Delhi Protest: दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने पहुंचे CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के संस्थापक अभिजीत दिपके समेत तीन नेताओं को रिहा कर दिया गया है। शनिवार को हिरासत में लिए गए अभिजीत दिपके, पार्टी नेता सौरव दास और प्रवक्ता आशुतोष रांका को रविवार को दिल्ली कैंट स्थित एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। यहां से तीनों को रिहा करने का आदेश दिया गया। हालांकि, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी रिहाई के साथ एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त लगाई गई है।
तीनों नेताओं की रिहाई के बाद अब सवाल सिर्फ उनकी हिरासत का नहीं है, बल्कि CJP के आगे के आंदोलन को लेकर भी है। पार्टी ने इस बार देशभर के लोगों से दिल्ली पहुंचने की अपील की थी। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग राजधानी पहुंचे और पुलिस को भीड़, ट्रैफिक तथा सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए मशक्कत करनी पड़ी। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पार्टी दोबारा इसी तरह लोगों को दिल्ली बुलाती है और पुलिस प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकती है, तो क्या होगा? क्या इसे शांति भंग करने की आशंका माना जा सकता है और क्या नेताओं की रिहाई के साथ लगी शर्त उनके अगले आंदोलन को प्रभावित करेगी?
विमान से दिल्ली पहुंचते ही हिरासत में लिए गए CJP के नेता
अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका शनिवार को मुंबई से दिल्ली पहुंचे थे। विमान के दिल्ली में उतरने के बाद पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया। CJP ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का ऐलान किया था।
दिल्ली पुलिस का कहना था कि प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए जरूरी अनुमति नहीं ली गई थी। पुलिस ने पहले हुए प्रदर्शन के दौरान तय शर्तों का पालन नहीं करने और नए प्रदर्शन के लिए निर्धारित समय-सीमा के भीतर आवेदन नहीं करने की बात भी कही थी।
प्रदर्शन को लेकर पुलिस की चिंता यह थी कि बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली पहुंचने से सुरक्षा, ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों के लिए किसी मुद्दे पर सरकार या संवैधानिक संस्था के खिलाफ अपनी बात रखना लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है। ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती रहती है कि सुरक्षा व्यवस्था भी बनी रहे और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार भी प्रभावित न हो।
BNSS की धाराओं के तहत हुई कार्रवाई
CJP की लीगल अफेयर्स हेड रत्ना सिंह के मुताबिक, पुलिस ने तीनों नेताओं के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई की थी।
BNSS की धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरने को कह सकता है, जिसके बारे में कानूनी आधार पर यह आशंका हो कि वह शांति भंग कर सकता है। यह अवधि अधिकतम एक साल तक हो सकती है। वहीं, धारा 170 कुछ परिस्थितियों में संभावित संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए पुलिस को एहतियाती गिरफ्तारी की शक्ति देती है।
इन प्रावधानों का उद्देश्य किसी संभावित घटना को होने से पहले रोकना है। लेकिन इनका इस्तेमाल भी कानून में तय शर्तों और प्रक्रिया के अनुसार ही होना चाहिए। किसी व्यक्ति को एहतियातन हिरासत में लेने का अर्थ यह नहीं है कि उसने कोई अपराध किया है या उसका अपराध अदालत में साबित हो चुका है।
इस मामले में यह जानना भी जरूरी है कि मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में वास्तव में क्या शर्तें रखी हैं और तीनों नेताओं से कोई बंधपत्र भरवाया गया है या नहीं। केवल रिहाई के साथ शांति बनाए रखने की शर्त लगाए जाने की मीडिया रिपोर्ट के आधार पर उसके सभी कानूनी परिणामों को निश्चित नहीं माना जा सकता।
एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त का क्या मतलब है?
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने तीनों नेताओं को अगले एक साल तक शांति भंग नहीं करने की शर्त पर रिहा किया। CJP की लीगल अफेयर्स हेड रत्ना सिंह ने भी उनकी रिहाई की जानकारी दी थी।
यहां सबसे अहम सवाल है कि क्या इस शर्त का मतलब है कि CJP अगले एक साल तक कोई आंदोलन नहीं कर सकती? जरूरी नहीं। शांति बनाए रखने की शर्त और किसी प्रदर्शन के लिए जरूरी अनुमति, दो अलग-अलग कानूनी विषय हैं।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपने आप में शांति भंग करना नहीं है। इसी तरह, किसी प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आयोजक हिंसा करेंगे। लेकिन अगर प्रशासन के पास ऐसी ठोस परिस्थितियां हों जिनसे शांति भंग होने का वास्तविक खतरा दिखाई देता हो, तो वह कानून के तहत एहतियाती कदम उठा सकता है।
इसलिए तीनों नेताओं की रिहाई के आदेश की वास्तविक भाषा महत्वपूर्ण होगी। अगर आदेश या बंधपत्र में किसी खास तरह के आचरण पर रोक है, तो यह देखना होगा कि अगली गतिविधि उस शर्त के दायरे में आती है या नहीं।
दोबारा देशभर से लोगों को दिल्ली बुलाया तो क्या होगा?
