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वादों से नहीं, फैसलों से बदलती है तस्वीर… पीलीभीत में खत्म होगा तेंदुओं का आतंक, प्रशासन ने ढूंढ निकाला स्थायी समाधान

पीलीभीत में 50 करोड़ की लेपर्ड सफारी से तेंदुओं का आतंक कम करने की बड़ी पहल। 365 दिन पर्यटन, मानव-वन्यजीव संघर्ष पर स्थायी समाधान की तैयारी।

वादों से नहीं, फैसलों से बदलती है तस्वीर… पीलीभीत में अब तेंदुए नहीं बनेंगे मौत का पैगाम, प्रशासन ने ढूंढ निकाला स्थायी समाधान

पीलीभीत की धरती ने पिछले कई वर्षों में वह दर्द देखा है, जिसे शायद ही कोई भूला हो। कभी खेतों में काम करते किसानों पर तेंदुओं का हमला, कभी गन्ने के खेतों से निकलकर गांव में घुसते खूंखार तेंदुए, तो कभी मासूम बच्चों और बुजुर्गों की जान पर बन आई। कई परिवार उजड़ गए, कई तेंदुओं को भी अपनी जान गंवानी पड़ी।

हर बड़ी घटना के बाद नेताओं का काफिला पहुंचा। कैमरे लगे, बयान दिए गए, मुआवजे का ऐलान हुआ, तारबंदी के वादे हुए, सुरक्षा के दावे हुए, लेकिन हालात नहीं बदले। सड़कें जाम हुईं, धरने हुए, प्रदर्शन हुए, चुनाव आए और चले गए, लेकिन इंसान और वन्यजीव संघर्ष वहीं का वहीं खड़ा रहा।

अब पहली बार ऐसा दिखाई दे रहा है कि केवल बयान नहीं, बल्कि जमीन पर समाधान उतारा जा रहा है।

50 करोड़ की लेपर्ड सफारी… संघर्ष का स्थायी इलाज

पूरनपुर के गोपालपुर जंगल में करीब 50 करोड़ रुपये की लागत से उत्तर प्रदेश की पहली  लेपर्ड सफारी विकसित की जा रही है। लगभग 1716–2000 हेक्टेयर क्षेत्र में बनने वाली यह परियोजना केवल पर्यटन स्थल नहीं होगी, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की बड़ी रणनीति का हिस्सा होगी। पूरे क्षेत्र को हाईटेक लेपर्ड-प्रूफ फेंसिंग, सीसीटीवी, रेस्क्यू एनक्लोजर, वन्यजीव चिकित्सालय, प्रकृति व्याख्या केंद्र और सफारी ट्रैक से लैस किया जाएगा।

अब 365 दिन होंगे तेंदुओं के दीदार

पीलीभीत टाइगर रिजर्व की तरह मानसून में बंद नहीं, बल्कि यह सफारी पूरे साल यानी 365 दिन पर्यटकों के लिए खुली रहेगी। यहां आने वाले सैलानी सुरक्षित दूरी से प्राकृतिक माहौल में तेंदुओं को देख सकेंगे। इससे पीलीभीत उत्तर प्रदेश के प्रमुख इको-टूरिज्म केंद्रों में शामिल हो सकता है।

आखिर क्यों बढ़ा था संघर्ष?

विशेषज्ञों के अनुसार टाइगर रिजर्व बनने के बाद बाघों और तेंदुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। बाघों के बढ़ते दबाव के कारण कई तेंदुए जंगल के किनारों की ओर खिसकने लगे। उम्रदराज़ तेंदुओं के लिए शिकार करना कठिन होता गया। दूसरी ओर तराई क्षेत्र में ऊंचे गन्ने के खेत उन्हें अस्थायी ठिकाना तो देते हैं, लेकिन कई बार वे रास्ता भटककर गांवों तक पहुंच जाते हैं। वहां कुत्ते, मवेशी और कई मामलों में इंसान भी हमलों का शिकार बने। इन घटनाओं में कई तेंदुओं की भीड़ के हाथों मौत हुई।

नेताओं के वादे… प्रशासन की कार्रवाई

वर्षों तक हर घटना के बाद राजनीति होती रही। सड़क जाम हुईं, धरने हुए, तारबंदी और स्थायी समाधान के वादे किए गए, लेकिन हालात जस के तस रहे। सरकार को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपये खर्च करने पड़े और ग्रामीणों का डर खत्म नहीं हुआ।

अब वन विभाग ने आगे बढ़कर समस्या को जड़ से ख़त्म करने पर काम शुरू किया है। यह परियोजना उसी सोच का परिणाम है कि इंसान और वन्यजीव दोनों सुरक्षित रहें।

रोजगार भी, पर्यटन भी

लेपर्ड सफारी से स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, जीप सफारी चालक, होमस्टे, होटल, रेस्टोरेंट, हस्तशिल्प और पर्यटन से जुड़े अनेक रोजगार के अवसर पैदा होंगे। गांवों की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिलेगी और पीलीभीत की पहचान सिर्फ टाइगर रिजर्व तक सीमित नहीं रहेगी।

प्रशासन का दावा

डीएफओ सामाजिक वानिकी भरत कुमार डी.के. के अनुसार

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह परियोजना रेस्क्यू किए गए तेंदुओं के सुरक्षित पुनर्वास, मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी, पर्यटन को बढ़ावा और वन संरक्षण—चारों मोर्चों पर मील का पत्थर साबित होगी। डीएफओ सामाजिक वानिकी भरत कुमार डी.के. के अनुसार यह परियोजना पीलीभीत में इंसानों, पशुओं और तेंदुओं—तीनों की सुरक्षा के लिए वरदान साबित होगी। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष में उल्लेखनीय कमी आएगी और भविष्य में जान-माल के नुकसान को रोका जा सकेगा।

जिस तेंदुए का नाम सुनते ही गांवों में दहशत फैल जाती थी, वही अब पीलीभीत की नई पहचान बनने जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि वर्षों तक राजनीति ने समस्या को मुद्दा बनाया, लेकिन अब प्रशासन उसे समाधान में बदलने की कोशिश कर रहा है। यदि यह परियोजना तय समय पर पूरी होती है तो पीलीभीत न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन का एक मॉडल बन सकता है।

यह कहानी केवल एक लेपर्ड सफारी की नहीं, बल्कि उन अधूरे वादों और उस ठोस कार्रवाई की है, जिसमें वर्षों की राजनीति के बाद आखिरकार समाधान ने जन्म लिया है।