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कानपुर में धूमधाम से संपन्न हुआ टेशू और झांझी का विवाह – गाने बाजे के साथ पहुंचे बाराती

रिपोर्ट – मनीष भटनागर – कानपुर नगर 
 
Kanpur News – टेसू और झांझी के विवाह की प्रथा कब से चली आ रही है, यह कह पाना बहुत ही मुश्किल है, लेकिन इसकी कहानी अनोखी और अद्भुत है। जो ब्रजभूमि को अलग पहचान दिलाती है। जो ब्रजभूमि से उत्तर प्रदेश समेत बुंदेलखंड तक गांव गांव पहुंच गई है। आधुनिक युग में यह परंपरा कही न कही विलुप्त होते नजर आ रही है, लेकिन आज भी कुछ गांव ऐसे है, जहां पिछले पचास वर्षों से ज्यादा इस परंपरा को जीवित रखा गया है। इसी कड़ी में हम आपको लेकर चलते है कानपुर से महज 35 किलोमीटर दूर साढ़ थाना क्षेत्र के तिवारीपुर गांव में, जहां पिछले 50 वर्षो से इस परंपरा को हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। दशहरे के चौथे दिन देर रात में टेशू और झाँझी की बारात धूमधाम के साथ निकाली जाती है। बारात में हजारों की तादात में बूढ़े, बच्चे और महिलाएं सभी सम्मलित होकर बैंड बाजे के साथ नाचते गाते बारात लेकर झांझी के घर पर पहुंचते है और रीति रिवाज के साथ विवाह संपन्न कराया जाता है।
 
कौड़ियां मानी जाती हैं शुभ 
 
जानकारी के मुताबिक इतिहास के पन्नो पर अगर नजर डाले तो पता चलता है,कि यह परंपरा महाभारत के बीत जाने के दौरान प्रारंभ हुई होगी। क्यों कि यह कहानी लोकजीवन में प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित हुई थी। यह एक ऐसी प्रेम कहानी है जो युद्ध के दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई। यह कहानी महापराक्रमी भीम के पौत्र व घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की कहानी है,जो टेशू के रूप में मनाई जाती है।जिसमे नाक,नाक और मुंह कौड़ी के बनाए जाते है। जिन्हें लड़किया रोज सुबह उसे पानी से जगाने का प्रयास करती हैं। कहा जाता है कि विवाह संपन्न होने के दौरान टेशू का सर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते है। माना जाता है कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की सभी मुरादे पूरी हो जाती है।
 
बारात का हुआ जोरदार स्वागत 
 
बताते चले कि साढ़ थाना क्षेत्र के तिवारीपुर गांव में शरद पूर्णिमा के दिन देर रात टेशू झांझी की बारात का आयोजन किया गया। जहां बारात बैंड बाजे के साथ निकाली गई। बारात में महिलाएं, बच्चे व बुजुर्ग जनाती बाराती बनकर नाचते गाते हुए हर्षोल्लास के साथ पहुंचे। जहां बारात द्वार पर पहुंचने के दौरान टेशू झांझी का विवाह रीति रिवाज के साथ संपन्न कराया गया। ग्रामीणों के अनुसार उनके गांव में यह प्रथा पिछले पचास वर्षों से चली आ रही है। कहा जाता है कि अगर लड़की के विवाह में समस्या आ रही है तो टेशू का विवाह कराने का संकल्प लिया जाता है, वही अगर किसी लड़के के विवाह में समस्या आ रही हो तो वह तीन साल झांझी का विवाह कराए, जिस दौरान समस्या का समाधान जल्द हो जाता है। बताते चले कि इस परंपरा को बहुत की कम लोग जीवित रखे हुए है।