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क्यों कहा जाता है “कंकर-कंकर में शंकर”? जानिए इसका अर्थ

कंकर-कंकर में शंकर: जानिए शिव की इस अद्भुत लीला का रहस्य

आपने अक्सर भक्तों, साधु-संतों, और बुजुर्गों से सुना होगा कि “कंकर-कंकर में बसे हैं शिव शंकर।” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों कहा जाता है? आइए, इस रॉकेट पोस्ट स्पेशल में हम आपको देवों के देव महादेव की एक ऐसी अद्भुत लीला से परिचित कराते हैं, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि वास्तव में कंकर-कंकर में शिव शंकर का वास है।

प्रभु श्री राम के लिए रची थी अद्भुत लीला

प्रभु श्री राम अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान जब जाबालि ऋषि से मिलने नर्मदा तट पर आए, तो वह स्थान पर्वतों से घिरा हुआ था। भगवान शंकर, प्रभु राम से मिलने को आतुर थे, लेकिन वे भगवान और भक्त के बीच नहीं आना चाहते थे। उसी समय, उन्होंने सोचा कि प्रभु राम के पैरों को कंकर न चुभें, इसलिए उन्होंने छोटे-छोटे कंकरों को गोलाकार कर दिया। तब से ही यह कहा जाने लगा कि “कंकर-कंकर में हैं शंकर।”

प्रभु राम ने स्थापित किया शिवलिंग

जब प्रभु श्री राम रेवा तट पर पहुंचे, तो उन्होंने वहां बालू एकत्र कर शिवलिंग का निर्माण किया और एक महीने तक उसका नर्मदा के जल से अभिषेक करते रहे। अंतिम दिन, शिवलिंग के स्थान पर स्वयं भगवान शंकर प्रकट हो गए और प्रभु राम और शंकर का मिलन हुआ।

रामेश्वरम का नामकरण

रामचरित मानस में कई दृष्टांत मिलते हैं, जहां दोनों प्रभु एक-दूसरे की आराधना करते दिखते हैं। जब प्रभु राम लंका पर चढ़ाई की तैयारी कर रहे थे, तब भी उनके मन में भोलेनाथ की भक्ति का विचार आया। इस पावन भूमि पर प्रभु राम ने शिवलिंग की स्थापना की, जिसे “रामेश्वरम” नाम दिया गया। श्रीराम ने इसे समझाते हुए कहा कि जो राम के ईश्वर हैं, वही रामेश्वर यानी शिव हैं। वहीं, भगवान शिव ने इसे इस प्रकार बताया कि राम जिनके ईश्वर हैं, वे रामेश्वर हैं।

सावन में शिव की पूजा का महत्व

सावन के महीने में शिव मंत्र “ॐ नमः शिवाय” और “श्री राम जय राम जय जय राम” का उच्चारण कर शिव को जल चढ़ाने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भगवान शिव की प्रसन्नता पाने के लिए सावन में प्रभु राम को भी शिव की पूजा में शामिल करना आवश्यक है।