पूनम की मौत ने खोला मेडिकल कॉलेज का ‘रेफरल खेल’! जांच रिपोर्ट के बाद अब ज्ञापन ने बढ़ाई हलचल, मरीजों को निजी अस्पताल भेजने और कमीशनखोरी के आरोपों की खुली परतें
हाथ फ्रैक्चर के ऑपरेशन के दौरान महिला की मौत के बाद जांच कमेटी ने CMO को सौंपी रिपोर्ट, जिला अस्पताल परिसर में मरीजों को निजी अस्पतालों तक पहुंचाने वाले कथित नेटवर्क का खुलासा, कुछ सरकारी डॉक्टरों के निजी अस्पतालों में इलाज करने की बात भी सामने आई
पीलीभीत। सरकारी अस्पताल में इलाज की आस लेकर पहुंचने वाले मरीजों को क्या इलाज मिलने के बजाय निजी अस्पतालों का रास्ता दिखाया जा रहा है? क्या सरकारी अस्पताल की व्यवस्था के भीतर ही मरीजों को निजी नर्सिंग होम तक पहुंचाने का कोई कथित नेटवर्क सक्रिय है? और क्या इस पूरे खेल के पीछे कमीशन का लालच काम कर रहा है?
पूनम अवस्थी की मौत के मामले में सामने आई जांच रिपोर्ट ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। अब इस पूरे प्रकरण के साथ कुछ दिन पहले जिलाधिकारी को दिए गए एक ज्ञापन ने भी मामले को नया मोड़ दे दिया है। विश्व हिन्दू महासंघ, जनपद पीलीभीत की ओर से जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह को दिए गए ज्ञापन में राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं जिला चिकित्सालय में मरीजों को कथित रूप से निजी अस्पतालों में रेफर किए जाने और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की मांग की गई थी। ज्ञापन में मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग भी की गई थी।
पूनम की मौत ने खोल दी व्यवस्था की सबसे गंभीर गांठ
पूरा मामला दो अगस्त से जुड़ा है। पूनम अवस्थी रेलवे स्टेशन पर गिर गई थीं और उनके हाथ में फ्रैक्चर हो गया था। परिजन इलाज की उम्मीद लेकर उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे।
आरोप है कि जिला अस्पताल पहुंचने के बाद उन्हें निजी अस्पताल में इलाज कराने की सलाह दी गई। इसके बाद वह डॉ. अक्षत पांडे के धन्वंतरी निजी अस्पताल पहुंचीं, जहां उनके हाथ के फ्रैक्चर का ऑपरेशन किया गया। इसी दौरान पूनम की मौत हो गई।
महिला की मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की। कमेटी में उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजीव, एनेस्थेटिक वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. राजेश कुमार और ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. संजीव कुमार सक्सेना शामिल रहे।
अब कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सौंप दी है।
जांच रिपोर्ट में मरीजों को निजी अस्पताल भेजने वाले नेटवर्क का पर्दाफाश
जांच के दौरान जिला अस्पताल परिसर में कुछ असामाजिक तत्वों के सक्रिय होने की बात सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, ये तत्व इलाज के लिए आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों को कथित तौर पर गुमराह कर निजी अस्पतालों में जाने की सलाह देते हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पूनम अवस्थी को भी जिला अस्पताल से कथित रूप से बहला-फुसलाकर निजी अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई थी।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—
आखिर सरकारी अस्पताल की चौखट पर पहुंचने वाला मरीज सरकारी इलाज छोड़कर निजी अस्पताल तक कैसे पहुंच जाता है?
और यदि जांच रिपोर्ट में सामने आई बातें सही हैं, तो मरीज को निजी अस्पताल तक पहुंचाने वाले इस कथित नेटवर्क का लाभ किसे मिल रहा था?
