पीलीभीत में आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है अवैध कॉलोनियों का खेल?
एंटी भूमाफिया टास्क फोर्स के दावों पर सवाल, नोटिस और बुलडोजर की चेतावनी के बावजूद धड़ल्ले से कट रही कॉलोनियां
पीलीभीत। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार प्रदेशभर में एंटी भूमाफिया अभियान चलाकर अवैध कब्जों और अवैध कॉलोनियों पर सख्त कार्रवाई के दावे कर रही है। सरकारी आंकड़ों में हजारों एकड़ जमीन कब्जा मुक्त कराने और भूमाफियाओं पर शिकंजा कसने की तस्वीर दिखाई जाती है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पीलीभीत शहर और उसके आसपास आज भी बिना स्वीकृति कृषि भूमि पर खुलेआम प्लॉटिंग हो रही है, नई-नई कॉलोनियां बसाई जा रही हैं और जिम्मेदार विभाग सब कुछ जानते हुए भी कार्रवाई के नाम पर केवल नोटिसों तक सीमित दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि आखिर प्रशासनिक तंत्र की आंखों के सामने यह पूरा खेल कैसे चल रहा है और किसके संरक्षण में नियमों को ठेंगा दिखाकर अवैध कॉलोनियों का कारोबार फल-फूल रहा है?
शहर के चारों ओर फैल चुका है अवैध कॉलोनियों का जाल
पीलीभीत शहर की सीमाओं से लेकर बाहरी क्षेत्रों तक कृषि भूमि को छोटे-छोटे प्लॉटों में काटकर कॉलोनियां विकसित की जा रही हैं। कहीं बिना ले-आउट स्वीकृति के सड़कें बना दी गई हैं तो कहीं नालियां और प्लॉट तैयार कर खरीदारों को बेचे जा रहे हैं। कई स्थानों पर निर्माण कार्य भी शुरू हो चुका है, जबकि नियमानुसार संबंधित विभागों से स्वीकृति लेना अनिवार्य है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी गतिविधियां खुलेआम हो रही हैं तो आखिर जिम्मेदार विभागों की नजर इन पर क्यों नहीं पड़ती, या फिर नजर पड़ने के बावजूद कार्रवाई समय पर क्यों नहीं होती?
शिकायतें होती हैं… अधिकारी पहुंचते हैं… आश्वासन मिलता है… फिर सब कुछ पहले जैसा
अवैध कॉलोनियों को लेकर समय-समय पर स्थानीय लोगों द्वारा शिकायतें की जाती रही हैं। प्रशासनिक अधिकारी मौके का निरीक्षण भी करते हैं, नोटिस जारी किए जाते हैं और कार्रवाई का भरोसा भी दिया जाता है। लेकिन कुछ समय बाद वही स्थान फिर प्लॉटिंग और निर्माण गतिविधियों से गुलजार दिखाई देते हैं।
यही वजह है कि लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह गई है?
