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पीलीभीत: आस्था या अंधविश्वास? 100 साल पुराना पीपल का पेड़ बना विवाद की जड़, SDM ने कही सख़्त कार्रवाई की बात

पीलीभीत के सखिया गांव का 100 साल पुराना पीपल का पेड़ बना विवाद का कारण

आस्था या अंधविश्वास? रहस्यमयी घटना से शुरुआत

22 जुलाई की सुबह, पीलीभीत जिले की बीसलपुर तहसील के सखिया गांव में अचानक एक विचित्र घटना घटी। गांव के लोगों ने देखा कि रामपुर जिले से आए कुछ अनजान लोग सीधे गांव के एक कोने में स्थित 100 साल पुराने पीपल के पेड़ के पास पहुंचे। जब ग्रामीणों ने उनसे पूछा कि वे यहां क्यों आए हैं तो उन्होंने कहा—
“हमें सपने में भगवान का आदेश मिला है कि इस गांव के पीपल के पेड़ की परिक्रमा करने से हमारी बीमारियां ठीक हो जाएंगी।”

उन लोगों ने पेड़ की परिक्रमा की और तुरंत अपने परिवारवालों को फोन कर बताया कि उनकी तबीयत अब पूरी तरह ठीक है। यह सुनते ही पूरे गांव में हलचल मच गई। कुछ लोगों ने इसे भगवान का चमत्कार माना, तो कुछ ने इसे मनगढ़ंत कहानी और धोखा करार दिया। लेकिन इस घटना के बाद से सैकड़ों लोग यहां पहुंचने लगे और धीरे-धीरे यह स्थान चर्चा का केंद्र बन गया।

आस्था या अंधविश्वास? श्रद्धालुओं के अनुभव – आस्था की गवाही

मुरारी लाल की कहानी

गजरौला के रहने वाले मुरारी लाल बताते हैं कि उनके पैरों में वर्षों से असहनीय दर्द था। देश के कई बड़े डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। लेकिन जब उन्होंने इस पीपल के पेड़ की परिक्रमा की तो उनके पैरों का दर्द धीरे-धीरे गायब हो गया। वे कहते हैं—
“मैं तो इसे भगवान का ही चमत्कार मानता हूं। जहां डॉक्टर असफल रहे, वहां एक पेड़ ने मुझे ठीक कर दिया।”

प्रेमपाल का दावा

सखिया गांव के ही प्रेमपाल बताते हैं कि उन्हें एक गंभीर बीमारी थी। पीलीभीत और शाहजहांपुर तक कई डॉक्टरों से इलाज कराया, दवाइयां खाईं, लेकिन राहत नहीं मिली। प्रेमपाल कहते हैं कि जैसे ही उन्होंने इस पेड़ के नीचे पूजा-अर्चना शुरू की, उनके शरीर में असामान्य ऊर्जा और राहत का अनुभव हुआ।

मदन लाल का चमत्कार

मदन लाल बताते हैं कि उन्हें लकवे (फालिज) का अटैक हुआ था। उनके बेटे ने सहारे से मोटरसाइकिल पर बैठाकर उन्हें यहां लाया। शुरू में वे चलने-फिरने की हालत में नहीं थे। लेकिन पूजा करने और परिक्रमा करने के बाद वे अपने पैरों पर खड़े हो गए। उनका दावा है—
“आज मैं बिना सहारे चल रहा हूं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।”

रोपा देवी की आपबीती

सबसे चौंकाने वाला बयान रोपा देवी का है। वे कहती हैं कि उन्हें कैंसर है और लखनऊ के अस्पताल में लगातार कीमोथेरेपी चल रही थी। इलाज की वजह से उनका शरीर कमजोर हो चुका था। लेकिन इस स्थान पर पूजा करने से उन्हें गहरा मानसिक और शारीरिक आराम मिला। रोपा देवी कहती हैं—
“डॉक्टरों की दवा जहां असर नहीं कर पाई, वहां इस पीपल ने मुझे नई जिंदगी दी है।”

आस्था या अंधविश्वास? आस्था की शुरुआत की कहानी

स्थानीय युवकों का कहना है कि यह सब अचानक शुरू नहीं हुआ। रामपुर से आए कुछ लोगों ने गांव में चरवाहों से पूछा था कि क्या यहां कोई पीपल का पेड़ है। जब उनसे कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें सपने में इशारा मिला है कि यही पेड़ उनकी बीमारियां ठीक कर सकता है।
उन लोगों ने पेड़ की परिक्रमा की और दावा किया कि उनके घरवालों की तबीयत चमत्कारिक रूप से ठीक हो गई। इसी घटना के बाद यह चर्चा गांव-गांव फैल गई और लोग दूर-दूर से आने लगे।

महिलाएं बनीं आस्था की वाहक

खासकर महिलाएं बड़ी संख्या में इस पेड़ के नीचे जुटने लगीं। वे पूजा, भजन-कीर्तन और परिक्रमा कर रही हैं। उनका कहना है कि यहां आकर उन्हें मानसिक शांति और बीमारियों से राहत मिलती है। धीरे-धीरे यह स्थान महिलाओं के लिए धार्मिक केंद्र जैसा बन गया है।

आस्था या अंधविश्वास? विरोध की आवाज़ें – चमत्कार या जमीन कब्ज़ा?

