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UP Education: आखिर क्यों एक पिता टॉयलेट सीट लेकर पहुंचा अपनी बेटी के स्कूल? ये घटना आपके होश उड़ा देगी..

UP Education: आखिर क्यों एक पिता टॉयलेट सीट लेकर पहुंचा अपनी बेटी के स्कूल? ये घटना आपके होश उड़ा देगी..

UP Education: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जो न सिर्फ सिस्टम पर सवाल खड़े करती है बल्कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारों की हकीकत भी दिखाती है। एक गरीब पिता अपनी बेटी को पढ़ाने की जिद में साइकिल पर टॉयलेट सीट बांधकर स्कूल पहुंच गया, लेकिन इसके बावजूद भी उसकी बेटी को एडमिशन नहीं मिला। यह घटना सिर्फ एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि पिछले 67 सालों से चल रही एक बड़ी समस्या की ओर इशारा करती है।

जब पिता टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंचा

इस पूरे मामले की सबसे भावुक तस्वीर तब सामने आई जब एक पिता अपनी बेटी का दाखिला कराने के लिए साइकिल पर टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंच गया। स्कूल प्रबंधन की तरफ से बार-बार यह कहा जा रहा था कि बालिका शौचालय नहीं है, इसलिए लड़कियों को एडमिशन नहीं दिया जा सकता। ऐसे में पिता ने उसी बहाने को खत्म करने की कोशिश की और कहा कि “अगर टॉयलेट ही समस्या है, तो ये लो टॉयलेट, अब मेरी बेटी को पढ़ने दो।” लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इतना सब करने के बाद भी स्कूल प्रशासन का दिल नहीं पसीजा और बच्ची को दाखिला देने से मना कर दिया गया। इस घटना ने पूरे इलाके में गुस्सा और सवाल दोनों खड़े कर दिए हैं।

67 साल से बेटियों के लिए बंद है ये स्कूल

यह मामला बस्ती जिले के कलवारी क्षेत्र में स्थित झिनकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी इंटर कॉलेज का है। इस कॉलेज को साल 1957 में ही को-एड यानी लड़के और लड़कियों दोनों के लिए मान्यता मिल चुकी है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यहां दशकों से किसी भी लड़की का दाखिला नहीं हो पा रहा है। कागजों में यह स्कूल समान शिक्षा का केंद्र है, लेकिन असलियत में बेटियों के लिए इसके दरवाजे लगभग बंद ही हैं।

टॉयलेट का बहाना या कुछ और?

स्कूल प्रबंधन का कहना है कि यहां बालिका शौचालय और बाउंड्री वॉल की कमी है, जिसकी वजह से सुरक्षा के चलते लड़कियों का दाखिला नहीं दिया जाता। लेकिन स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा इससे बिल्कुल उलट है। उनका कहना है कि स्कूल में शौचालय मौजूद है और अच्छी हालत में है, लेकिन इसे सिर्फ बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

प्राइवेट स्कूल को फायदा पहुंचाने का आरोप

ग्रामीणों का आरोप है कि इस पूरे मामले के पीछे एक बड़ा खेल चल रहा है। सरकारी इंटर कॉलेज के ठीक बगल में ही प्रबंधक का अपना निजी स्कूल है। ऐसे में सरकारी स्कूल में लड़कियों का एडमिशन रोककर उन्हें निजी स्कूल में भेजा जाता है, जहां उनसे मोटी फीस ली जाती है। इस वजह से गरीब परिवारों की बेटियां या तो महंगी फीस भरने को मजबूर होती हैं या फिर पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं।

गरीब बेटियों की पढ़ाई पर असर

इस स्थिति का सबसे ज्यादा असर गरीब परिवारों की बेटियों पर पड़ रहा है। कई छात्राओं ने बताया कि वे सिर्फ इसलिए पढ़ाई जारी नहीं रख पाईं क्योंकि उनके पास प्राइवेट स्कूल की फीस देने के पैसे नहीं थे। ऐसे में यह मामला सीधे तौर पर शिक्षा के अधिकार के उल्लंघन के रूप में भी देखा जा रहा है।

प्रिंसिपल की सफाई

स्कूल के प्रिंसिपल का कहना है कि कुछ साल पहले 2021 और 2022 में 60 से 70 लड़कियों को एडमिशन दिया गया था, लेकिन उसके बाद कोई लड़की दाखिले के लिए नहीं आई। हालांकि, जब एक पिता खुद टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंच गया, तो यह दलील अपने आप सवालों के घेरे में आ जाती है।

स्थानीय विरोध और प्रशासन की कार्रवाई

इस पूरे मामले को लेकर अब स्थानीय स्तर पर विरोध भी शुरू हो गया है। एक जागरूक नागरिक प्रभाकर ने बेटियों के एडमिशन को लेकर अभियान छेड़ दिया है और स्कूल के बाहर आवाज उठा रहे हैं। वहीं, डीआईओएस बस्ती संजय सिंह ने मामले को गंभीर बताते हुए स्कूल को नोटिस जारी किया है और जांच शुरू कर दी गई है। उन्होंने कहा है कि अगर जांच में भेदभाव की पुष्टि होती है, तो स्कूल की मान्यता रद्द करने से लेकर प्रबंधन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तक की जा सकती है।

UP Education: साइकिल पर टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंचे उस पिता की तस्वीर सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि यह उस सच्चाई का प्रतीक है जहां एक ओर लोग अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं, और दूसरी ओर सिस्टम की लापरवाही और मनमानी उनके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।

नोट -: ( यह खबर समाचार संस्थान आजतक की एक रिपोर्ट के आधार पर लिखी गई है )