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पीलीभीत: लिटिल एंजेल स्कूल पर एक लाख के जुर्माने ने खोली पोल — किताबों के नाम पर लूट का पूरा गोरखधंधा, स्कूल-दुकानदार और किसका गठजोड़?

पीलीभीत में लिटिल एंजेल पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। जांच में सामने आए गोरखधंधे और नियमों के उल्लंघन से मचा हड़कंप।

किताबों के नाम पर लूट का पूरा गोरखधंधा — स्कूल, दुकानदार और सियासत का गठजोड़

पीलीभीत। लिटिल एंजेल स्कूल पर लगा एक लाख रुपये का जुर्माना महज एक स्कूल की कहानी नहीं है — यह उस पूरे सड़े हुए तंत्र की एक झलक है जो वर्षों से अभिभावकों की जेब काटता आ रहा है। इस खेल में एक तरफ हैं नामी-गिरामी private school, दूसरी तरफ हैं चुनिंदा book seller, और तीसरी तरफ है वह सियासी छतरी जो इस पूरे गोरखधंधे को सुरक्षित रखती है।

कैसे चलता है यह खेल?, जरा समझिये 

असल में यह खेल बड़े सुनियोजित तरीके से चलता है। शहर के तमाम नामी private school किसी एक खास दुकान से गुपचुप “deal” कर लेते हैं। फिर NCERT की किताबों की जगह “पूरक अध्ययन सामग्री” का हवाला देकर ऐसी किताबें बच्चों पर थोपी जाती हैं जो न तो केंद्र सरकार से, न राज्य सरकार से और न ही CBSE से अनुमोदित होती हैं।
इन किताबों की खासियत यह होती है कि इन पर या तो स्वयं स्कूल का नाम छपा होता है, या फिर किसी ऐसे खास लेखक और प्रकाशक का नाम होता है जिनकी किताब केवल उसी “deal वाली दुकान” पर मिलती है। शहर की किसी दूसरी दुकान पर ये किताबें नहीं मिलतीं। कोई दूसरे शहर से ढूंढ लाए तो बात अलग है, लेकिन आम अभिभावक के पास इतना वक्त और साधन कहाँ?

Monopoly का फायदा — जो दाम लिखा, वही देना होगा

जब किसी एक ही दुकान पर किताब मिलती हो, तो स्वाभाविक है कि वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती। किताब पर जो दाम की पर्ची लगी है, अभिभावक को वही चुकाना होगा — एक रुपया भी कम नहीं। मोलभाव की कोई गुंजाइश नहीं।
इसके बाद वह “deal वाली दुकान” हर किताब पर एक तय commission उस school को पहुँचाती है। यह commission नकद होता है — कोई receipt नहीं, कोई हिसाब-किताब नहीं, कोई आयकर नहीं। अभिभावक की जेब से निकला पैसा इस तरह स्कूल प्रबंधन और दुकानदार के बीच बंदरबाँट हो जाता है।
उधर वही दुकानदार अपनी बही-खातों में बिक्री तो पूरी दिखाता है, लेकिन commission और असली मुनाफे की रकम को account से बाहर रखकर जमकर tax चोरी भी करता है। यानी एक तरफ अभिभावक लुटता है, दूसरी तरफ सरकारी खजाने को भी चूना लगता है।

पीलीभीत में सबको पता है, पर कोई बोलता नहीं

पीलीभीत की बात करें तो पूरे शहर को मालूम है कि इस तरह का कारोबार Station Road और JP Road पर धड़ल्ले से चल रहा है। लोग जानते हैं, समझते हैं, लेकिन बोलते नहीं — और इसकी वजह भी साफ है।
इन book seller ने अपनी “सुरक्षा” का पूरा इंतजाम कर रखा है। व्यापार मंडल में पद हासिल कर लिया है। जब भी स्थानीय विधायक का काफिला दुकान के सामने से गुजरता है तो दुकान के बाहर से फूलों की बारिश होती है। प्रमुख पर्वों पर विधायक और मंत्रियों के साथ बड़े-बड़े flex banner लगाए जाते हैं — संदेश साफ होता है कि यह दुकानदार कमजोर नहीं है, किसी अधिकारी को इनकी दुकान की तरफ जाँच के लिए कदम रखने की हिम्मत न हो।
जो अधिकारी “खर्चा-पानी” लेकर शांत रहना पसंद करते हैं — महीने का या साल का — वे चुपचाप लेते रहते हैं और यह तंत्र चलता रहता है।

रंग बदलता है, खेल नहीं बदलता

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन book seller की सियासी निष्ठा सत्ता के साथ-साथ बदलती रहती है। जब प्रदेश में Samajwadi Party की सरकार थी, तो इनकी दुकानों के बाहर समाजवादी नेताओं, मंत्रियों और पदाधिकारियों के साथ banner और poster सजते थे। अब BJP की सरकार है, तो BJP के विधायकों, मंत्रियों और पदाधिकारियों के साथ शुभकामना banner लहराते नजर आते हैं।
विचारधारा से इनका कोई लेना-देना नहीं — बस सत्ता से नाता बनाए रखना है ताकि यह गोरखधंधा निर्बाध चलता रहे। कुल मिलाकर — सब set है।

असमानता की तस्वीर — deal वाले और बाकी दुकानदार

एक और कड़वी सच्चाई यह है कि जिन book seller को यह “deal” नसीब नहीं हुई, वे इन्हीं की दुकानों के आसपास बैठकर सामान्य कारोबार करते नजर आते हैं। एक ही बाजार में दो तरह के दुकानदार — एक जो तंत्र का हिस्सा है और रातोंरात अमीर होता जा रहा है, दूसरा जो ईमानदारी से काम करते हुए जूझ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में इन “deal वाले” book seller की संपत्ति में जो बेतहाशा वृद्धि हुई है, वह इसी system की देन है।

उम्मीद की एक किरण

जिला विद्यालय निरीक्षक राजीव कुमार द्वारा लिटिल एंजेल स्कूल पर की गई कार्रवाई से एक उम्मीद जगी है। यदि यह कार्रवाई केवल एक स्कूल तक सीमित न रहकर पूरे तंत्र पर शिकंजा कसने की शुरुआत बने — यानी संबंधित विभाग इन “deal वाले” book seller की भी जाँच करें, उनके अघोषित commission और cash लेनदेन की पड़ताल हो, tax चोरी पर Income Tax विभाग की नजर जाए — तो शायद पीलीभीत के अभिभावकों को इस लूट से कुछ राहत मिल सके।
वरना यह जुर्माना भी बस एक खानापूर्ति बनकर रह जाएगा और अगले session में फिर वही किताबें, वही दुकान, वही commission और वही बंदरबाँट।

सवाल यह नहीं है कि यह सब होता है — सवाल यह है कि यह सब जानते हुए भी कब तक चुप रहा जाएगा?