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FCRA Bill: क्या बदलना चाहती है मोदी सरकार? मस्जिद-चर्च की संपत्ति पर क्यों मचा बवाल, क्या किसी धर्म के खिलाफ?

FCRA Bill 2026: क्या बदलना चाहती है मोदी सरकार? मस्जिद-चर्च की संपत्ति पर क्यों मचा बवाल, क्या किसी धर्म के खिलाफ?

FCRA Bill: विदेशी फंडिंग से जुड़े कानून FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) में प्रस्तावित बदलाव को लेकर देश में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों ने बिल के संपत्ति संबंधी प्रावधानों पर चिंता जताई है। ईसाई संगठनों ने सरकार के सामने अपनी आपत्तियां रखी हैं, जबकि अमेरिका में भी कुछ सांसदों की ओर से इस प्रस्ताव की आलोचना हुई है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव किसी धर्म को निशाना बनाने के लिए नहीं हैं और धार्मिक स्थलों का स्वरूप सुरक्षित रहेगा।

FCRA क्या है और इसे क्यों बनाया गया था?

FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act ऐसा कानून है जो भारत में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले चंदे या आर्थिक योगदान को नियंत्रित करता है। इसका मकसद यह तय करना है कि कौन सी संस्था विदेशी फंड ले सकती है, उस पैसे का इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है और उसका हिसाब-किताब कैसे रखा जाएगा।

FCRA के जरिए सरकार विदेशी फंडिंग के माध्यम से देश की संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर नजर रखती है।

1976 में बना था FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान हुई थी। इसके पीछे मुख्य चिंता यह थी कि विदेशी ताकतें आर्थिक मदद के जरिए भारत के राजनीतिक, सामाजिक या अन्य आंतरिक मामलों को प्रभावित न कर सकें।

बाद में इस कानून में कई बार बदलाव किए गए। 2010 में FCRA का नया कानून आया और 2020 में मोदी सरकार ने इसमें कई महत्वपूर्ण संशोधन किए।

2020 में मोदी सरकार ने FCRA को किया था सख्त

2020 में किए गए प्रमुख बदलावों के तहत विदेशी फंड हासिल करने वाले NGOs के प्रशासनिक खर्च की सीमा को 50% से घटाकर 20% कर दिया गया था।

इसके अलावा विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए दिल्ली स्थित SBI की निर्धारित शाखा में FCRA बैंक अकाउंट की व्यवस्था की गई। FCRA से जुड़े संगठनों के बीच विदेशी फंड को आगे ट्रांसफर करने पर भी नियम कड़े किए गए।

अब प्रस्तावित संशोधन में क्या बदलाव हैं?

प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों से जुड़ा है। सरकार की ओर से प्रस्तावित व्यवस्था में FCRA रजिस्ट्रेशन समाप्त होने की स्थिति में ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर नई व्यवस्था बनाने की बात कही गई है।

इसके अलावा संस्थाओं को अपने FCRA रजिस्ट्रेशन में विदेशी फंड के इस्तेमाल का उद्देश्य और संबंधित क्षेत्र को अधिक स्पष्ट रूप से बताने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

‘Designated Authority’ क्यों चर्चा में है?

प्रस्तावित बदलावों में Designated Authority का प्रावधान सबसे ज्यादा चर्चा में है। इस अथॉरिटी को उन संस्थाओं की विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ी शक्तियां देने का प्रस्ताव है, जिनका FCRA रजिस्ट्रेशन समाप्त या रद्द हो चुका है।

यही प्रावधान विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों की सबसे बड़ी चिंता का कारण है। उनका सवाल है कि अगर किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन किसी कारण से समाप्त हो गया तो विदेशी फंड से बनी उसकी संपत्ति का क्या होगा।

रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं हुआ तो क्या होगा?

प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक FCRA रजिस्ट्रेशन की अवधि समाप्त होने के बाद अगर संस्था निर्धारित समय में उसे रिन्यू नहीं कराती है, तो रजिस्ट्रेशन समाप्त माना जा सकता है।

ऐसी स्थिति में संस्था की विदेशी योगदान से बनी संपत्तियों को लेकर Designated Authority की भूमिका शुरू होगी। सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को अनियमित तरीके से इस्तेमाल होने से रोकने के लिए है।

मस्जिद, चर्च या मंदिर का क्या होगा?

यही सवाल इस पूरे विवाद के केंद्र में है। प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर धार्मिक संगठनों की चिंता है कि विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का असर धार्मिक संस्थानों पर भी पड़ सकता है।

सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि अगर संबंधित संपत्ति कोई धार्मिक स्थल है तो उसका धार्मिक स्वरूप नहीं बदला जाएगा। यानी किसी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र को बदलने की अनुमति नहीं होगी।

ईसाई संगठनों को क्यों है चिंता?

केरल, मिजोरम और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में चर्च और ईसाई संस्थाओं से जुड़े संगठन लंबे समय से विदेशी फंडिंग के जरिए स्कूल, अस्पताल, सामाजिक संस्थान और अन्य सेवाएं संचालित करते हैं।

इन संगठनों की चिंता है कि अगर किसी तकनीकी या प्रशासनिक वजह से FCRA रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं हो पाया तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर प्रस्तावित कानून का असर पड़ सकता है।

इसी वजह से ईसाई संगठनों ने सरकार से बिल के प्रावधानों को लेकर स्पष्टीकरण और सुरक्षा की मांग की है।

FCRA के तहत कितनी संस्थाएं हैं?

FCRA के तहत बड़ी संख्या में संस्थाओं ने विदेशी योगदान लेने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। वहीं पिछले वर्षों में हजारों संस्थाओं के FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द या समाप्त भी हुए हैं।

यही आंकड़े इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाते हैं, क्योंकि FCRA रजिस्ट्रेशन समाप्त होने वाली संस्थाओं की संपत्तियों को लेकर प्रस्तावित व्यवस्था भविष्य में बड़ी संख्या में संस्थाओं को प्रभावित कर सकती है।

विदेशी फंडिंग में पहले ही बड़ी गिरावट का दावा

कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर समेत विपक्षी नेताओं का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में FCRA के नियम सख्त होने के बाद विदेशी फंडिंग में बड़ी गिरावट आई है और हजारों संस्थाओं के रजिस्ट्रेशन रद्द हुए हैं।

विपक्ष का कहना है कि नए प्रावधान NGOs, स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संस्थाओं के काम को और मुश्किल बना सकते हैं। हालांकि सरकार का पक्ष है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल नियमों के मुताबिक और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।

अमेरिका में भी उठी आवाज

FCRA में प्रस्तावित बदलाव को लेकर अमेरिका में भी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद रिले मूर ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रस्तावित बदलावों की आलोचना की और इसे भारत में चर्चों तथा धार्मिक चैरिटी के लिए चिंता का विषय बताया।

उनकी टिप्पणी के बाद भारत में यह सवाल भी उठा कि दूसरे देशों के कानूनों पर विदेशी सांसदों की टिप्पणी को किस नजर से देखा जाना चाहिए।

भारत का कहना- यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं

केंद्र सरकार का कहना है कि FCRA संशोधन किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि प्रस्तावित कानून धर्म-निरपेक्ष है और इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग से जुड़ी संपत्तियों और संस्थाओं के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाना है।

सरकार के मुताबिक धार्मिक स्थल का धार्मिक स्वरूप सुरक्षित रहेगा।

अमित शाह ने ईसाई प्रतिनिधिमंडल से की मुलाकात

गृह मंत्री अमित शाह ने 6 अगस्त 2026 को ईसाई संगठनों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। बैठक के दौरान सरकार की ओर से कथित तौर पर यह आश्वासन दिया गया कि प्रस्तावित कानून को पूर्वव्यापी तरीके से लागू नहीं किया जाएगा।

इसके अलावा धार्मिक स्थलों के स्वरूप को सुरक्षित रखने की बात भी कही गई।

PIB ने Designated Authority को लेकर क्या कहा?

सरकार की ओर से यह स्पष्ट करने की कोशिश की गई है कि Designated Authority का उद्देश्य किसी संस्था की संपत्ति को तुरंत स्थायी रूप से जब्त करना नहीं है। व्यवस्था के तहत विदेशी फंड से बनी संपत्ति के प्रबंधन को लेकर प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी।

सरकार का कहना है कि अगर FCRA रजिस्ट्रेशन वैध तरीके से रिन्यू हो जाता है तो संपत्ति से जुड़ी व्यवस्था भी उसी के अनुसार आगे बढ़ सकती है।

FCRA बिल अभी कानून नहीं बना है

यह बात सबसे महत्वपूर्ण है कि प्रस्तावित FCRA संशोधन अभी कानून नहीं बना है। संसद में चर्चा और मतदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इसकी अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।

इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि मस्जिद, चर्च, मंदिर, स्कूल या अस्पताल की संपत्ति निश्चित रूप से सरकार के कब्जे में चली जाएगी। ऐसा केवल प्रस्तावित कानूनी व्यवस्था और संबंधित शर्तें लागू होने की स्थिति में ही सवाल बनेगा।

12 अगस्त को क्या होगा?

12 अगस्त 2026 को इस बिल पर संसद में चर्चा की संभावना को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। विपक्षी दल और कुछ धार्मिक संगठन इसे लेकर आपत्ति जता रहे हैं और बिल को संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने या वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

वहीं सरकार चाहती है कि प्रस्तावित बदलावों पर संसद में विस्तार से चर्चा हो।

क्या सरकार के पास बिल पास कराने के लिए बहुमत है?

FCRA संशोधन विधेयक सामान्य विधायी प्रक्रिया के तहत पारित होने वाला बिल है। इसे पारित करने के लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों का साधारण बहुमत जरूरी होगा।

हालांकि किसी भी बिल के पारित होने की वास्तविक स्थिति सदन में उस समय मौजूद सदस्यों, मतदान और राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। इसलिए केवल सीटों की मौजूदा संख्या के आधार पर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि बिल किस तारीख को और किस रूप में पास होगा।

आम भारतीय पर क्या पड़ेगा असर?

FCRA मुख्य रूप से उन संस्थाओं पर लागू होता है जो विदेशी योगदान प्राप्त करती हैं। इसलिए सामान्य नागरिक पर इसका सीधा असर नहीं पड़ता।

हालांकि NGOs, ट्रस्ट, धार्मिक संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संगठनों पर इसका असर पड़ सकता है, खासकर तब जब वे विदेशी फंडिंग पर निर्भर हों और उनका FCRA रजिस्ट्रेशन समाप्त या रद्द हो जाए।

FCRA संशोधन को लेकर असली विवाद क्या है?

पूरे विवाद का केंद्र विदेशी फंडिंग से बनी संपत्तियों पर प्रस्तावित सरकारी नियंत्रण है। सरकार इसे विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाला कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों को डर है कि इससे संस्थाओं की संपत्ति और कामकाज पर सरकारी हस्तक्षेप बढ़ सकता है।

फिलहाल बिल संसद की प्रक्रिया में है और इसके अंतिम प्रावधान ही तय करेंगे कि इसका वास्तविक असर कितना व्यापक होगा। इसलिए 12 अगस्त की संसदीय चर्चा इस पूरे विवाद के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।