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BANDA NEWS: समूचे देश में अनूठी है बुंदेलखंड की दिवारी, दीपावली में शुरू होता है 12 वर्षों का व्रत

द्वापर युग से जुड़ा है इसका इतिहास

खतरों से भरी है यदुवंशियों की यह परंपरा

दीपावली पर्व पर बुन्देलखण्ड की दिवारी समूचे देश में अनूठी है। इस परंपरा में गोवंश की सुरक्षा, संरक्षण, संवद्धन, पालन के संकल्प का कठिन ब्रत लिया जाता है। बुन्देलखण्ड में दीपावली पर्व पर दीवारी गायन-नृत्य और मौन चराने की अनूठी परंपरा देखते ही बनती है।लेकिन कभी कभी यह काफी घातक भी साबित होती लाठी भांजते समय थोड़ी सी चूक इन मौनियों को घायल भी कर देती है।

दीवाली के मौके पर मौन चराने वाले “मौनिया” ही सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र होते हैं। मौनियों की माने तो इस परंपरा की शुरुआत द्वापर युग से हुई है एक बार जब भगवान कृष्ण गायों को चारा रहे थे और गाय उनकी आंखों से ओझल हो जाती हैं जिसके बाद वह परेशान होकर मौन धारण कर लेते हैं तभी से इस परंपरा की शुरआत होती है। इस परम्परा के अनुसार विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौन चराने का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। तेरहवें वर्ष में मथुरा व वृंदावन जाकर मौन चराना पड़ता है, वहां यमुना नदी के तट पर बसे विश्राम घाट में पूजन का व्रत तोड़ना पड़ता है।

शुरुआत में पांच मोर पंख लेने पड़ते हैं प्रतिवर्ष पांच-पांच पंख जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार उनके मुट्ठे में बारह वर्ष में साठ मोर पंखों का जोड़ इकट्ठा हो जाता है। परम्परा के अनुसार मौन चराने वाले लोग दीपावली के दिन यमुना घाट में स्नान करते हैं। कुछ लोग यमुना-बेतबा के संगम स्थल में स्नान करने जाते हैं फिर विधि पूर्वक पूजन कर पूरे नगर में ढोल नगाड़ों की थाप पर दीवारी गाते, नृत्ये करते हुए उछलते-घूमते हुए अपने गंतव्य को जाते हैं। इस दिन मौनिया श्वेत धोती ही पहनते हैं और मोर पंख के साथ-साथ बांसुरी भी लिए रहते हैं। मौनिया बारह वर्षों तक मांस व शराब आदि का सेवन नहीं करते हैं। मौनियों का एक गुरु होता है जो इन्हें अनुशासन में रखता है।

मौनिया व्रत की शुरुआत सुबह गौ (बछिया) पूजन से होती है। इसके बाद वे गौ-माता व श्रीकृष्ण भगवान का जयकारा लगाकर मौन धारण कर लेते हैं फिर गोधूलि बेला में गायों को चराते हुए वापस नगर-गांव पहुंचते हैं। यहाँ विपरीत दिशा से आ रहे गांव/नगर के ही मौनियों के दूसरे समूह से भेंट करते हैं और फिर सभी को लाई-दाना व गरी बतासा-गट्टा का प्रसाद सभी श्रद्धालुओं को वितरित करते हैं।
इसी कारण दिवाली में सभी बुंदेलखंडी गोवशों को रंगते और सजाते हैं।

दीपावली में दीवारी गाने और दीवारी नृत्य की अपनी अनूठी परंपरा है। दीवारी गाने व खेलने वालों में मुख्यतः अहीर, गड़रिया, आरख केवट आदि जातियों के युवक ज्यादा रुचि रखते हैं।

दिवारी गीत – “बाबा नंद के छौना’ तुमने भली डराई रीति, कातिक के महीना मां घर-घर दीन सूचना,
व देश दीवारी दो दिना, मथुरा बारह मास, नित राही गोवर्धन धरे, कान्हा खिलावें गाय”

दूसरे दिन दीवारी गाने वाले सैकड़ों ग्वाले लोग गांव नगर के दरवाजे पर पहुंचकर मजबूत लाठियों से दीवारी खेलते हैं। उस समय भयानक युद्ध का दृश्य नजर आता है। एक दूसरे पर पूरी ताकत से लाठियां भांजते हैं अपनी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
नृत्य में धोखा होने से कई बार लोग चुटहिल भी हो जाते हैं। लेकिन परम्पराओं से बंधे ये लोग इसका कतई बुरा नहीं मानते हैं। इन्हीं अनूठी परम्पराओं के चलते बुन्देलखण्ड की दीवारी का पूरे देश में विशिष्ट स्थान व अनूठी पहचान है।