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पीलीभीत में सपा दफ्तर पर बवाल: सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली राहत, संकट बरकरार

सुप्रीम कोर्ट की फटकार: “₹115 में दफ्तर, सत्ता का खेल और कानून की सच्चाई”

पीलीभीत नगर पालिका परिषद में समाजवादी पार्टी (सपा) को मात्र ₹115 मासिक किराए पर कार्यालय आवंटन का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, और अदालत ने इसे सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बताते हुए तीखी फटकार लगाई। यह सिर्फ एक किराए का विवाद नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता का खुलासा है, जहां सरकारी संपत्ति को मनमाने ढंग से कब्जाने की आदत सत्ता के साथ जुड़ जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा – “आप इस समय अनधिकृत कब्जेदार हैं… राजनीतिक ताकत और बाहुबल से हासिल किया गया यह दफ्तर वैध नहीं हो सकता।”

जगदेव सिंह की प्रतिक्रिया: “अभी आदेश अपलोड नहीं, लेकिन न्याय की लड़ाई जारी”

समाजवादी पार्टी पीलीभीत के जिलाध्यक्ष जगदेव सिंह ने इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर अंतिम आदेश अभी अपलोड नहीं हुआ है, इसलिए पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है। उन्होंने बताया कि अदालत ने मौखिक रूप से यह जरूर कहा है कि यह मामला सिविल प्रकृति का है और इसे पीलीभीत जनपद की सिविल अदालत में उठाया जाए। जगदेव सिंह ने स्पष्ट किया कि समाजवादी पार्टी कानूनी प्रक्रिया के तहत अपनी लड़ाई जारी रखेगी और नगर पालिका की ओर से किए गए दफ्तर खाली कराने के कदम को चुनौती देगी। उन्होंने कहा – “हमारा उद्देश्य न्याय पाना है, न कि अवैध कब्जा करना। जो भी कानूनी रास्ता होगा, हम उसका पालन करेंगे और सच को सामने लाएंगे।”

राजनीतिक रसूख बनाम कानून – क्यों फंसी सपा?

सपा के नेता और कार्यकर्ताओं का दावा रहा कि यह कार्यालय नगर पालिका द्वारा 2005 में वैध प्रक्रिया के तहत दिया गया था। लेकिन सच्चाई यह है कि 12 नवंबर 2020 को नगर पालिका परिषद ने इस आवंटन को रद्द कर दिया। वजह साफ थी – कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं हुई थी और ₹115 मासिक किराया न सिर्फ नाममात्र था, बल्कि नगर निगम की नीतियों के भी खिलाफ था।
जून 2024 में प्रशासन ने यह परिसर खाली कराया, विरोध करने वाले 35 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया और नगर पालिका की जमीन को अपने कब्जे में लिया।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “क्या कभी ₹115 में ऐसा दफ्तर सुना है?”

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्यार बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान तल्ख अंदाज़ में सवाल किया –
“क्या आपने कभी सुना कि किसी नगरपालिका परिसर में मात्र ₹115 मासिक पर दफ्तर किराए पर मिले? यह सत्ता के दुरुपयोग और बाहुबल के सहारे कब्जे का मामला है।”
अदालत ने यह भी कहा कि सपा को अब किसी तरह की अंतरिम राहत नहीं मिलेगी और उन्हें सिविल कोर्ट में ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह “अवैध कब्जे” को वैधता नहीं दे सकती।

धोखाधड़ीपूर्ण कब्जा – अदालत की सख्त भाषा

अदालत ने पूरे मामले को “fraudulent occupation using muscle and political power” बताया। यह सिर्फ एक पट्टे का विवाद नहीं, बल्कि सत्ता में रहते हुए जनता की संपत्ति पर नियंत्रण जमाने का उदाहरण माना गया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सपा को कोई विशेष सुविधा नहीं दी जाएगी। अगर उन्हें दफ्तर रखना है, तो वे सिविल प्रक्रिया के तहत अदालत में अपने अधिकार का दावा पेश करें।

कब, कैसे और क्यों? – घटनाक्रम की परतें

2005 में नगर पालिका की जमीन पर सपा का दफ्तर आवंटित किया गया। तब पार्टी सत्ता में थी और नगर पालिका प्रशासन पर उसका प्रभाव माना जाता था।
2020 में नगर पालिका ने इस आवंटन को रद्द किया, यह कहते हुए कि यह न तो नीलामी के जरिए हुआ था और न ही पारदर्शी तरीके से।
जून 2024 में, प्रशासन ने मौके पर कार्रवाई कर दफ्तर खाली कराया। पुलिस बल तैनात किया गया, विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया और नगर पालिका परिसर का नियंत्रण प्रशासन को सौंपा गया।

जनता का सवाल: सरकारी संपत्ति पर कब्जे का अधिकार किसे?

यह विवाद सिर्फ सपा तक सीमित नहीं है। यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है – क्या राजनीतिक दल सरकारी संस्थानों की संपत्ति को नाम मात्र की कीमत पर हमेशा के लिए कब्जाए रख सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी इस मानसिकता को चुनौती देती है और यह संकेत देती है कि सत्ता बदलने के बाद भी कानून को ताक पर नहीं रखा जा सकता।

कानून के कटघरे में सत्ता की ताकत

सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार न केवल सपा के लिए सबक है, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी भी। सरकारी जमीन या संपत्ति पर कब्जा कर लेना आसान हो सकता है, लेकिन कानून की नजर में यह “धोखाधड़ीपूर्ण कब्जा” ही कहलाएगा।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा सिविल कोर्ट में अपनी वैधता साबित कर पाती है या यह मामला आने वाले महीनों में और भी बड़ा राजनीतिक विवाद बनता है।

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