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पीलीभीत से मैनपुरी तक डग्गामार वाहनों के खिलाफ रोडवेज कर्मियों का विद्रोह, क्या प्रशासन सो रहा है?

मैनपुरी में डग्गामार वाहनों के खिलाफ रोडवेज कर्मियों का विद्रोह: क्या प्रशासन सो रहा है?

पीलीभीत से मैनपुरी: उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में हाल ही में जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक ट्रैफिक बाधा या कर्मचारी आंदोलन नहीं था, बल्कि पूरे ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर एक गहरा सवाल था। डग्गामार वाहनों के लगातार संचालन, प्रशासन की निष्क्रियता और रोडवेज की हो रही बर्बादी के खिलाफ रोडवेज कर्मचारियों का सड़क पर उतर आना इस बात का संकेत है कि अब सहनशक्ति की सीमा पार हो चुकी है। यह वही चेतावनी थी, जो कुछ समय पहले पीलीभीत में भी देखने को मिली थी, जब कर्मचारियों ने खुद मोर्चा संभाल लिया था।

पीलीभीत से मैनपुरी: डग्गामार वाहन बन चुके हैं रोडवेज के लिए नासूर

डग्गामार वाहन यानी वो टैक्सी, ईको वैन, बुलेरो या अन्य यात्री वाहन, जो बिना किसी वैध परमिट, फिटनेस या बीमा के रोडवेज की रूट्स पर धड़ल्ले से सवारियां भरते हैं। ये वाहन न सिर्फ रोडवेज की आमदनी को बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि यात्रियों की जान भी जोखिम में डाल रहे हैं। मैनपुरी में ऐसे वाहनों की भरमार है, लेकिन स्थानीय परिवहन अधिकारी और प्रशासन पूरी तरह से आंख मूंदे बैठे हैं।

पीलीभीत से मैनपुरी तक: एक जैसी तस्वीर

कुछ ही सप्ताह पहले पीलीभीत में भी यही स्थिति देखने को मिली थी। वहां भी ईको वैन जैसे बिना परमिट वाले वाहनों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी थी कि रोडवेज बसें लगभग खाली चलने लगी थीं। वहां के कर्मचारियों ने जब एक के बाद एक शिकायती पत्र दिए और कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने खुद सड़क पर उतरकर करीब 20 अवैध वाहनों को रोककर कार्रवाई कर डाली थी। यही आक्रोश अब मैनपुरी में फूट पड़ा है।

मैनपुरी में कर्मचारियों का फूटा गुस्सा

मैनपुरी में रोडवेज कर्मचारियों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने बसों का संचालन रोक दिया और सड़क पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। देखते ही देखते ट्रैफिक जाम की स्थिति बन गई और यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ी। लेकिन ये विरोध किसी पब्लिक को परेशान करने के लिए नहीं था—यह उस तंत्र के खिलाफ था जो बार-बार लिखित शिकायतों के बावजूद सोया पड़ा था।

पीलीभीत से मैनपुरी: पुलिस और प्रशासन मौके पर तो पहुंचे, लेकिन…

प्रदर्शन की खबर मिलते ही पुलिस और स्थानीय प्रशासन मौके पर पहुंचा। कर्मचारियों से बातचीत की गई और जाम खुलवाने की अपील की गई। लेकिन कर्मचारियों का सवाल साफ था—“हम कब तक खतरे में बसें चलाते रहें और डग्गामार वाहन हमारा हक छीनते रहें?” सवाल यह भी है कि यदि प्रशासन कर्मचारियों के दबाव में आकर तत्काल मौके पर पहुंच सकता है, तो पहले शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

जान जोखिम में डालकर बस चलाने को मजबूर कर्मचारी

डग्गामार वाहन सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं पहुंचाते, बल्कि यात्रियों और कर्मचारियों की जान भी खतरे में डालते हैं। बिना बीमा, बिना फिटनेस और अयोग्य ड्राइवरों द्वारा चलाए जाने वाले इन वाहनों का कोई भी रिकॉर्ड नहीं होता। दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी? रोडवेज कर्मचारी इसी डर और कुंठा से गुजर रहे हैं।

पीलीभीत से मैनपुरी: क्या प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह असंवेदनशील हो गया है?

जब कर्मचारियों की तरफ से कई बार लिखित रूप में शिकायत की गई, तब भी परिवहन विभाग या आरटीओ की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यह सवाल सिर्फ मैनपुरी ही नहीं, उत्तर प्रदेश के हर जिले के परिवहन तंत्र पर खड़ा होता है। क्या प्रशासन अवैध वाहनों के पीछे छिपे ‘सिस्टमेटिक भ्रष्टाचार’ को नजरअंदाज कर रहा है? या फिर ये सब कुछ मिलीभगत से हो रहा है?

अब सिर्फ कार्रवाई नहीं, विश्वास चाहिए

मैनपुरी की घटना यह स्पष्ट करती है कि अब कर्मचारियों को सिर्फ कार्रवाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी और विश्वास चाहिए। अगर समय रहते इन डग्गामार वाहनों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो ये आंदोलन अन्य जिलों में भी फैल सकते हैं। पीलीभीत से मैनपुरी तक फैली यह चिंगारी किसी दिन प्रदेशभर में आग का रूप न ले ले, यह सोचना अब सरकार की ज़िम्मेदारी है।

 सिस्टम की रीसेटिंग की जरूरत

यह विरोध केवल एक क्षेत्रीय आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे राज्य की परिवहन व्यवस्था के लिए एक आईना है। जब तक डग्गामार वाहनों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक रोडवेज की बसें तो चलेंगी, लेकिन सरकारी व्यवस्था रुक जाएगी। प्रशासन को चाहिए कि वह रोडवेज कर्मियों की चिंता को समझे, कार्रवाई करे और सिस्टम को रीसेट करे।

Pilibhit: डग्गामार और अवैध वाहनों को लेकर सड़कों पर बवाल, दो थानों की पुलिस ने संभाला मोर्चा