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पूर्णिया में डायन के शक में नरसंहार: 5 लोगों को जिन्दा जलाया

पूर्णिया में डायन के शक में नरसंहार: एक ही परिवार के 5 लोगों को पीट-पीट कर ज़िंदा जलाया, गांव में दहशत और सन्नाटा

बिहार के पूर्णिया ज़िले से आई इस खौफनाक खबर ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। मुफस्सिल थाना क्षेत्र के टेटगामा गांव में एक पूरा परिवार — पति, पत्नी, बेटा, बहू और एक बुजुर्ग महिला — को सिर्फ इस शक में की वे ‘डायन’ हैं, पहले बेरहमी से पीटा गया और फिर जिंदा जलाकर मार दिया गया।

घटना इतनी भयावह है कि जो सुने, उसका ज़मीर कांप उठे। यह कोई कबीलाई जंगल नहीं, बल्कि 21वीं सदी के भारत का एक गांव है, जहां आज भी अंधविश्वास और भीड़तंत्र मिलकर न्याय की जगह नरसंहार करते हैं।

पूर्णिया में डायन के शक में नरसंहार: एक मासूम की बीमारी, और शुरू हुआ मौत का सिलसिला

इस वीभत्स कांड की शुरुआत एक बच्चे की बीमारी से हुई थी। गांव में रहने वाले उरांव समुदाय के एक बच्चे की तबीयत कुछ दिनों से खराब चल रही थी, और उसकी मौत हो गई। दुखद यह था कि इस मौत के पीछे किसी बीमारी को नहीं, बल्कि काला जादू और ‘डायन’ का हाथ माना गया।

गांव वालों ने उस परिवार पर आरोप लगाया जो वर्षों से वहीं रह रहा था — बाबूलाल उरांव और उनका पूरा परिवार। पहले तो उन्हें ताना मारा गया, फिर घर में घुसकर उन्हें खींचकर बाहर निकाला गया।

दरिंदगी की हद: ज़िंदा जला दिए गए 5 लोग

बाबूलाल उरांव, उनकी पत्नी सीता देवी, बेटा मनजीत, बहू रनिया देवी और एक बुजुर्ग महिला तपतो मोसमत — इन सभी को भीड़ ने पकड़ लिया। पहले उन्हें बेरहमी से पीटा गया, फिर उन पर पेट्रोल छिड़क कर आग के हवाले कर दिया गया। चीखें गूंजीं, लेकिन गांववालों की आंखें लाल थीं — इंसान नहीं, हैवान बन चुके थे वे।

जलते हुए शरीर भागते रहे, लेकिन कोई उन्हें बचाने नहीं आया। सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें ‘डायन’ कहा गया था।

पूर्णिया में डायन के शक में नरसंहार: गांव में पसरा सन्नाटा, इंसानियत हुई शर्मसार

घटना के बाद पूरा टेटगामा गांव जैसे खामोश हो गया। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं। ज्यादातर घरों पर ताले लटक रहे हैं। पुलिस की पूछताछ में भी कोई मुंह नहीं खोल रहा। लोग गांव छोड़कर भागने लगे हैं, क्योंकि सबको डर है — अब कानून सवाल पूछेगा।

पर क्या ये वही बिहार है जहां महात्मा बुद्ध ने करुणा और विवेक का संदेश दिया था? क्या यही समाज है जिसे ‘सभ्य’ कहा जाता है?

पुलिस कार्रवाई – शव बरामद, गिरफ्तारियां शुरू

घटना के तुरंत बाद पुलिस हरकत में आई। पांचों शवों को जलकुंभी में फेंक दिया गया था, जिन्हें पुलिस ने बरामद किया।
तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, और मामले में फॉरेंसिक जांच तथा डॉग स्क्वायड को भी लगाया गया है। ट्रैक्टर भी जब्त कर लिया गया है, जिससे शव ले जाए गए थे।

पूर्णिया SDPO पंकज कुमार शर्मा ने बताया कि शवों की शिनाख्त हो चुकी है, और आगे की कानूनी कार्रवाई तेजी से की जा रही है।

पूर्णिया में डायन के शक में नरसंहार: क्यों नहीं रुक रही डायन कहानियों की ये खूनी श्रृंखला?

यह कोई पहली घटना नहीं है। बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में हर साल दर्जनों महिलाएं और परिवार अंधविश्वास के नाम पर मारे जाते हैं।

कभी फसल खराब हो तो “डायन” जिम्मेदार

कभी बच्चा बीमार पड़े तो “डायन” की छाया

और फिर भीड़ का फैसला — मार दो, जला दो!

क्या हमने विज्ञान, शिक्षा और संविधान को ताक पर रख दिया है? क्या पंचायतों और गांवों में आज भी इंसान की कीमत भीड़ के शक से कम है?

जरूरत है जनजागरूकता और कानून के क्रियान्वयन की

भारत में “डायन प्रथा” के खिलाफ कानून है। झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में अलग-अलग कानून भी बने हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा, तब तक ये हत्याएं जारी रहेंगी।

हर पंचायत, हर स्कूल, हर प्रशासनिक इकाई को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि अंधविश्वास के खिलाफ खुलेआम मुहिम छेड़ी जाए।

अंत में एक सवाल — क्या तुम भीड़ का हिस्सा बनोगे या इंसानियत का प्रहरी?

जो आज हुआ, वो कल किसी और के साथ हो सकता है।
किसी का शक, किसी का वहम, किसी का अंधविश्वास — और जलती हुई जिंदगियां।

हे इंसान! अब भी नहीं रुके… तो ये आग पूरे समाज को भस्म कर देगी।

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