बबली सिंह का आरोप

गांव की युवती बबली सिंह कहती हैं कि उनके पिता का निधन हो चुका है और परिवार पहले ही परेशानियों से जूझ रहा है। अब लोग चमत्कार के नाम पर उनकी जमीन पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। उनका कहना है कि—
“यहां कोई चमत्कार नहीं हो रहा। यह सब हमारी जमीन पर कब्जा करने का तरीका है।”

ज्योति का बयान

गांव की महिला ज्योति बताती हैं कि उनके पास एक एकड़ जमीन है और लोग इस पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। उनका कहना है कि आस्था और चमत्कार की आड़ में भूमाफिया सक्रिय हैं।

शकुंतला देवी की गवाही

गांव की बुजुर्ग शकुंतला देवी कहती हैं कि यह पेड़ तो कई दशकों से खड़ा है, लेकिन कभी यहां पूजा नहीं हुई। अचानक ‘चमत्कार’ की कहानियां फैलना यह साबित करता है कि यह केवल जमीन हड़पने का षड्यंत्र है।

आस्था या अंधविश्वास? सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती

यूपी की योगी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बड़े कदम उठाए हैं। अयोध्या, काशी, मथुरा जैसे धार्मिक स्थलों पर सरकार ने न सिर्फ करोड़ों रुपये खर्च किए बल्कि छोटे-छोटे धार्मिक स्थलों को भी विकसित करने का काम किया।

साथ ही सरकार ने साफ संदेश दिया है कि धर्म और आस्था का सम्मान होगा, लेकिन अंधविश्वास और धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इसी तरह, भूमाफियाओं पर भी योगी सरकार का बुलडोज़र लगातार चलता रहा है। भूमि कब्ज़ाने वाले गैंग पर अंकुश लगाने के लिए भूमि माफिया टास्क फोर्स का गठन किया गया है। कई जिलों में हजारों बीघा जमीन माफियाओं से छुड़ाई गई।

ऐसे में सखिया गांव का यह मामला प्रशासन के लिए दोहरी चुनौती है—

अगर यह स्थान सचमुच श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन चुका है तो इसे धार्मिक स्थल की तरह संरक्षित किया जाना चाहिए।

लेकिन अगर यह केवल भूमाफियाओं की चाल है तो इसे तुरंत रोककर निर्दोष ग्रामीणों को बचाना जरूरी है।

यही कारण है कि प्रशासन को अब जल्द ही इस मामले की तह तक जाना होगा। वरना न तो आस्था की रक्षा हो पाएगी और न ही जमीन हड़पने की चाल रुक पाएगी।

बड़ा सवाल – आस्था, अंधविश्वास या षड्यंत्र?

गांव के लोग अब तीन हिस्सों में बंट चुके हैं—एक वर्ग इसे भगवान का चमत्कार मान रहा है, दूसरा इसे अंधविश्वास बता रहा है और तीसरा वर्ग खुलकर कह रहा है कि यह सब भूमाफियाओं की साजिश है।

इतिहास गवाह है कि आस्था और अंधविश्वास की आड़ में कई बार लोगों को गुमराह कर जमीन कब्ज़ाने और पैसा कमाने के खेल खेले गए हैं। सवाल उठता है कि क्या सखिया गांव का यह मामला भी वैसा ही है?

सखिया गांव का 100 साल पुराना पीपल का पेड़ आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय है। एक ओर श्रद्धालु इसे दिव्य मानकर पूजा में जुटे हैं, तो दूसरी ओर कई ग्रामीण इसे केवल धोखा और षड्यंत्र बता रहे हैं।

फिलहाल यह तय करना प्रशासन और सरकार के जिम्मे है कि यह स्थान आस्था का केंद्र है या अंधविश्वास और भूमाफियाओं की नई चाल।
लेकिन इतना तय है कि यह पेड़ आने वाले दिनों में पीलीभीत ही नहीं, पूरे प्रदेश की सुर्खियों में रहेगा।

आस्था या अंधविश्वास? प्रशासनिक पक्ष

जब इस पूरे मामले को लेकर बीसलपुर के एसडीएम से बातचीत की गई तो उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला फिलहाल मेरे संज्ञान में नहीं है। अभी तक इस संबंध में मुझे कोई लिखित शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। यदि आगे चलकर कोई शिकायत आती है तो जमीन पर कब्ज़ा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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