
मां के श्राप से इस पहाड़ को हो गया कोढ़ और हो गया खंड खंड
खत्री पहाड़ का उद्धार करने के लिए चोंटी में विराजमान होती हैं विंद्यवासनी मां
द्वापरयुग में मां माया ने यहां रखे थे कदम
भारत देश के उत्तर प्रदेश के बांदा में एक ऐसा पहाड़ है जिसमे मां माया का चमत्कार आज भी देखा जाता है। पूरे बुंदेलखंड में एक मात्र यह ही पहाड़ है जिसका रंग सफेद है और खंड खंड है। इसका इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है। नौ दुर्गा के दिनो मे अष्टमी में इसकी छटा अलौकिक और दिव्य हो जाती है। लाखों श्रद्धालुओं से यह पहाड़ गुलजार हो जाता है । चर्चाएं तो यहां तक हैं की अष्टमी के दिन पहाड़ में स्थित देवी की प्रतिमा चमक उठती है और दिव्य हो जाती है। देखिए मां का चमत्कार इस रिपोर्ट में।
यूं तो भारत देश में लाखों मंदिर हैं। जिनका अलग अलग महत्व है और वहां की अलग अलग दिव्यता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर गिरवां क्षेत्र में पहाड़ के नीचे एक ऐसा मंदिर बना है जिसमें मां विंध्यवासिनी विराजमान है। वहीं पहाड़ की चोटी में बने मंदिर में हर साल की अष्टमी को साक्षात प्रकट होती हैं जिससे मूर्ति चमक उठती है। इस मंदिर का निर्माण 17 सितंबर 1974 को हुआ था। इस स्थान पर जाने के लिए श्रद्धालुओं को 511 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। इस मंदिर में हर साल नवरात्र नवमी को विशाल मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालू दूर-दूर से आते है।
कहते है कि इस मंदिर में लोगों की हर मनोकामना पूरी होती है। लोगों को रोगों से मुक्ति मिलती है। यहां लोगों की श्रद्धा अपने आप में मिसाल है। इस मंदिर में मां विंध्यवासिनी के दर्शन करते है। खत्री-पहाड़ में जब आप 511 सीढ़ी चढ़ने के बाद ऊपर जायेगे तब वहां पर पहाड़ का वो फटा हुआ हिस्सा भी मिलेगा जो की मां विन्ध्वासिनी के क्रोध का शिकार हुआ था।
गिरवां क्षेत्र का इतिहास खंगालने पर पता चला की देवी के आगमन का रहस्य द्वापर युग से जुड़ा हुआ है। जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के रूप में कन्या सौपी गई और जैसे ही कन्या को मारने के लिए कंस ने हवा में उछाला वैसे ही कन्या के रूप में देवी माया आकाश में उड़ गई और कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी करते हुए वहां से चल कर गिरवां के खत्री पहाड़ आई तो पर्वत ने उनका भार न सहन कर पाने की बात कही, जिस पर देवी ने क्रोध में पर्वत को कोढी होने का श्राप दे दिया जिसके बाद पर्वत सफेद रंग में बदल गया और चुने की तारक खंड खंड होने लगा फिर पर्वत ने मां माया से क्षमा मांगी और अपने उद्धार की प्रार्थना की तब देवी ने कहा कि वह नवदुर्गों की अष्टमी को एक दिन के लिए पर्वत पर आएंगी, इसके बाद मां माया विंध्याचल पर्वत में विराजमान हो गईं तभी से उन्हे विंद्यवासनी देवी के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि अष्टमी के दिन पहाड़ के नीचे के मंदिर के पट बंद रहते है।
वहीं पहाड़ के नीचे मंदिर निर्माण को लेकर भी बड़ी ही रोचक कथा प्रचलन में है। बताया जाता है की सन 1974 में विंध्याचल पर्वत में एक फौजी की पत्नी की गोली मारकर हत्या कर दी गई जिससे अक्रोसित फौजी ने मां विंद्यवासनी देवी की प्रतिमा को गोली मार दी जिससे प्रतिमा खंडित हो गई उसी के बाद मां एक कन्या के रूम में गिरवा गांव में प्रकट हूं और लोगों से मंदिर निर्माण कराने का आग्रह किया जिसके बाद यहां मंदिर का निर्माण कराया गया। गांव वाले बताते है कि देवी की मूर्ती को देखने से एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति होती है, कई तरह के रोगी यहां आकर ठीक हो जाते है, आस पास के क्षेत्र के शादी शुदा जोड़े सबसे पहले यहीं आते है,मां विंध्यवासिनी अपने शांत रूप में यहां विद्यमान है।
वहीं इस स्थान की एक और कहानी जुड़ी है बताया जाता है एक बार बांदा में डीएम हरगोविंद विश्नोई व एसपी मेहरबान सिंह थे वो काफी तामझाम के साथ इस मेले को रोकने के लिए यहां पर आये, तब यहां के पुजारियों ने उनको नौरात्र की विशेषता बताते हुए 9 नारियल फोड़े व पुजारी ने बताया कि उनका लड़का आंखों से देख नहीं सकता था।
इस मंदिर में आने के बाद उसकी आंखों में रौशनी आ गयी, वो देखने लगा। इसके बाद डीएम व एसपी ने जाकर शासन को अपनी रिपोर्ट भेजी व तभी से यहां पर हर साल नौरात्र में 10 दिन मेला लगता है जिसमे नवमी के दिन विशाल मेले का आयोजन होता हैं जिसमे पुलिस द्वारा बड़ी तादात में पुलिस बल को भी सुरछा की दृष्टि से यहां लगाया जाता है