Pilibhit SIR: पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक सवालों से आगे बढ़कर प्रशासनिक जांच और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता का मामला बन गया है। मतदाता पहचान पत्र यानी EPIC नंबर के साथ दूसरे मतदाताओं का विवरण सामने आने की पुष्टि के बाद निर्वाचन विभाग ने कार्रवाई की है। दो SDM को जिला मुख्यालय से संबद्ध किए जाने और वीआरसी कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार की सेवाएं समाप्त किए जाने की जानकारी सामने आई है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने हजारों मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव का आरोप लगाया है, जबकि समाजवादी पार्टी ने इस मामले में स्वतंत्र साइबर फॉरेंसिक जांच की मांग उठाई है। पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा ने भी इस घटनाक्रम को लेकर प्रदेश सरकार में मंत्री और पीलीभीत सदर के विधायक संजय सिंह गंगवार पर राजनीतिक सवाल उठाए हैं। हालांकि, किसी राजनीतिक व्यक्ति की प्रत्यक्ष भूमिका अभी स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुई है।
पीलीभीत की वोटर लिस्ट में क्या सामने आया?
पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र संख्या 127 की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर 21 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के बाद मामला चर्चा में आया। अब 22 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन विभाग की प्रारंभिक जांच में कुछ EPIC नंबर ऑनलाइन खोजने पर दूसरे मतदाताओं का विवरण प्रदर्शित होने की पुष्टि हुई है।
EPIC नंबर मतदाता पहचान पत्र पर दर्ज विशिष्ट पहचान संख्या होती है। इसका उद्देश्य मतदाता की पहचान और उससे जुड़े रिकॉर्ड को पहचानने में मदद करना है। ऐसे में यदि किसी EPIC नंबर के साथ किसी दूसरे मतदाता का विवरण दिखाई देता है, तो यह जांच का विषय बन जाता है कि ऐसा क्यों हुआ, संबंधित रिकॉर्ड में किस स्तर पर बदलाव हुआ और क्या इससे मतदाता सूची की शुद्धता प्रभावित हुई है।
यही वजह है कि मामला अब केवल राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है। निर्वाचन विभाग को रिकॉर्ड की जांच करके यह स्पष्ट करना होगा कि गड़बड़ी कितने मामलों में है, उसका कारण क्या है और उसे ठीक करने के लिए कौन-से कदम जरूरी हैं।
13,150 नामों में बदलाव का आरोप, कांग्रेस ने 16,554 रिकॉर्ड प्रभावित होने का दावा किया
21 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में जुलाई से सितंबर के बीच 13,150 मतदाताओं के नाम बदल दिए गए, जबकि उनके EPIC और सीरियल नंबर वही रहे। पार्टी ने मतदाता सूची में नाम हटाए जाने और नए नाम जोड़े जाने को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस के दावे के मुताबिक, 884 ऐसे मतदाताओं के नाम हटाए गए जो कथित तौर पर अब भी संबंधित क्षेत्र में रह रहे हैं। इसके अलावा, पार्टी ने 2,600 ऐसे लोगों के नाम जोड़े जाने का आरोप लगाया जो उस क्षेत्र में नहीं रहते। कांग्रेस ने इन आंकड़ों को जोड़कर कुल 16,554 मतदाता रिकॉर्ड प्रभावित होने का दावा किया है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। 13,150 नामों में बदलाव, 884 नाम हटाए जाने और 2,600 नाम जोड़े जाने के आंकड़े कांग्रेस की ओर से लगाए गए आरोपों का हिस्सा हैं। इन सभी रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति और उनमें हुई किसी संभावित अनियमितता की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी।
फिलहाल निर्वाचन विभाग की प्रारंभिक जांच में EPIC नंबर के साथ दूसरे मतदाताओं का विवरण प्रदर्शित होने की बात सामने आना मामले का महत्वपूर्ण पहलू है। अब जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना होगा कि किन रिकॉर्ड में वास्तविक गड़बड़ी है और उसके पीछे क्या कारण रहे।
SIR विवाद में दो SDM पर कार्रवाई, ऑपरेटर की सेवाएं समाप्त
इस मामले में प्रशासनिक कार्रवाई भी सामने आई है। 22 अक्टूबर को प्रकाशित अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियां संभाल चुके पूरनपुर के SDM मयंक गोस्वामी और अमरिया के SDM हेमंत चौधरी को जिला मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया है।
इसके साथ ही वीआरसी कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार की सेवाएं समाप्त किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। रिपोर्ट में दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू होने और ऑपरेटर सहित अन्य संबंधित लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की तैयारी का उल्लेख किया गया है।
जिला निर्वाचन अधिकारी एवं जिलाधिकारी आलोक कुमार के अनुसार, संबंधित रिकॉर्ड और अभिलेखों की जांच की जा रही है। जांच में यह देखा जा रहा है कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं और कहीं कोई लापरवाही तो नहीं हुई।
यह कार्रवाई प्रशासनिक स्तर पर मामले की गंभीरता को दर्शाती है। हालांकि, किसी अधिकारी को जिला मुख्यालय से संबद्ध किया जाना या किसी कर्मचारी की सेवाएं समाप्त होना अपने आप में किसी राजनीतिक साजिश का प्रमाण नहीं है। अंतिम जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे।
हेमराज वर्मा ने संजय सिंह गंगवार को लेकर क्या सवाल उठाए?
पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे सुनियोजित प्रयास हो सकता है और मामले की जांच संजय रॉयल पार्क स्थित एक आवास के संदर्भ में भी की जानी चाहिए।
हेमराज वर्मा ने SDM मयंक से जुड़े घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। इस राजनीतिक विवाद में प्रदेश सरकार के मंत्री और पीलीभीत सदर के विधायक संजय सिंह गंगवार का नाम भी सामने आया है। सपा नेताओं ने सवाल उठाया है कि जब मतदाता सूची में इतने बड़े पैमाने पर कथित बदलावों के आरोप लग रहे हैं, तो जांच केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित क्यों रहे और पूरी प्रक्रिया की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी।
इस मामले में संजय सिंह गंगवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन उपलब्ध विवरण के आधार पर यह स्थापित नहीं है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से किसी मतदाता का रिकॉर्ड बदलवाया या किसी अधिकारी को ऐसा करने का निर्देश दिया। इसी तरह, संजय रॉयल पार्क स्थित आवास पर बैठकर कथित गड़बड़ी किए जाने के आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या जांच से रिकॉर्ड में बदलाव की प्रक्रिया, उससे जुड़े लोगों और संभावित जिम्मेदारियों के बारे में ठोस जानकारी सामने आती है। संबंधित व्यक्तियों के बयान और जांच के दस्तावेज इस मामले में महत्वपूर्ण होंगे।
धर्मेश गंगवार के ज्ञापन में साइबर फॉरेंसिक जांच की मांग
समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष धर्मेश गंगवार की ओर से मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संबोधित ज्ञापन में मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र साइबर फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की गई है। पार्टी का जोर इस बात पर है कि केवल मतदाता सूची के मौजूदा आंकड़ों का मिलान पर्याप्त नहीं होगा। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि डिजिटल रिकॉर्ड में बदलाव कब, कैसे और किसके लॉगिन से हुए।
साइबर फॉरेंसिक जांच का मतलब डिजिटल उपकरणों, कंप्यूटर सिस्टम, डेटाबेस और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की तकनीकी जांच करना है, ताकि घटनाक्रम से जुड़े प्रमाणों का पता लगाया जा सके। इस मामले में ऐसी जांच से यह समझने में मदद मिल सकती है कि कथित बदलाव किसी तकनीकी गड़बड़ी, प्रक्रिया संबंधी चूक या किसी अन्य वजह से हुए।
ज्ञापन में कई तकनीकी पहलुओं की जांच की मांग की गई है।
1. पुराने और नए मतदाता रिकॉर्ड का मिलान
ज्ञापन में मांग की गई है कि अंतिम ड्राफ्ट और बाद में जारी मतदाता सूचियों की तुलना की जाए। इसमें मतदाता का नाम, पिता का नाम, पता, फोटो, EPIC नंबर और अन्य उपलब्ध विवरण शामिल हों। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किन रिकॉर्ड में बदलाव हुआ और बदलाव की प्रकृति क्या थी।
2. डेटाबेस ऑडिट ट्रेल की जांच
ऑडिट ट्रेल डिजिटल सिस्टम में दर्ज वह रिकॉर्ड होता है, जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि किसी जानकारी में कब बदलाव किया गया। ज्ञापन में प्रत्येक संशोधन की तारीख, समय, पुराने और नए डेटा तथा उपलब्ध ट्रांजैक्शन हिस्ट्री की जांच की मांग की गई है।
यदि संबंधित सिस्टम में ऐसे रिकॉर्ड सुरक्षित हैं, तो उनकी मदद से यह समझा जा सकता है कि मतदाता विवरण में बदलाव किस क्रम में हुए।
3. सर्वर लॉग, बैकअप और मेटाडेटा का परीक्षण
