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UP Election 2027: सपा कार्यालय पर हनुमान भक्त ‘अखिलेश यादव’ का पोस्टर; चुनाव से पहले खेले जाएंगे सभी हथकंडे?

UP Election 2027: सपा कार्यालय पर हनुमान भक्त 'अखिलेश यादव' का पोस्टर; चुनाव से पहले खेले जाएंगे सभी हथकंडे?

UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी और भगवान राम का रिश्ता लंबे समय तक टकराव और राजनीतिक विरोध के संदर्भ में चर्चा में रहा है। मुलायम सिंह यादव के दौर में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का फैसला सपा की राजनीतिक विरासत का बड़ा हिस्सा बना। वहीं, अखिलेश यादव के दौर में भी राम मंदिर और अयोध्या को लेकर पार्टी का रुख BJP के मुकाबले अलग रहा। लेकिन अब 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। सपा कार्यालय के बाहर अखिलेश यादव को भगवान हनुमान के सामने हाथ जोड़कर बैठे दिखाने वाला पोस्टर और उस पर लिखा “विजय भव: 2027” सिर्फ एक पोस्टर नहीं, बल्कि बदलती राजनीतिक भाषा का संकेत माना जा रहा है।

पुरानी सपा की राजनीति और अयोध्या का अध्याय

समाजवादी पार्टी की पुरानी राजनीति को समझे बिना अखिलेश के मौजूदा धार्मिक संदेश को समझना मुश्किल है। मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग हुई थी। बाद में मुलायम ने इस कार्रवाई का बचाव भी किया। 2017 में सपा मुख्यालय में अपने जन्मदिन के कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि देश की एकता के लिए अगर और लोगों को भी मारना पड़ता तो सुरक्षा बल ऐसा करते। इससे यह साफ था कि अयोध्या का वह फैसला उनके राजनीतिक इतिहास का ऐसा हिस्सा था जिसे वह उस समय भी बचाव के साथ देखते थे।

2016 में मुलायम ने यह भी कहा था कि कारसेवकों पर गोली चलाने का फैसला मुस्लिम अल्पसंख्यकों का भरोसा बनाए रखने के लिए लिया गया था और उन्होंने माना था कि इस फैसले के बाद सपा का आधार भी बढ़ा। यानी अयोध्या की राजनीति और मुस्लिम मतदाताओं के भरोसे को सपा की पुरानी राजनीति में एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता रहा है।

यही वह पुरानी छवि है जिसे अब अखिलेश बदलते दिख रहे हैं

अखिलेश यादव की राजनीति भी लंबे समय तक सपा के पारंपरिक सामाजिक समीकरण और BJP के हिंदुत्व मॉडल के विरोध के आसपास दिखाई देती रही। लेकिन 2027 से पहले उनकी राजनीति में धार्मिक प्रतीकों की मौजूदगी बढ़ी है। India Today ने भी जुलाई 2026 में अखिलेश की राजनीति में बढ़ते “Sanatan push” पर रिपोर्ट की थी, जिसमें मंदिर निर्माण, संतों से मुलाकात और राम मंदिर से जुड़े मुद्दों पर उनके नए रुख का उल्लेख किया गया।

सबसे बड़ा बदलाव जून 2026 में दिखाई दिया, जब अखिलेश ने सत्ता में आने पर अयोध्या को “सियाराम धाम” के रूप में विकसित करने का वादा किया। यह वही सपा है जिसकी पुरानी राजनीति को अयोध्या आंदोलन के संदर्भ में BJP के बिल्कुल विपरीत खेमे में देखा जाता रहा है।

इसके बाद जब उनसे अयोध्या के राम मंदिर जाने को लेकर सवाल हुआ तो अखिलेश ने कहा कि “भगवान राम सबके हैं” और इटावा में केदारेश्वर धाम का निर्माण पूरा होने के बाद वह राम मंदिर में दर्शन करने जाएंगे। सपा के प्रवक्ता ने भी पुष्टि की कि अखिलेश पहले राम मंदिर नहीं गए हैं।

लेकिन सवाल है कि यह बदलाव आखिर क्यों आया?

यहीं से पूरी कहानी का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल शुरू होता है। क्या यह सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा बदलाव है या 2027 के चुनाव को देखते हुए सपा की राजनीतिक रणनीति में भी बदलाव हो रहा है?

इसका सबसे बड़ा जवाब चुनावी गणित में छिपा दिखाई देता है।

दो विधानसभा चुनावों की हार ने क्या सिखाया?

