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बहराइच में बाढ़ का कहर “सरयू निगल गई सब कुछ, बचा सिर्फ दर्द और बेबसी!”

सरयू बनी विनाश की धारा: बारिश ने मैदानी इलाकों को बनाया तबाही का मैदान

बहराइच में बाढ़ का कहर “तूफान गुजर गया… लेकिन हम अभी भी वहीं हैं… बिना छत, बिना आसरा!”

उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश अब मैदानी जिलों के लिए अभिशाप बन गई है। नदियों का जलस्तर बढ़ने से निचले इलाके डूबने लगे हैं। बहराइच जिले के महसी तहसील में सरयू नदी का रौद्र रूप इन दिनों गांवों को निगल रहा है।

सरयू की तेज धार ने महसी के जानकी नगर गांव में ऐसी तबाही मचाई है कि वहां के लोग अपने टूटे घरों और उजड़े खेतों को निहारते हुए केवल आंसू बहा पा रहे हैं। नदी की धारा में दर्जनों मकान समा चुके हैं और सैकड़ों बीघे खेत नदी के गर्त में विलीन हो चुके हैं।

जानकी नगर: कभी आबाद था गांव, अब बचे हैं सिर्फ खंडहर

जानकी नगर गांव में पहले 95 घर थे। आज उस गांव में गिनती के कुछ घर ही बचे हैं। जो बचे हैं, उनके मालिक अब खुद अपने मकानों को तोड़ने को मजबूर हैं, ताकि कुछ सामान ही बचा लिया जाए। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले वर्ष सरयू नदी ने अचानक दिशा बदलकर गांव की ओर बहना शुरू कर दिया था, और तब से कटान की रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है।

सिर्फ तीन दिनों में एक दर्जन से अधिक पक्के और कच्चे मकान नदी में समा चुके हैं। किसान अपनी आंखों के सामने अपना घर और खेत बहते देख रहे हैं, लेकिन कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं।

कटान की चपेट में जीवन और उम्मीदें: खेत बहे, भविष्य डूबा

इस आपदा से ना केवल लोगों के घर उजड़े हैं बल्कि उनकी पूरी जीवनशैली भी तहस-नहस हो चुकी है। जिन किसानों की खेती ही एकमात्र आमदनी का साधन थी, उनके खेत ही बह चुके हैं। सौ बीघे से अधिक जमीन कटान की भेंट चढ़ चुकी है।

अब ये किसान न जमीन के मालिक रहे और न अपने घर के। ना फसल बची, ना छत। बस एक दर्द भरी असहाय स्थिति है जो हर आंख को नम कर देती है।

खुले आसमान के नीचे जिंदगी: महिलाओं और बच्चों की सबसे दर्दनाक तस्वीर

ग्रामीणों की व्यथा शब्दों में नहीं समाई जा सकती। गांव की महिला शुशीला, जिनका मकान और खेत नदी में समा गया, अब तिरपाल तानकर खुले में चूल्हा जलाकर अपने बच्चों को खाना खिला रही हैं।

शुशीला (कटान पीड़ित):
“हम सब बह गए हैं बाबू। अब कुछ नहीं बचा। बच्चों को बारिश में कैसे बचाएं, कुछ समझ नहीं आता।”

उनका दर्द अकेला नहीं है। गांव की कई और महिलाएं और परिवार इसी हाल में जीने को मजबूर हैं।

कटान पीड़ितों की गुहार: सरकार सुने हमारी चीख

पीड़ित रमेश और चेतराम जैसे ग्रामीण प्रशासन से राहत की गुहार लगा रहे हैं।

रमेश (कटान पीड़ित):
“घर तो गया ही, अब बच्चों के लिए दवाई और खाना भी नहीं है। कोई सुनने नहीं आता।”

चेतराम (कटान पीड़ित):
“हर साल यही होता है, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता। अब तो लगता है ज़िंदा रहना भी मुश्किल है।”

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन की तरफ से अब तक कोई मदद नहीं पहुंची है, न कोई अधिकारी हाल जानने आया है, और न कोई राहत शिविर लगाया गया है।

प्रशासनिक चुप्पी और लाचार जनता: कब मिलेगा राहत का आसरा?

सरयू नदी का कटान नया नहीं है। हर साल यह गांवों को निगलता है, लेकिन स्थायी समाधान की कोई योजना ज़मीन पर नहीं दिखती। इस बार हालात और भी विकराल हैं। अगर समय रहते राहत, पुनर्वास और सुरक्षा के उपाय नहीं किए गए, तो पूरा जानकी नगर गांव मानचित्र से मिट सकता है।

ये भी वोडो देखिए:-

जरूरत है तत्काल हस्तक्षेप की: राहत कैंप, पुनर्वास और मुआवजा प्राथमिकता होनी चाहिए

सरकार और जिला प्रशासन को अब सिर्फ दौरे और आश्वासन से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। बाढ़ और कटान प्रभावित परिवारों के लिए राहत कैंप, भोजन, पानी, दवाइयां, अस्थायी आवास और आर्थिक मुआवजा देना जरूरी है।

इसके साथ ही इस तरह की आपदा के लिए स्थायी समाधान — जैसे नदी की धारा को नियंत्रित करना, तटबंध निर्माण और कटान रोकने वाली योजनाओं पर तत्काल अमल जरूरी है।

पीड़ितों की बाद यही पुकार:-

“तूफान गुजर गया… लेकिन हम अभी भी वहीं हैं… बिना छत, बिना आसरा!”

जनहित में अपील: इन बेघर परिवारों के लिए आगे आएं, आवाज उठाएं

बहराइच के कटान पीड़ितों की यह चीख सिर्फ उनके गांव तक नहीं रहनी चाहिए। सोशल मीडिया और स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक यह बात पहुंचानी होगी ताकि प्रशासन जागे और इन उजड़े परिवारों को राहत मिल सके।

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