ज्ञापन में एप्लीकेशन लॉग, डेटाबेस लॉग, उपलब्ध बैकअप और अन्य तकनीकी साक्ष्यों की जांच कराने की मांग भी शामिल है। ये रिकॉर्ड सिस्टम में हुई गतिविधियों और बदलावों की जानकारी दे सकते हैं।
इस प्रक्रिया में जरूरी होगा कि उपलब्ध मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं, ताकि जांच के दौरान उनमें बदलाव होने या प्रमाण नष्ट होने की आशंका कम हो।
4. IP एड्रेस और लॉगिन हिस्ट्री से गतिविधियों का पता लगाना
ज्ञापन में यह पता लगाने की मांग की गई है कि रिकॉर्ड में बदलाव किस यूजर आईडी, डिवाइस या वर्कस्टेशन से किए गए। इसके लिए उपलब्ध IP एड्रेस और लॉगिन हिस्ट्री की जांच की जा सकती है।
हालांकि, किसी लॉगिन या IP एड्रेस का मिलना अपने आप किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी साबित नहीं करता। जांच में यह भी देखना होगा कि संबंधित खाते का इस्तेमाल किसने किया, उसे किस स्तर की अनुमति मिली हुई थी और रिकॉर्ड में बदलाव अधिकृत प्रक्रिया के तहत हुआ था या नहीं।
5. यूजर एक्सेस और अधिकारों में बदलाव की जांच
सपा ने यह भी पता लगाने की मांग की है कि किस अधिकृत खाते से रिकॉर्ड बदले गए और क्या किसी स्तर पर सिस्टम तक पहुंचने के अधिकारों या अनुमतियों में बदलाव किया गया था।
इस पहलू की जांच से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों के पास सिस्टम में कौन-से काम करने की अनुमति थी और क्या किसी रिकॉर्ड में बदलाव निर्धारित अधिकारों के अनुरूप हुआ।
6. क्या हजारों रिकॉर्ड एक साथ बदले गए?
ज्ञापन में बल्क मॉडिफिकेशन यानी बड़ी संख्या में रिकॉर्ड में एक साथ बदलाव किए जाने की संभावना की भी जांच करने को कहा गया है। इसमें यह देखा जा सकता है कि क्या बदलाव किसी बैच प्रोसेस, API या दूसरी डिजिटल प्रक्रिया के जरिए हुए।
यह जांच इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि हजारों रिकॉर्ड में बदलाव के आरोपों की स्थिति में केवल कुछ नमूनों की जांच के बजाय बदलाव के पूरे पैटर्न को समझना जरूरी होगा।
7. फॉर्म, BLO सत्यापन और अधिकारियों के अनुमोदन का मिलान
ज्ञापन में प्रत्येक बदलाव के पीछे फॉर्म-8 अथवा अन्य लागू आवेदन, बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के सत्यापन और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) या सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (AERO) के निर्णय का मिलान करने की मांग की गई है।
इससे यह पता लगाया जा सकता है कि संबंधित संशोधन के लिए आवेदन मौजूद था या नहीं, जरूरी सत्यापन किया गया था या नहीं और अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिया गया था या नहीं।
8. डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने की मांग
सपा ने लॉग, बैकअप और मूल इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने पर भी जोर दिया है। ज्ञापन में जरूरत पड़ने पर फॉरेंसिक प्रतियां तैयार करने और SHA-256 हैश का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है।
SHA-256 एक तकनीकी तरीका है, जिससे किसी डिजिटल फाइल की विशिष्ट हैश वैल्यू तैयार की जाती है। जांच में इसका उपयोग यह जांचने में मदद कर सकता है कि सुरक्षित रखी गई फाइल में बाद में बदलाव हुआ है या नहीं।
सपा की मांग है कि स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए और यदि गलत संशोधन प्रमाणित होते हैं, तो नियमानुसार रिकॉर्ड में सुधार किया जाए तथा जिम्मेदार लोगों की भूमिका के अनुसार कार्रवाई तय हो।
क्या अब पूरे उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची की जांच होगी?
