Pilibhit News: पीलीभीत में गन्ना किसानों के बकाया भुगतान का मुद्दा एक बार फिर बड़ा सवाल बनकर सामने है। नवाबगंज की ओसवाल चीनी मिल पर करीब 74 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान करीब 25 हजार किसानों का बकाया बताया गया है। प्रशासन मिल पर तालाबंदी कर चुका है और 22 अक्टूबर को नीलामी प्रस्तावित है। मिल की संपत्ति का मूल्यांकन करीब 180 करोड़ रुपये बताया गया है। दूसरी ओर, बरखेड़ा मिल के बकाये को लेकर पहले भी आरसी और तालाबंदी जैसी कार्रवाई हो चुकी है। लेकिन किसानों का सवाल अब भी वही है—फसल की तौल और खरीद के बाद आखिर पैसा खाते में कब आएगा?
गन्ना किसान का पैसा आखिर क्यों अटका है?
किसान खेत में महीनों मेहनत करके गन्ना तैयार करता है। खाद-बीज खरीदता है, सिंचाई करता है, मजदूरी देता है, फसल काटता है और उसे मिल तक पहुंचाता है। मिल गन्ने की तौल कराकर फसल ले जाती है, चीनी का कारोबार चलता है, लेकिन जब किसान को उसकी मेहनत की कीमत देने की बारी आती है तो मामला नोटिस, बैठक, जांच, आश्वासन और अगली तारीख तक पहुंच जाता है।
सवाल सीधा है—किसान ने उधार में गन्ना नहीं दिया था। उसकी फसल खरीदी गई थी। फिर उसकी मेहनत की कीमत समय पर क्यों नहीं मिलती?
आज की स्थिति में नवाबगंज की ओसवाल चीनी मिल पर करीब 74 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया बताया गया है। इससे करीब 25 हजार किसानों के प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। प्रशासन ने मिल पर तालाबंदी की है और 22 अक्टूबर को नीलामी प्रस्तावित है।
ओसवाल मिल पर तालाबंदी, अब 22 अक्टूबर को नीलामी
180 करोड़ की संपत्ति, फिर किसान का पैसा क्यों अटका?
ओसवाल चीनी मिल की संपत्ति का मूल्यांकन करीब 180 करोड़ रुपये बताया गया है। वहीं किसानों का करीब 74 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया बताया जा रहा है।
अब बड़ा सवाल यही है कि जब बकाया भुगतान इतना बड़ा है और मिल की संपत्ति का मूल्यांकन भी किया गया है, तो किसानों के भुगतान के लिए मिल की संपत्ति बेचने यानी नीलामी की नौबत आखिर क्यों आई?
प्रशासनिक कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन किसान के लिए कार्रवाई की सफलता का असली पैमाना यही है कि उसके खाते में पैसा कब पहुंचता है।
14 दिन का नियम आखिर किसके लिए?
गन्ना भुगतान की व्यवस्था में निर्धारित समयसीमा है। इसके बावजूद अगर किसान को महीनों अपनी मेहनत की कमाई का इंतजार करना पड़े तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसान के घर में पैसे की जरूरत रोज होती है। भुगतान अटकने का मतलब सिर्फ बैंक खाते में रकम का न आना नहीं है। इससे घर का खर्च प्रभावित होता है, बच्चों की फीस अटक सकती है, बैंक की किस्त दब सकती है और अगली फसल की तैयारी पर भी असर पड़ सकता है।
अगर मिल के पास पैसा नहीं है तो यह मिल की समस्या है। अगर भुगतान नहीं हो रहा है तो कार्रवाई करना सरकार की जिम्मेदारी है। और कार्रवाई के बाद भी किसान को पैसा नहीं मिलता तो जवाबदेही तय करना प्रशासन का काम है।
सवाल यह है कि इन तीनों की कीमत किसान क्यों चुकाए?