माधोटांडा रोड पर भी प्रशासन के सामने कट रही है कॉलोनी
इस पूरे मामले में सबसे चर्चित उदाहरण पीलीभीत से माधोटांडा जाने वाले मार्ग का है। चिरौंजीलाल वीरेंद्रपाल स्कूल के सामने कृषि भूमि पर एक कॉलोनी विकसित किए जाने का मामला प्रशासन के संज्ञान में है। स्थानीय स्तर पर इस मामले की शिकायतें भी हुईं और निरीक्षण के दौरान सिटी मजिस्ट्रेट पीलीभीत ने बुलडोजर कार्रवाई किए जाने की बात भी कही।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि प्रशासन स्वयं इस मामले से अवगत है और कार्रवाई की बात भी कह चुका है, तो फिर अवैध प्लॉटिंग पर पूरी तरह रोक आखिर क्यों नहीं लग पाई? यदि निर्माण गतिविधियां जारी रहती हैं तो यह केवल स्थानीय लोगों ही नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह कोई पहला मामला नहीं, पहले भी जारी हो चुके हैं नोटिस
पीलीभीत में अवैध कॉलोनियों का मामला नया नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में प्रशासन ने शहर के आसपास विकसित हो रही 11 अवैध कॉलोनियों को अंतिम नोटिस जारी करते हुए नियमों का पालन करने और आवश्यक स्वीकृतियां लेने के निर्देश दिए थे। साथ ही स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि नियमों का पालन न करने पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाएगी।
इसके बाद भी अवैध प्लॉटिंग का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुका।
100 से ज्यादा कॉलोनियों का हुआ सत्यापन, फिर भी जारी रहा खेल
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में जिला पंचायत स्तर पर 100 से अधिक अवैध कॉलोनियों के सत्यापन के निर्देश दिए गए। प्रशासन ने माना कि जिले में लगातार बिना अनुमति कॉलोनियां विकसित किए जाने की शिकायतें मिल रही हैं।
इसी दौरान न्यूरिया, पौटा कलां सहित कई क्षेत्रों में बुलडोजर कार्रवाई की गई और कॉलोनाइजरों को नोटिस जारी किए गए। अधिकारियों ने साफ कहा कि बिना वैधानिक अनुमति के कॉलोनियां विकसित नहीं होने दी जाएंगी।
लेकिन सवाल यह है कि जब कार्रवाई भी हुई और नोटिस भी दिए गए, तो फिर नई कॉलोनियां आखिर कैसे तैयार होती रहीं?
2025 और 2026 में भी नहीं थमा सिलसिला
स्थिति इतनी गंभीर रही कि वर्ष 2025 में जिलाधिकारी के निर्देश पर एक बार फिर पूरे जिले में अनधिकृत कॉलोनियों पर हुई कार्रवाई की रिपोर्ट तलब करनी पड़ी।
इसके बाद वर्ष 2026 में भी शहर के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में बिना स्वीकृति विकसित की जा रही कॉलोनियों पर बुलडोजर चलाया गया। अमरिया क्षेत्र में तालाब की जमीन से अवैध निर्माण हटाए गए, जबकि खकरा नदी किनारे अवैध प्लॉटिंग के मामलों में भी प्रशासन को नोटिस जारी करने पड़े।
यह घटनाएं बताती हैं कि कार्रवाई लगातार हो रही है, लेकिन अवैध कॉलोनियों का कारोबार भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।
सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का
अवैध कॉलोनियों का सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को उठाना पड़ता है जो अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर प्लॉट खरीद लेते हैं। बाद में यदि वह कॉलोनी नियमों के विरुद्ध पाई जाती है या प्रशासन बुलडोजर कार्रवाई करता है, तो सबसे अधिक आर्थिक और मानसिक नुकसान आम नागरिकों को झेलना पड़ता है।
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बुलडोजर कब चलेगा। असली सवाल यह है कि बिना स्वीकृति कॉलोनी विकसित होने की शुरुआत ही कैसे हो जाती है? जब खेतों में सड़कें बनती हैं, प्लॉटों की बाउंड्री होती है, विज्ञापन लगाए जाते हैं और रजिस्ट्री तक की नौबत आ जाती है, तब संबंधित विभाग आखिर क्या कर रहे होते हैं?
यदि प्रशासन को हर मामले की जानकारी बाद में मिलती है तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, और यदि पहले से जानकारी होने के बावजूद समय पर रोक नहीं लगती तो कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
योगी सरकार की मंशा स्पष्ट है कि अवैध कब्जों और अवैध कॉलोनियों पर कठोर कार्रवाई हो, लेकिन पीलीभीत की जमीनी तस्वीर यह संकेत देती है कि इस दिशा में अभी भी प्रभावी और समयबद्ध निगरानी की जरूरत है। प्रशासन द्वारा जहां भी नियमों का उल्लंघन पाया जाए, वहां पारदर्शी, निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि कानून का पालन सुनिश्चित हो और आम नागरिकों का भरोसा बना रहे।
अब देखना यह होगा कि पीलीभीत में अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई केवल नोटिसों और घोषणाओं तक सीमित रहती है या फिर वास्तव में नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।
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