इस बार CJP ने देशभर के लोगों से दिल्ली पहुंचने की अपील की थी। बड़ी संख्या में लोगों के राजधानी पहुंचने के बाद पुलिस को भीड़ नियंत्रित करने, सुरक्षा व्यवस्था संभालने और यातायात को व्यवस्थित रखने में मशक्कत करनी पड़ी। दिल्ली पुलिस ने प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति न देने के पीछे सुरक्षा, ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया था।
ऐसे में अगर CJP दोबारा इसी तरह देशभर से लोगों को दिल्ली बुलाती है, तो प्रशासन के सामने फिर वही चुनौती आ सकती है। खासकर तब, जब भीड़ बड़ी हो, प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने के रास्तों पर अवरोध हों और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव की आशंका पैदा हो जाए।
मान लीजिए, हजारों लोग दिल्ली पहुंचते हैं और पुलिस उन्हें किसी तय सीमा से आगे जाने से रोकती है। अगर आयोजक लोगों से पुलिस के अवरोध के बावजूद आगे बढ़ने को कहते हैं, तो धक्का-मुक्की, बैरिकेड टूटने या टकराव का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में पुलिस को संभावित हिंसा रोकने के लिए पहले से तैयारी करनी पड़ सकती है।
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। लोगों को आगे बढ़ने के लिए कहना और वास्तव में हिंसा भड़काना एक ही बात नहीं है। यह देखना होगा कि निर्देश किस परिस्थिति में दिए गए, पुलिस का आदेश क्या था, प्रदर्शनकारियों का व्यवहार कैसा रहा और क्या किसी कानून या वैध आदेश का उल्लंघन हुआ। बड़ी भीड़ और पुलिस की मुश्किलें प्रशासन की चिंता का आधार हो सकती हैं, लेकिन केवल भीड़ के आकार से शांति भंग होना अपने आप साबित नहीं होता।
क्या पुलिस दोबारा नेताओं को हिरासत में ले सकती है?
अगर CJP बिना जरूरी अनुमति के प्रदर्शन करती है, तो पुलिस परिस्थितियों के अनुसार आयोजन रोक सकती है, लोगों को वहां से हटने का निर्देश दे सकती है और कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है। अगर किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के लिए BNSS की धारा 170 की कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो एहतियाती गिरफ्तारी भी संभव हो सकती है।
इसके अलावा, यदि तीनों नेताओं ने शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरा है और उनकी गतिविधियों से उसकी शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगता है, तो संबंधित अधिकारी कानूनी प्रक्रिया अपना सकते हैं। लेकिन इसके लिए मजिस्ट्रेट के आदेश और बंधपत्र की शर्तें देखना जरूरी होगा।
दूसरी ओर, पुलिस की कार्रवाई भी कानून से ऊपर नहीं है। किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि वह प्रदर्शन आयोजित करना चाहता है। कार्रवाई के लिए कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया जरूरी है। यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा जाता है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
यानी न तो हर बड़े प्रदर्शन को शांति भंग मानना सही होगा और न ही हर पुलिस कार्रवाई को गलत ठहराया जा सकता है। फैसला परिस्थितियों, उपलब्ध सबूतों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए।
हिरासत के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा था मामला
तीनों नेताओं की हिरासत को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी Habeas Corpus याचिका भी दाखिल की गई थी। इस याचिका के जरिए अदालत से हिरासत में लिए गए व्यक्तियों को पेश करने और उनकी हिरासत की वैधता की जांच करने की मांग की जाती है।
याचिका में हिरासत का कानूनी आधार बताने और संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग की गई थी। इसमें यह सवाल भी उठाया गया कि प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के आधार पर किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना किस हद तक उचित है और क्या ऐसी कार्रवाई व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकारों के अनुरूप है।
हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोप अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं। इसी तरह, तीनों नेताओं की रिहाई को भी पुलिस की पूरी कार्रवाई को अदालत द्वारा गैरकानूनी घोषित किए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लिए अदालत के वास्तविक आदेश और उसमें दर्ज निष्कर्षों को देखना जरूरी है।
अब CJP के सामने क्या विकल्प हैं?
CJP आगे भी अपने मुद्दों को लेकर आंदोलन करना चाहती है, तो उसके सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तैयारी, जरूरी अनुमति के लिए समय पर आवेदन और प्रशासन के साथ स्थान तथा सुरक्षा व्यवस्था पर बातचीत जैसे विकल्प हैं। अगर अनुमति नहीं मिलती और पार्टी उसे चुनौती देना चाहती है, तो वह उपलब्ध कानूनी रास्तों का सहारा ले सकती है।
प्रशासन की जिम्मेदारी भी केवल रोक लगाने तक सीमित नहीं है। उसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ यह भी देखना होता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए कानून के दायरे में उचित व्यवस्था संभव है या नहीं। दूसरी तरफ, आयोजकों की जिम्मेदारी है कि वे समर्थकों को स्पष्ट निर्देश दें, किसी टकराव को बढ़ावा न दें और वैध आदेशों का पालन करें।
अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई के बाद फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे किसी प्रदर्शन की स्थिति में शांति बनाए रखने की शर्त को किस तरह लागू किया जाएगा। इसका जवाब मजिस्ट्रेट के वास्तविक आदेश, प्रस्तावित आंदोलन की परिस्थितियों और मौके पर लोगों के व्यवहार से तय होगा।
निष्कर्ष: CJP के तीन नेताओं को रिहाई मिल गई है, लेकिन इसके साथ शांति बनाए रखने की शर्त लगाए जाने की रिपोर्ट ने पार्टी के अगले आंदोलन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर फिर बड़ी संख्या में लोगों को दिल्ली बुलाया जाता है और पुलिस के साथ टकराव की स्थिति बनती है, तो प्रशासन एहतियाती कदम उठा सकता है। वहीं, किसी भी कार्रवाई की वैधता कानून और तथ्यों के आधार पर ही तय होगी। शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी—दोनों को साथ लेकर चलना ही इस विवाद का सबसे अहम पहलू है।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).