बरखेड़ा मिल पर कार्रवाई के बाद भी सवाल बाकी
आरसी और तालाबंदी से आगे अब भुगतान की बारी
बरखेड़ा मिल पर बकाये को लेकर पहले भी आरसी और तालाबंदी जैसी कार्रवाई हो चुकी है। अलग-अलग समय पर बकाये की अलग-अलग रकम सामने आई है।
लेकिन अब किसानों के लिए सबसे जरूरी सवाल पुराने आंकड़ों का नहीं, बल्कि आज की तारीख में वास्तविक बकाया कितना है और भुगतान की स्थिति क्या है, इसका है।
आरसी जारी हो सकती है। गोदाम पर ताला लग सकता है। अधिकारी बैठक कर सकते हैं। लेकिन किसान की समस्या तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक उसकी बकाया रकम उसके बैंक खाते में नहीं पहुंच जाती।
ताला मिल पर लगता है, आर्थिक तंगी किसान के घर में क्यों?
मिल पर कार्रवाई होने के बाद प्रशासनिक रिकॉर्ड में यह जरूर दर्ज हो जाता है कि कार्रवाई की गई। लेकिन किसान के घर की आर्थिक स्थिति सिर्फ कार्रवाई से नहीं सुधरती।
जिस किसान ने गन्ना दिया है, उसके लिए जरूरी यह है कि उस गन्ने की कीमत उसे मिले। इसलिए अब सवाल कार्रवाई की संख्या से ज्यादा भुगतान की रकम और उसकी तारीख का है।
किसान पूछ रहा है—ताला मिल पर लगा है, लेकिन आर्थिक तंगी मेरे घर में क्यों आ रही है?
करीब 4.98 लाख रुपये के भुगतान के लिए अदालत पहुंचा किसान
अपनी रकम पाने के लिए लेना पड़ा अंतरिम आदेश
गन्ना भुगतान का मामला इतना गंभीर हुआ कि एक किसान को करीब 4.98 लाख रुपये के लंबित गन्ना भुगतान के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
किसान को अपने बकाये के भुगतान के लिए अदालत से अंतरिम आदेश भी लेना पड़ा।
जिस किसान ने खेत में गन्ना उगाया, जिसकी फसल तौली गई और जिसे मिल ने अपने कब्जे में लेकर उसका कारोबार किया, उसी किसान को अपनी रकम पाने के लिए अदालत जाना पड़े—यह व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
अब आश्वासन नहीं, बैंक खाते में पैसा चाहिए
किसानों के आंदोलन को राजनीति कह देना आसान हो सकता है, लेकिन उनकी मूल मांग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसान ने फसल लगाने से लेकर उसे मिल तक पहुंचाने तक अपनी मेहनत और पैसा लगाया है।
उसका सवाल बहुत सीधा है—
“मेरे गन्ने का पैसा कब मिलेगा?”
किसान को सरकारी प्रेस नोट नहीं चाहिए। उसे अपने बैंक खाते में भुगतान की एंट्री चाहिए। उसे सिर्फ तारीख नहीं, भुगतान चाहिए। उसे सिर्फ बैठक नहीं, उसका नतीजा चाहिए।
सरकार और प्रशासन को देना होगा भुगतान का हिसाब
आरसी से नीलामी तक हर कार्रवाई का रिपोर्ट कार्ड जरूरी
अब सरकार और प्रशासन के सामने सबसे जरूरी काम यह है कि हर मिल का अद्यतन बकाया, किसानों की संख्या, मूलधन, ब्याज और भुगतान की निश्चित तारीख सार्वजनिक की जाए।
सिर्फ कार्रवाई का जिक्र पर्याप्त नहीं होगा। हर कार्रवाई के बाद यह भी सामने आना चाहिए कि उससे किसानों को कितना फायदा हुआ।
आरसी निकली—कितना पैसा आया?
संपत्ति जब्त हुई—कितना पैसा मिला?
नीलामी हुई—कितना पैसा किसानों तक पहुंचा?
मिल सील हुई—अब भुगतान कब होगा?
यही किसानों के लिए असली रिपोर्ट कार्ड है।
किसान ने गन्ना दिया है तो पैसा देना ही होगा
बहुत हो चुका तारीखों और आश्वासनों का सिलसिला। किसान को अपनी मेहनत की कीमत पाने के लिए बार-बार आंदोलन या अदालत का रास्ता न अपनाना पड़े, यह व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए।
किसान को किसी का एहसान नहीं चाहिए। उसे अपनी फसल की पूरी कीमत चाहिए।
और अब सवाल बिल्कुल सीधा है—
“मेरी फसल ले ली, अब मेरा पैसा कब दोगे?”
इस सवाल का जवाब भाषण, बैठक या आश्वासन से नहीं, भुगतान से देना होगा।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).