2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BJP ने 312 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर करीब 39.7 प्रतिशत रहा था। सपा 47 सीटों और करीब 22 प्रतिशत वोट पर सिमट गई थी। 2022 में सपा ने अपनी स्थिति काफी सुधारी और उसका वोट शेयर करीब 32 प्रतिशत तक पहुंचा, लेकिन BJP 255 सीटों और करीब 41.3 प्रतिशत वोट के साथ फिर सत्ता में लौट आई।

यानी सपा का वोट बढ़ा, सीटें भी बढ़ीं, लेकिन सरकार बनाने के लिए जिस व्यापक सामाजिक समर्थन की जरूरत है, वह नहीं बन सका।

यहीं से अखिलेश की राजनीति के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या केवल अपने पारंपरिक सामाजिक आधार यानी मुस्लिम वोट बैंक के भरोसे BJP के उस चुनावी मॉडल को चुनौती दी जा सकती है, जिसमें हिंदुत्व के साथ व्यापक सामाजिक और राजनीतिक समर्थन भी जुड़ा हुआ है?

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों वाली राजनीति में किसी एक सामाजिक समूह के समर्थन से बहुमत हासिल करना आसान नहीं है। इसलिए सपा अगर 2027 में सत्ता की लड़ाई को और व्यापक बनाना चाहती है तो उसे अपने मुस्लिम वोट बैंक के एलावा हिन्दू वोट पर भी पहुंच बनानी होगी।

सामने योगी हैं, इसलिए चुनौती और बड़ी है

इस पूरी कहानी में योगी आदित्यनाथ का factor भी बेहद महत्वपूर्ण है। योगी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व को अपनी पहचान का प्रमुख हिस्सा बनाया है, लेकिन उनकी राजनीति केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित नहीं है। कानून-व्यवस्था, सरकारी योजनाएं, विकास परियोजनाएं और लगातार जनसभाओं के जरिए भी वह अपनी सरकार का संदेश जनता तक पहुंचाते रहे हैं।

उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता को लेकर India Today-CVoter के अगस्त 2025 के Mood of the Nation सर्वे में योगी आदित्यनाथ को देश का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री बताया गया था; सर्वे में 36 प्रतिशत respondents ने उन्हें चुना था। यह एक सर्वेक्षण का नतीजा है, न कि चुनावी परिणाम, लेकिन इससे राष्ट्रीय स्तर पर उनकी राजनीतिक लोकप्रियता का एक माप जरूर मिलता है।

इसी सर्वे के एक अन्य सवाल में 2025 में नरेंद्र मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद के संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर अमित शाह के बाद योगी आदित्यनाथ का नाम भी प्रमुखता से सामने आया था। यह भी सर्वेक्षण आधारित धारणा है, कोई घोषित उत्तराधिकार व्यवस्था नहीं।

यानी अखिलेश के सामने सिर्फ BJP का संगठन नहीं, बल्कि एक ऐसा मुख्यमंत्री भी है जिसकी राजनीति की सबसे मजबूत पहचान हिंदुत्व से जुड़ी हुई है और जिसकी राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा भी लगातार होती रही है।

क्या इसलिए सपा अब BJP के हिंदुत्व नैरेटिव को चुनौती देना चाहती है?

यही इस पूरे बदलाव का सबसे अहम संभावित कारण दिखाई देता है।

अगर BJP लंबे समय से राम, मंदिर और हिंदुत्व को अपनी राजनीति का प्रमुख हिस्सा बनाकर चलती रही है, तो सपा के लिए लगातार उसी मुद्दे से दूरी बनाए रखना उसे हिंदू मतदाताओं के एक हिस्से से दूर रख सकता है।

इसलिए अब रणनीति शायद यह नहीं है कि राम के मुद्दे से दूरी बनाई जाए, बल्कि यह संदेश देने की कोशिश दिखाई देती है कि राम किसी एक राजनीतिक दल के नहीं हैं।

अखिलेश का “भगवान राम सबके हैं” कहना, अयोध्या को “सियाराम धाम” बनाने की बात करना, केदारेश्वर धाम का निर्माण और अब हनुमान के सामने हाथ जोड़कर आशीर्वाद मांगते हुए पोस्टर—इन घटनाओं को एक साथ देखने पर उनकी राजनीतिक भाषा में बदलाव साफ दिखाई देता है।

लेकिन सपा अपना पुराना सामाजिक आधार भी नहीं छोड़ना चाहती

यह बदलाव तभी समझ में आता है जब दूसरी तरफ PDA की राजनीति को भी देखा जाए। यानी एक तरफ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ की राजनीति जारी है, दूसरी तरफ धार्मिक प्रतीकों के जरिए हिंदू मतदाताओं के बीच पहुंच बनाने की कोशिश दिखाई दे रही है।

इसका मतलब यह हो सकता है कि सपा अपनी पुरानी सामाजिक जमीन को छोड़े बिना उसके ऊपर एक नया राजनीतिक विस्तार करना चाहती है।

सीधे शब्दों में कहें तो चुनौती यह है कि मुस्लिम और अन्य पारंपरिक समर्थक साथ रहें, लेकिन पार्टी की पहचान ऐसी न दिखे कि हिंदू मतदाता उसे अपने राजनीतिक विकल्प के रूप में देखने से पहले ही खारिज कर दे।

यही संतुलन 2027 के चुनाव में सपा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

2027 से पहले इतनी तेजी क्यों?

