मऊ का चौंकाने वाला मामला: राशनकार्ड से नाम काटे जाने पर पीड़ित कोबरा सांप लेकर पहुंचा डीएम दफ्तर
मऊ में भूख का विद्रोह: पेट की आग ने दिलाई अद्भुत हिम्मत
गरीब का पेट भरना सरकार की पहली जिम्मेदारी है — यही सरकार की मंशा और घोषणा है। लेकिन जब यही गरीब बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाता है, अधिकारी उसकी गुहार को कूड़े की टोकरी में फेंक देते हैं और ज़िला पूर्ति विभाग के अफसर एसी कमरों में बैठकर मसालेदार चाय की चुस्कियों में मस्त रहते हैं, तो फिर जनता का सब्र जवाब देता है। मऊ में घटी यह घटना सिर्फ़ एक गरीब की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता पर करारा तमाचा है।मऊ जिले में एक गरीब किसान राधेश्याम के सामने प्रशासनिक लापरवाही इतनी बड़ी हो गई कि उसे अपने हक़ के लिए कोबरा सांप उठाकर जिलाधिकारी के दफ्तर तक पहुंचना पड़ा। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि बिना जांच के उसका नाम राशन कार्ड से काट दिया गया और परिवार भुखमरी की कगार पर पहुंच गया।
मऊ में भूख का विद्रोह: डीएम कार्यालय के बाहर हड़कंप
जैसे ही राधेश्याम हाथ में जिंदा कोबरा लेकर डीएम ऑफिस पहुंचा, पूरे दफ्तर में भगदड़ मच गई। पुलिस ने तुरंत उसे पकड़ लिया और सांप को सुरक्षित जंगल में छुड़वा दिया। लेकिन इस घटना ने सिस्टम की संवेदनहीनता का काला चेहरा सबके सामने ला दिया।
मऊ में भूख का विद्रोह: गरीब का पेट खाली, अफसर एसी में मस्त
प्रशासनिक अमले की लापरवाही अब किसी से छिपी नहीं है। वोटर लिस्ट हो या राशन कार्ड, बिना जांच के नाम काट देना मानो रिवाज बन चुका है। वोट चोरी की तरह अब अनाज चोरी भी शुरू हो गई है। सवाल यह है कि गरीब को उसके हिस्से का अनाज कौन दिलाएगा? जब तक वह “सांप” लेकर नहीं पहुंचेगा, तब तक उसकी सुनवाई नहीं होगी?
मऊ में भूख का विद्रोह: मजबूरी ने बनाया आक्रोश
राधेश्याम ने हर दफ्तर के चक्कर काटे, हर जगह आवेदन दिया, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। आखिर जब भूख से बिलखते बच्चों का दर्द उसने देखा, तो उसने ऐसा कदम उठाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। यह कदम उसकी बेबसी और सिस्टम की लापरवाही का सबसे बड़ा सबूत है।
मऊ में भूख का विद्रोह: घटना के बाद हरकत में आया प्रशासन
जैसे ही मामला मीडिया और पुलिस की पकड़ में आया, प्रशासन हरकत में आ गया। आनन-फानन में अधिकारियों ने जांच बैठा दी और आश्वासन दिया कि राधेश्याम का राशन कार्ड तुरंत बहाल कर दिया जाएगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या हर गरीब को अपने अधिकार पाने के लिए ऐसा कदम उठाना होगा?
सरकार की मंशा बनाम अफसरशाही की मस्ती
सरकार बार-बार ऐलान करती है कि “हर गरीब तक राशन पहुँचे, कोई गरीब भूखे पेट न सोए।” लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। ज़िला पूर्ति विभाग सरकार की इस मंशा को ताक पर रखकर एसी कमरों में बैठकर आराम फरमा रहे हैं। गरीब राशन के लिए दर-दर भटकता है, मगर अधिकारियों के लिए यह सिर्फ एक “फाइल” है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब ऐसे अधिकारी जनता के हक़ से खिलवाड़ करते हैं तो उन पर क्या कार्रवाई होती है? हर बार जांच बैठ जाती है, हर बार आश्वासन दिया जाता है, लेकिन दोषी अफसरों पर न तो सख्त गाज गिरती है और न ही उनकी कुर्सी हिलती है। क्या यही “सुशासन” है?
गरीब को अनाज न मिलना सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि अपराध है। जब अधिकारी जान-बूझकर ऐसी गलती करे दफ्तर में बैठकर गरीब के पेट पर लात मार रहे हैं, तो उन्हें सिर्फ नोटिस या चेतावनी नहीं बल्कि निलंबन होना चाहिए।
जिलाधिकारी और पूर्ति विभाग की जिम्मेदारी तय हो
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों गरीब परिवारों की कहानी है जिनका नाम बिना जांच के काट दिया गया है। अब जिलाधिकारी को चाहिए कि ऐसे भ्रष्ट और संवेदनहीन पूर्ति अधिकारी की जिम्मेदारी तय करें और सुनिश्चित करें कि हर गरीब तक सरकार का अनाज पहुंचे।
यह घटना चेतावनी है—अगर अफसरों की संवेदनहीनता ऐसे ही जारी रही तो गरीब जनता के आक्रोश का विस्फोट प्रशासनिक दीवारें भी तोड़ देगा। सरकार की मंशा साफ है—हर गरीब तक अनाज पहुंचे, लेकिन अफसरशाही की लापरवाही इस मंशा पर काला धब्बा है।
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