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पीलीभीत में टाइगर का खूनी खेल!, दो महीने में 6 किसानों को मार डाला, फुलहर में फिर किसान बना निवाला

पीलीभीत से दर्दनाक और दहला देने वाली खबर: एक और किसान बना बाघ का निवाला, दो महीने में छठी मौत! | प्रशासन, टाइगर रिजर्व और नेताओं की नाकामी से जा रही इंसानों की जान | कौन रोकेगा यह खूनी खेल?

पीलीभीत में टाइगर का खूनी खेल!, इंसानों की कब्रगाह बनता जा रहा टाइगर रिजर्व: पीलीभीत में एक और किसान की दर्दनाक मौत, प्रशासन बना तमाशबीन!

सुबह का सन्नाटा, खेत में मौत का तांडव

सोमवार की सुबह, जब गांव फुलहर के 50 वर्षीय किसान दयाराम खेत में फसल की रखवाली कर रहे थे, तभी घात लगाए बैठे बाघ ने उन पर झपट्टा मारा और देखते ही देखते उन्हें मौत के घाट उतार दिया। खेत से मात्र 20 मीटर की दूरी पर बसे घर में उस समय परिवार अपने रोज़ के कामों में व्यस्त था, लेकिन एक पल में जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

दयाराम का अधखाया शव खेत में पड़ा मिला, तो पूरे गांव में कोहराम मच गया। महिलाओं की चीखें, बच्चों की सिसकियां और परिवार का बिलखता हाल देखकर हर आंख नम हो गई।

पीलीभीत में टाइगर का खूनी खेल!, दूसरे महीने की छठी हत्या- क्या टाइगर रिजर्व अब ‘ह्यूमन किल ज़ोन’ बन चुका है?

इस सनसनीखेज मौत के साथ ही पीलीभीत में दो महीनों में बाघ द्वारा मारे गए किसानों की संख्या छह हो चुकी है:

तारीख पीड़ित का नाम गांव/क्षेत्र स्थिति
14 मई हंसराज नजीरगंज खेत में सिंचाई के दौरान मारे गए
18 मई राम प्रसाद चतीपुर गन्ने की छिलाई करते वक्त मारे गए
25 मई लौंगश्री खिरकिया बरगदिया गन्ने की निराई करते वक्त मारे गए
03 जून रेशमा शांतिनगर घर में बर्तन धोते वक्त बाघ उठा ले गया
09 जून अज्ञात किसान मेवात पुर खेत में मारे गए
14 जुलाई दयाराम फुलहर फसल की रखवाली करते वक्त मारे गए

अब तक कितने इंसान खा चुका है जंगल का ‘ बाघ, तेंदुआ’? – एक चौंकाने वाला विश्लेषण

जबसे पीलीभीत टाइगर रिजर्व अस्तित्व में आया (2008), तबसे अब तक लगभग 42 से अधिक इंसानों की मौत बाघ, तेंदुआ या चीतों के हमले में हो चुकी है। इनमें से अधिकतर पीड़ित किसान, ग्रामीण महिलाएं और मजदूर हैं, जो जंगलों से सटे क्षेत्रों में अपने खेतों में काम करते थे।

इन मौतों का कोई एक आधिकारिक आंकड़ा वन विभाग ने आज तक सार्वजनिक नहीं किया। न ही कभी गंभीर समीक्षा हुई कि आखिर इंसानों की लाशें क्यों निकल रही हैं?

पीलीभीत में टाइगर का खूनी खेल!, प्रशासन और नेतागण-एक ‘स्क्रिप्टेड दुख’ दोहराते हुए

हर मौत के बाद एक जैसी स्क्रिप्ट दोहराई जाती है:

मौके पर वन विभाग की टीम पहुंचती है

नेता दुख प्रकट करते हैं और जांच की बात करते हैं

कुछ हज़ार रुपये का मुआवजा या नहीं के बराबर सहायता

और फिर एक और मौत…

 लेकिन न कोई स्थायी समाधान, न बाघ को पकड़ने की ठोस योजना, और न ही लोगों की सुरक्षा की गारंटी।

मरे किसानों के परिवार: बदहाली, बेबसी और बर्बादी की कहानी

दयाराम के परिवार में अब कोई कमाने वाला नहीं बचा। पत्नी बेसुध है, बेटा रोते हुए कहता है, “पापा की मौत से हमारा सबकुछ चला गया। हम खेत में काम करते हैं, बाघों को क्या मालूम कौन गरीब है, कौन अमीर?”
ऐसी ही दास्तां बाकी सभी पीड़ित परिवारों की है — कोई सरकारी नौकरी नहीं, कोई पेंशन नहीं, और कोई स्थायी सहायता नहीं।

वायदे बहुत, क्रियान्वयन शून्य

राजनेताओं के वादे:

“हर पीड़ित को ₹5 लाख सहायता” (मौके पर मिला ₹50 हज़ार या उससे भी कम)

“टाइगर रिजर्व के पास बाड़बंदी कराई जाएगी” (आज तक नहीं हुई)

“बाघ को ट्रैंकुलाइज़ कर पकड़ा जाएगा” (अभी तक सब ‘प्लानिंग स्टेज’ में)

वन विभाग की बातें:

“बाघ जंगल छोड़कर इंसानी बस्तियों में क्यों आ रहे हैं, हम नहीं जानते।”

“लोग जंगल में न जाएं, जवाब नहीं, बहाने…

कौन जिम्मेदार? प्रशासन, विभाग या ‘गैर-जिम्मेदार योजना’?

वन विभाग: बाघों की संख्या बढ़ाने पर जोर, लेकिन इंसानों की सुरक्षा की प्लानिंग नहीं।

राजनेता: जंगल बचाओ, लेकिन सुरक्षा नहीं।

प्रशासन: रिपोर्ट बनाओ, फाइल बंद करो।

स्थानीय NGO और एक्टिविस्ट: सोशल मीडिया पोस्ट के आगे नहीं बढ़ते।

समाधान क्या? अब और कितनी लाशें चाहिएं?

जंगल से सटी बस्तियों में CCTV और अलार्म सिस्टम लगे।

रात के समय जंगल की सीमा पर गश्त अनिवार्य हो।

प्रत्येक गांव में ‘टाइगर अलर्ट टीम’ गठित की जाए।

बाघों को ट्रैंकुलाइज करके मुख्य जंगलों तक सीमित किया जाए।

जंगल से सटी आबादी को उचित पुनर्वास का विकल्प दिया जाए।

एक सच्चाई जो गला घोंटती है

यह कोई वन्यजीव प्रेमियों से दुश्मनी की बात नहीं, यह सवाल है मानव जीवन के मूल्य का। जंगल बचाइए, लेकिन इंसान मारकर नहीं! टाइगर रिजर्व कोई ‘बाघों का खुला वध स्थल’ नहीं होना चाहिए, जहां हर महीने एक लाश गिराई जाए और फिर वही सरकारी स्क्रिप्ट दोहराई जाए।

जब जंगल के नाम पर करोड़ों खर्च हो सकते हैं, तो इंसानों की जान की कीमत कुछ हजार क्यों?

पीलीभीत DM को खून से लिखा पत्र!, पंचायत निधि भुगतान में भ्रष्टाचार का खुलासा