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Pilibhit: हाईवे चौड़ीकरण की आड़ में 1400 पेड़ों पर खतरा, Social Worker ने उठाई ट्रांसप्लांट की मांग

Pilibhit: हाईवे चौड़ीकरण की आड़ में 1400 पेड़ों पर खतरा, सामाजिक कार्यकर्ता ने ट्रांसप्लांट की उठाई मांग

पीलीभीत। विकास की रफ्तार और पर्यावरण के बीच टकराव एक बार फिर सुर्खियों में है। पीलीभीत-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 731(क) के चौड़ीकरण को हरी झंडी मिलने के बाद अब शहर के दायरे में खड़े लगभग 1400 हरे-भरे पेड़ खतरे में हैं। इन पेड़ों को काटने की तैयारी चल रही है, लेकिन शहर के सिविल लाइन साउथ निवासी सामाजिक कार्यकर्ता एडवोकेट शिवम कश्यप ने इस पर गहरी आपत्ति जताई है। उन्होंने जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र  सिंह को पत्र सौंपकर मांग की है कि इन पेड़ों को काटने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से ट्रांसप्लांट किया जाए।

Pilibhit: 1400 पेड़ों पर लटक रही कुल्हाड़ी

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने लगभग 8 किलोमीटर लंबे हिस्से के चौड़ीकरण के लिए मंजूरी दे दी है। इस प्रक्रिया में सड़क किनारे खड़े लगभग 1400 पेड़ों को चिन्हित किया गया है। जैसे ही प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, इन पेड़ों की कटाई शुरू हो जाएगी। स्थानीय नागरिकों के बीच यह चिंता तेजी से बढ़ रही है कि शहर का हरियाली आवरण एक झटके में खत्म हो जाएगा।

Pilibhit: भारतीय वन अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट

एडवोकेट शिवम कश्यप ने जिलाधिकारी को सौंपे पत्र के साथ भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (FRI) देहरादून की एक रिपोर्ट भी संलग्न की है। इस रिपोर्ट में सफलतापूर्वक पेड़ों के ट्रांसप्लांटेशन (स्थानांतरण) की जानकारी दी गई है। उनका कहना है कि जब देशभर में बड़े शहरों जैसे दिल्ली, गुरुग्राम और हैदराबाद में हजारों पेड़ों को सफलतापूर्वक स्थानांतरित किया जा चुका है, तो फिर पीलीभीत में क्यों नहीं?

Pilibhit: वन आवरण में आई गिरावट और खतरा

भारत सरकार के जलवायु परिवर्तन विभाग की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, जनपद पीलीभीत में वन आवरण में 21.6% की कमी आई है। यह चिंता का विषय है क्योंकि पीलीभीत का टाइगर रिजर्व विश्व स्तर पर अपनी जैव विविधता और बाघों की बढ़ती संख्या के लिए जाना जाता है। यदि बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए, तो इससे न केवल वन्यजीवों पर असर पड़ेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में मानव जीवन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

चिपको आंदोलन की गूंज

एडवोकेट कश्यप ने अपने पत्र में ऐतिहासिक चिपको आंदोलन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 1970-80 के दशक में उत्तराखंड के चमोली जिले में सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी और चंडी प्रसाद भट्ट ने पेड़ों के अंधाधुंध कटान को रोकने के लिए चिपको आंदोलन चलाया था। उनका त्याग और संघर्ष हमें यह सिखाता है कि आधुनिक जीवन के लिए भी पर्यावरण की रक्षा सर्वोपरि है। आज यदि विकास के नाम पर पेड़ काटे गए, तो यह उन महान विभूतियों की आत्मा को भी आघात पहुंचाएगा।

विकास बनाम पर्यावरणभारत आज तेजी से आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है। चौड़ी सड़कों और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास की यह रफ्तार प्रकृति की कीमत पर होनी चाहिए? जब ट्रांसप्लांट जैसी तकनीक मौजूद है, तो फिर पेड़ों का अंधाधुंध कटान क्यों? एडवोकेट शिवम कश्यप का कहना है कि सरकार को चाहिए कि वह पेड़ों के ट्रांसप्लांट को नीति का हिस्सा बनाए और इसे आधुनिक तकनीक से और मजबूत करे।

Pilibhit: उच्च संस्थानों तक पहुंचाई मांग

एडवोकेट शिवम कश्यप ने न केवल जिलाधिकारी बल्कि राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT), सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और प्रयागराज हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी पत्र भेजकर इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सरकार और न्यायपालिका इस मामले में ठोस कदम उठाए तो विकास और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन कायम किया जा सकता है।

पीलीभीत-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग का चौड़ीकरण निस्संदेह विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है, लेकिन 1400 पेड़ों का बलिदान पर्यावरण के लिए गहरी चोट साबित होगा। ऐसे समय में जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है, पीलीभीत जैसे हरित जिले को अपने प्राकृतिक खजाने की रक्षा करनी चाहिए। अब देखना यह है कि प्रशासन और सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं—पेड़ों को काटा जाएगा या जीवन देने वाली हरियाली को बचाने के लिए ट्रांसप्लांट का रास्ता अपनाया जाएगा।

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