पंचायत चुनाव से पहले ही बहा खून, समर्थन न देने की कीमत बुज़ुर्ग ने जान देकर चुकाई
बागपत जनपद से सामने आया यह खुलासा न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर लगा एक गहरा, खूनी धब्बा भी है। पंचायत चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन सत्ता की भूख और कुर्सी बचाने की बेचैनी ने बागपत में पहले ही खून की इबारत लिख दी। यह कहानी है उस भरोसे की, जिसे गोली से छलनी कर दिया गया… और उस राजनीति की, जहां वोट इंसान से ज़्यादा कीमती हो गया।
कुर्सी जाने के डर ने एक मौजूदा ग्राम प्रधान को इस कदर अंधा कर दिया कि उसने अपने ही गांव के बुज़ुर्ग को गोलियों कसे भून डाला वजह सिर्फ इतनी थी कि बुज़ुर्ग ने आगामी पंचायत चुनाव में समर्थन देने से इंकार कर दिया।
भोर की खामोशी में गोलियों की गूँज, दुकान खोलते वक्त मौत के घाट उतारे गए ऋषिपाल
यह दिल दहला देने वाली वारदात कोतवाली बागपत क्षेत्र के बिहारीपुर गांव की है।
भोर का वक्त… गांव अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था। सर्द सुबह में बुज़ुर्ग ऋषिपाल रोज़ की तरह अपनी छोटी-सी दुकान खोलने की तैयारी कर रहे थे। तभी गांव के बीचों-बीच अचानक गोली की आवाज गूंजी।
इससे पहले कोई कुछ समझ पाता, ऋषिपाल ज़मीन पर गिर चुके थे। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। गांव में अफरा-तफरी मच गई।
चश्मदीद ने देखे दो लोग, एक ने अंधेरे में छुपा लिया चेहरा
घटना के वक्त मौजूद एक चश्मदीद ने पुलिस को बताया कि उसने दो लोगों को मौके पर देखा, जिनमें से एक ने ऋषिपाल पर गोली चलाई। हालांकि, अंधेरा होने के कारण एक हमलावर के चेहरे पहचान नहीं पाया।
शुरुआत में मामला अंधे कत्ल जैसा लगा, लेकिन पुलिस ने जब परत-दर-परत जांच शुरू की, तो इसके पीछे की सियासी साजिश धीरे-धीरे बेनकाब होने लगी।
समर्थन बदला… और लिख दी गई मौत की स्क्रिप्ट
जांच में सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ कि ऋषिपाल किसी आम दुश्मनी का शिकार नहीं हुए थे।
वह ग्राम प्रधान की कुर्सी की राजनीति में मारे गए।
ऋषिपाल पहले मौजूदा ग्राम प्रधान देवप्रिय के समर्थक थे। लेकिन इस बार पंचायत चुनाव में उन्होंने दूसरे पक्ष के प्रत्याशी अमित को समर्थन देने का मन बना लिया था। गांव में यह चर्चा फैल चुकी थी कि ऋषिपाल खुलकर अमित के पक्ष में उतरने वाले हैं।
बस यही बात प्रधान देवप्रिय को नागवार गुजर गई।
कुर्सी छिनने का डर ने बना दिया हत्यारा
प्रधान को डर था कि अगर गांव के बुज़ुर्ग और प्रभावशाली व्यक्ति ऋषिपाल ने समर्थन बदल लिया, तो चुनाव में उसकी हार तय हो जाएगी।
यही डर धीरे-धीरे नफरत, फिर साजिश और आखिरकार हत्या में बदल गया।
पुलिस जांच में सामने आया कि ग्राम प्रधान देवप्रिय ने सत्ता बचाने के लिए अपने साथियों के साथ मिलकर ऋषिपाल को रास्ते से हटाने की योजना बनाई।
ऐसे रची गई साजिश, ऐसे दिया गया कत्ल को अंजाम
पुलिस के मुताबिक, इस साजिश में देवप्रिय अकेला नहीं था।
उसके साथ प्रियव्रत, ओमवीर, दिनेश और आज़ाद शामिल थे।
भोर का वक्त इसलिए चुना गया ताकि गांव सोता रहे, पहचान न हो और वारदात को अंजाम देकर आसानी से बचा जा सके। लेकिन अपराध कितना भी चालाकी से किया जाए, सच देर-सवेर सामने आ ही जाता है।
पुलिस ने खोला राज, प्रधानी रंजिश निकली हत्या की जड़
घटना के बाद गांव और पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया था। पुलिस ने गंभीरता से जांच शुरू की। कॉल डिटेल, गांव की राजनीति, पुराने विवाद और चश्मदीद के बयान—हर कड़ी को जोड़ा गया।
आखिरकार पुलिस के सामने साफ हो गया कि
यह हत्या प्रधानी चुनाव की रंजिश में की गई थी।
पुलिस ने इस पूरे हत्याकांड से पर्दा उठाते हुए सभी आरोपियों की गिरफ्तारी की पुष्टि की।
पुलिस का बयान, सत्ता की लालच में रची गई साजिश
इस पूरे मामले पर पुलिस अधिकारियों ने साफ कहा कि यह हत्या व्यक्तिगत रंजिश नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता की भूख का नतीजा है।
प्रवीण सिंह चौहान (एएसपी, बागपत) के अनुसार
“जांच में स्पष्ट हुआ है कि हत्या की वजह पंचायत चुनाव में समर्थन बदलना था। सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और आगे की विधिक कार्रवाई की जा रही है।”
गांव में सन्नाटा, सवालों में लोकतंत्र
ऋषिपाल की हत्या के बाद बिहारीपुर गांव में सन्नाटा पसरा है। हर चेहरा सवाल पूछ रहा है—
क्या अब वोट देना भी जानलेवा हो गया है?
क्या लोकतंत्र में समर्थन बदलना सबसे बड़ा गुनाह बन गया है?
यह मामला सिर्फ एक बुज़ुर्ग की हत्या नहीं, बल्कि गांव की राजनीति में घुस चुकी आपराधिक सोच का आईना है, जहां कुर्सी बचाने के लिए इंसान की जान तक ले ली जाती है।