क्योंकि अब चुनाव दूर नहीं है और सपा के पास अपनी राजनीतिक भाषा बदलने के लिए अनंत समय भी नहीं है।

2017 और 2022 में सत्ता से बाहर रहने के बाद 2027 अखिलेश यादव के नेतृत्व और सपा की राजनीतिक दिशा के लिए बेहद महत्वपूर्ण चुनाव है। इसे सीधे राजनीतिक संन्यास का सवाल कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि तीसरी विधानसभा लड़ाई अखिलेश के लिए पार्टी को सत्ता में वापस लाने की बड़ी परीक्षा होगी।

दूसरी तरफ BJP भी चुनाव से पहले संगठन, सरकारी योजनाओं और जनसंपर्क के जरिए अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे माहौल में सपा के सामने सिर्फ BJP सरकार की आलोचना करना पर्याप्त नहीं होगा; उसे यह भी तय करना होगा कि वह उत्तर प्रदेश के मतदाता के सामने अपनी सकारात्मक राजनीतिक पहचान किस रूप में पेश करती है।

और अब आया ‘विजय भव: 2027’ वाला हनुमान पोस्टर

22 सितंबर 2026 को लखनऊ स्थित सपा कार्यालय के बाहर सामने आया पोस्टर इसी पूरी कहानी को एक प्रतीक में बदल देता है। इसमें अखिलेश यादव भगवान हनुमान के सामने हाथ जोड़कर बैठे दिखते हैं और हनुमान उन्हें आशीर्वाद देते नजर आते हैं। पोस्टर पर लिखा है—“विजय भव: 2027”

यह पोस्टर ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। इसके ठीक पहले अखिलेश को निशाना बनाने वाले कुछ पोस्टर भी सामने आए थे, जिनमें पूर्व सपा नेताओं आजम खान, मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद की तस्वीरों के जरिए सपा की पुरानी राजनीति पर हमला किया गया था। इन पोस्टरों को किसने लगाया, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

ऐसे में हनुमान वाला पोस्टर राजनीतिक संदेश के स्तर पर और भी दिलचस्प हो जाता है।

दशकों की राजनीति से बिल्कुल अलग तस्वीर क्यों?

एक तरफ सपा की पुरानी राजनीतिक विरासत है—अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने का फैसला और उस फैसले का बाद में मुलायम सिंह यादव द्वारा किया गया बचाव। दूसरी तरफ आज की तस्वीर है—अखिलेश यादव के सामने भगवान हनुमान, हाथ जुड़े हुए और ऊपर लिखा है “विजय भव: 2027”

बीच के वर्षों में राजनीति बहुत बदल चुकी है। अयोध्या में राम मंदिर बन चुका है। BJP ने राम मंदिर के मुद्दे को अपनी राजनीति के केंद्र में रखा। योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व की राजनीति के बड़े चेहरों में शामिल हो चुके हैं। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा ने BJP को बड़ा चुनावी झटका दिया और अपने वोट आधार का विस्तार दिखाया।

अब 2027 में सपा के सामने अगला सवाल यही है कि क्या वह अपने मौजूदा सामाजिक गठजोड़ के साथ हिंदू मतदाताओं के उस हिस्से तक भी पहुंच बना सकती है, जो लंबे समय से BJP की राजनीति के करीब रहा है।

तो क्या अखिलेश के लिए अब राम-हनुमान राजनीतिक जरूरत बन गए हैं?

इसका अंतिम जवाब 2027 के चुनावी नतीजों से ही मिलेगा। लेकिन इतना जरूर है कि अखिलेश यादव की राजनीतिक भाषा में धार्मिक प्रतीकों की मौजूदगी अब एक-दो घटनाओं तक सीमित नहीं रह गई है।

अयोध्या को “सियाराम धाम” बनाने का वादा, राम मंदिर जाने की घोषणा, केदारेश्वर धाम और सनातन से जुड़े बयानों के बाद अब सपा कार्यालय के बाहर हनुमान का आशीर्वाद और “विजय भव: 2027”—ये सभी घटनाएं एक ही दिशा की ओर इशारा करती हैं।

यानी 2027 की लड़ाई में अखिलेश यादव के सामने चुनौती सिर्फ योगी सरकार को घेरने की नहीं है। उन्हें अपनी पार्टी की पुरानी छवि, पारंपरिक सामाजिक आधार और हिंदुत्व की राजनीति के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिससे उनका चुनावी गठजोड़ और बड़ा हो सके।

और शायद यही वजह है कि जिस सियासत में कभी अयोध्या और राम मंदिर से दूरी राजनीतिक पहचान का हिस्सा थी, उसी सियासत में आज राम, सियाराम और हनुमान के प्रतीक चुनावी संदेश का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं।