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Bisalpur-Pilibhit: नवदिया सितारगंज की सड़क, जहां 30 साल से ‘विकास’ गड्ढों में सो रहा है

Bisalpur-Pilibhit:नवदिया सितारगंज की ‘विकास वाली सड़क, तीस साल से गड्ढों का लोकतंत्र, नेताओं के वादों का स्मारक

आजादी को पचहत्तर साल हो चुके हैं, नेता बदल गए, झंडे के रंग बदल गए, चुनावी घोषणाओं के पोस्टर बदल गए… लेकिन अगर कुछ नहीं बदला, तो वह है पीलीभीत जिले के बीसलपुर तहसील का नवदिया सितारगंज गांव। यहाँ की सड़क पिछले तीस साल से उसी तरह खड़ी है — टूटी, बेजान, कीचड़ में लथपथ — मानो विकास का मजाक उड़ाने के लिए जिंदा रखी गई हो।

प्रदेश में भाजपा सरकार गड्डा-मुक्त सड़कों का दावा करती है, लेकिन इस गाँव के लोग पूछ रहे हैं — “गड्डा-मुक्त सड़कें कहाँ हैं? यहाँ तो सड़क-मुक्त गड्डे हैं!”

Bisalpur-Pilibhit: नेताओं का चुनावी मौसम

हर चुनाव से पहले गांव में एक अलग मौसम आता है — ‘नेता जी आगमन’। बड़ी गाड़ियों से धूल उड़ाते हुए, गले में फूलों की माला, चेहरे पर ‘हम ही आपके मसीहा हैं’ वाली मुस्कान, और ज़ुबान पर वो मीठा झूठ — “आपकी सड़क पक्की बनवाएँगे… वोट दीजिए।”
गाँव वाले भी सोचते हैं — चलो, इस बार शायद सच बोल दें। लेकिन जैसे ही जीत का माला उनके गले में डलता है, सड़क का वादा ऐसे गायब हो जाता है जैसे बरसात के बाद खेत का पानी।

Bisalpur-Pilibhit: बरसात, गाँव की वार्षिक यातना शिविर

बरसात आते ही कच्ची सड़क कीचड़ का दरिया बन जाती है। बच्चे स्कूल जाते हैं तो ऐसे गिरते-पड़ते पहुँचते हैं मानो कोई ‘मड रेस’ का चैंपियनशिप चल रहा हो। अगर कोई बीमार हो जाए तो एंबुलेंस बुलाना बेकार है — यहाँ एंबुलेंस को आने में जितना समय लगेगा, उतने में मरीज की बीमारी ही सोच-सोचकर भाग जाए।

श्मशान जाते वक्त भी मुर्दे को चार कंधों से ज्यादा चार गड्डों का सहारा लेना पड़ता है। और अगर किसी दिन बरसात तेज़ हो जाए, तो लगता है शवयात्रा नहीं, तैराकी प्रतियोगिता हो रही है।

Bisalpur-Pilibhit: धर्म से ऊपर कीचड़ का धर्म

गाँव के मुस्लिम समुदाय के लोग भी परेशान हैं। नमाज़ के लिए जाते हैं, लेकिन कीचड़ में पैर रखने के बाद वजू का असर जाता रहता है। नतीजा — अब नमाज़ घर पर ही अदा करनी पड़ती है। यहाँ सड़क धर्म, जाति, और राजनीति — सबको बराबरी से कीचड़ में लपेट देती है।

गुस्सा जो उबल रहा है

अब हालात ऐसे हैं कि लोग कह रहे हैं — “2027 के चुनाव में ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ का बैनर लेकर खड़े होंगे।” यह सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि उस भरोसे की अंतिम चिंगारी है जो कभी नेताओं पर था। ग्रामीण साफ कह चुके हैं — अगर इस बार सड़क नहीं बनी, तो तहसील में धरना होगा और चुनाव का सीधा बहिष्कार।

नेताओं का कर्तव्य या करतब?

नेताओं का असली कर्तव्य क्या था? सड़क बनवाना, गांव को राहत देना, बच्चों को स्कूल पहुँचाना आसान बनाना… लेकिन यहाँ तो नेतागिरी का करतब यही है कि वोट लेकर गायब हो जाओ और पांच साल बाद फिर वही स्क्रिप्ट लेकर लौट आओ।

भावनात्मक निचोड़

नवदिया सितारगंज की सड़क सिर्फ मिट्टी और गड्ढों की कहानी नहीं है — यह तीस साल से बहते आंसुओं का इतिहास है। यह उस भरोसे का मज़ार है जो कभी नेताओं के वादों पर टिका था। नेता आए, मुस्कुराए, झूठ बोले, और चले गए… पीछे रह गए तो सिर्फ कीचड़, गड्ढे और ग्रामीणों की मजबूरी। सवाल बस इतना है — क्या हमने नेताओं को इसी दिन के लिए वोट दिया था, कि वे हमें विकास का सपना दिखाकर कीचड़ का सौगात दें?

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