कमीशनखोरी के आरोपों ने मचाई खलबली
जांच रिपोर्ट में जिला अस्पताल से मरीजों को निजी अस्पतालों में भेजने वाले नेटवर्क और कमीशनखोरी के आरोपों की पुष्टि होने की बात सामने आई है।
यह आरोप अगर कार्रवाई की कसौटी पर भी सही पाए जाते हैं, तो मामला सिर्फ एक मरीज को निजी अस्पताल भेजने तक सीमित नहीं रह जाता। यह सीधे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
क्योंकि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार सरकारी अस्पताल इसलिए पहुंचते हैं कि उन्हें कम खर्च में इलाज मिल सके। लेकिन यदि किसी मरीज को वहां से निजी अस्पताल की ओर मोड़ा जाता है, तो उसके परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
पुराना ज्ञापन अब बना नए सवालों की चाबी
खास बात यह है कि पूनम अवस्थी की मौत के मामले की जांच रिपोर्ट आने से पहले ही विश्व हिन्दू महासंघ ने इस कथित व्यवस्था को लेकर जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह को ज्ञापन दिया था।
ज्ञापन में संगठन ने राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं जिला चिकित्सालय में कार्यरत कुछ चिकित्सकों, कर्मचारियों एवं बिचौलियों द्वारा गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। इसमें दावा किया गया था कि सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को विभिन्न निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और क्लीनिकों में उपचार के लिए भेजा जाता है और यह कार्य कथित रूप से कुछ कर्मचारियों एवं निजी अस्पतालों की मिलीभगत से कमीशन के उद्देश्य से किया जा रहा है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया था कि गरीब और असहाय मरीज सरकारी अस्पताल में मुफ्त अथवा कम खर्च में इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन निजी अस्पतालों में जाने के बाद उन्हें अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ती है।
यानी सवाल आज नहीं उठा था—सवाल पहले ही जिलाधिकारी की चौखट तक पहुंच चुका था।
डीएम ने कही थी गुप्त जांच और दोषियों पर कार्रवाई की बात
विश्व हिन्दू महासंघ के प्रतिनिधियों ने जब यह ज्ञापन जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह को सौंपा, तब मामले को गंभीरता से लेते हुए गुप्त जांच कराए जाने और शिकायत सही पाए जाने पर कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने की बात सामने आई थी।
अब पूनम अवस्थी की मौत के मामले में जांच कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद पुराने ज्ञापन में लगाए गए आरोपों की चर्चा फिर तेज हो गई है।
सवाल यह है कि—
क्या पहले मिले ज्ञापन में उठाए गए सवाल और अब सामने आई जांच रिपोर्ट एक ही कथित व्यवस्था की ओर इशारा कर रहे हैं?
सरकारी डॉक्टरों पर निजी अस्पतालों में इलाज करने का आरोप —जांच ने उठाया बड़ा सवाल
जांच कमेटी के सामने यह बात भी आई कि जिला अस्पताल में तैनात कुछ डॉक्टर निजी अस्पतालों में जाकर वहां रेफर होकर पहुंचे मरीजों का उपचार और ऑपरेशन करते हैं।
रिपोर्ट में इस व्यवस्था को जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला माना गया है।
अब स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी व्यवस्था में तैनात चिकित्सकों की निजी अस्पतालों में गतिविधियों की वास्तविक स्थिति क्या है और मरीज वहां किन परिस्थितियों में पहुंच रहे हैं?
पूनम की मौत सिर्फ एक मामला या बड़े नेटवर्क की घंटी?
पूनम अवस्थी अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी मौत के बाद उठे सवाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
एक तरफ एक महिला की मौत का मामला है। दूसरी तरफ जांच रिपोर्ट में मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर भेजने वाले कथित नेटवर्क, कमीशनखोरी और सरकारी डॉक्टरों के निजी अस्पतालों में इलाज करने जैसे गंभीर बिंदु सामने आए हैं।
और तीसरी तरफ कुछ दिन पहले जिलाधिकारी को दिया गया वह ज्ञापन है, जिसमें सरकारी अस्पताल से निजी अस्पतालों में मरीजों को भेजे जाने की शिकायत पहले ही दर्ज कराई जा चुकी थी।
अब गेंद स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन के पाले में है।
क्या जांच रिपोर्ट के बाद सिर्फ पूनम की मौत की जिम्मेदारी तय होगी, या सरकारी अस्पताल से निजी अस्पतालों तक चल रहे कथित पूरे ‘रेफरल नेटवर्क’ की जड़ तक पहुंचा जाएगा?
क्या कमीशनखोरी के आरोपों में शामिल लोगों की पहचान होगी?
क्या निजी अस्पतालों में इलाज करने वाले सरकारी डॉक्टरों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर सरकारी अस्पताल मरीजों के इलाज की जगह उन्हें निजी अस्पतालों का रास्ता दिखाने लगे, तो गरीब मरीज आखिर भरोसा लेकर जाए कहां?
अब निगाहें जिलाधिकारी और स्वास्थ्य विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। जांच रिपोर्ट सामने आ चुकी है, पुरानी शिकायत का दस्तावेज भी मौजूद है—अब इंतजार उस कार्रवाई का है जो यह तय करेगी कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में कथित ‘रेफरल खेल’ सिर्फ आरोप है या इसके पीछे सचमुच कोई संगठित नेटवर्क काम कर रहा था।
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