पीलीभीत में सामने आए मामले के बाद अन्य विधानसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में भी इसी तरह की त्रुटियों की जांच के निर्देश दिए जाने की जानकारी प्रकाशित रिपोर्टों में सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, जिला निर्वाचन अधिकारियों से निर्धारित समय के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा गया है।
यदि अन्य क्षेत्रों में भी समान प्रकार की विसंगतियां मिलती हैं, तो जांच का दायरा बढ़ सकता है। लेकिन अभी यह मान लेना सही नहीं होगा कि पूरे प्रदेश की मतदाता सूची में इसी तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। इसके लिए दूसरे क्षेत्रों से मिलने वाली रिपोर्ट और निर्वाचन विभाग की जांच के नतीजे देखना जरूरी होगा।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि कथित रूप से प्रभावित रिकॉर्ड में कितने वास्तविक मतदाता हैं, कितने मामलों में केवल विवरण संबंधी त्रुटि है और कितने मामलों में सुधार की जरूरत है। मतदाता सूची में नाम या पहचान संबंधी गलत जानकारी किसी नागरिक के मतदान के अधिकार को प्रभावित कर सकती है। इसलिए प्रत्येक शिकायत का निष्पक्ष और समयबद्ध समाधान जरूरी है।
भाजपा सरकार और ECI के सामने जवाबदेही का सवाल
संजय सिंह गंगवार पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। इसी वजह से उनके निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची से जुड़ा विवाद राजनीतिक महत्व हासिल कर चुका है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों ने इस मामले को SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़ दिया है।
विपक्षी दलों की मांग है कि जांच केवल उन कर्मचारियों तक सीमित न रहे जिनके खिलाफ प्रारंभिक कार्रवाई हुई है। रिकॉर्ड में बदलाव की पूरी प्रक्रिया, डिजिटल सिस्टम तक पहुंच, आवेदन और सत्यापन की स्थिति तथा अधिकारियों की जिम्मेदारी की जांच की जाए।
दूसरी ओर, किसी राजनीतिक व्यक्ति या दल की भूमिका तय करने के लिए आरोपों से आगे बढ़कर प्रमाण जरूरी हैं। अभी उपलब्ध विवरण से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियां किसी राजनीतिक निर्देश पर की गईं। इस सवाल का जवाब जांच में सामने आने वाले दस्तावेज, तकनीकी साक्ष्य और संबंधित पक्षों के बयानों से ही मिल सकेगा।
अब जांच में सबसे बड़े सवाल क्या हैं?
पीलीभीत की मतदाता सूची को लेकर सामने आए इस विवाद में कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है। क्या 13,150 नामों में बदलाव और कुल 16,554 रिकॉर्ड प्रभावित होने के कांग्रेस के दावे जांच में प्रमाणित होते हैं? EPIC नंबर के साथ दूसरे मतदाताओं का विवरण किन परिस्थितियों में प्रदर्शित हुआ? दो SDM और कंप्यूटर ऑपरेटर के स्तर पर क्या जिम्मेदारियां थीं? क्या उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड से बदलावों की तारीख, प्रक्रिया और संबंधित यूजर की पहचान स्पष्ट हो सकती है?
इसके अलावा, हेमराज वर्मा द्वारा संजय रॉयल पार्क और SDM मयंक से जुड़े घटनाक्रम को लेकर उठाए गए सवालों की जांच किस तरह होगी, यह भी महत्वपूर्ण रहेगा। संजय सिंह गंगवार या किसी अन्य राजनीतिक व्यक्ति की प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर कोई निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
फिलहाल इस मामले में तीन बातें अलग-अलग समझना जरूरी है—कांग्रेस और सपा के राजनीतिक आरोप, निर्वाचन विभाग की प्रारंभिक जांच और प्रशासनिक कार्रवाई। इन तीनों को एक ही निष्कर्ष मान लेना सही नहीं होगा। अब आगे की जांच से यह स्पष्ट होना चाहिए कि मतदाता सूची में वास्तव में क्या गड़बड़ी हुई, उसके कारण क्या थे और नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर किसकी जिम्मेदारी बनती है।
मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। इसलिए पीलीभीत के इस मामले में पारदर्शी जांच, डिजिटल साक्ष्यों का संरक्षण, वास्तविक मतदाताओं के रिकॉर्ड में जरूरी सुधार और प्रमाणों के आधार पर जिम्मेदारी तय करना सबसे अहम होगा। राजनीतिक आरोपों के बीच अंतिम निष्कर्ष जांच के तथ्यों पर ही आधारित होना चाहिए।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).