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पीलीभीत में वीरांगना अवंतीबाई जयंती पर हेमराज वर्मा का बड़ा ऐलान। अखिलेश यादव के नाम पर सपा सरकार बनने पर अवकाश और प्रतिमा की बात।

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पीलीभीत में उधार सिगरेट को लेकर विवाद खूनी संघर्ष में बदला। बेलचे से हमले में 70 वर्षीय दुकानदार की मौत, पिता-पुत्र समेत 3 आरोपी गिरफ्तार।

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पढ़िए हनुमान “सुन्दरकाण्ड” का एक अंश – माता “सीता” को “बजरंगबली” ने दिलाया था विश्वास

सीता का अपने प्रति अविश्वास हनुमान को अपना तिरस्कार सा लगा। फिर उन्होंने सोचा कि मेरी शक्ति और सामर्थ्य से अपरिचित होने के कारण ही ये ऐसा कह रही हैं। अतः इन्हें यह दिखा देना ही उचित होगा कि मैं अपनी इच्छानुरूप रूप धारण कर सकता हूँ। ऐसा सोचकर वे बुद्धिमान कपिवर उस वृक्ष से नीचे कूद पड़े और सीता जी को विश्वास दिलाने के लिये बढ़ने लगे। क्षणमात्र में उनका शरीर मेरु पर्वत के समान ऊँचा हो गया। वे प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी प्रतीत होने लगे। तत्पश्चात् पर्वत के समान विशालकाय, तांबे के समान लाल मुख तथा वज्र और नख वाले भयानक महाबली वानर वीर हनुमान विदेह नन्दिनी से बोले, “देवि! मुझमें पर्वत, वन, अट्टालिका, चारदीवारी और नागद्वार सहित इस लंकापुरी को रावण के साथ ही उठा ले जाने की शक्ति है। अतः हे विदेह नन्दिनी! आपकी आशंका व्यर्थ है। देवी! आप मेरे साथ चलकर लक्ष्मण सहित श्री रघुनाथ जी का शोक दूर कीजिये।
 
विकराल रूप में बदले थे हनुमान 
 
हनुमान के आश्चर्यजनक रूप को विस्मय से देखती हुई सीता जी बोलीं, “हे पवनसुत! तुम्हारी शक्ति और सामर्थ्य में अब मुझे किसी प्रकार की शंका नहीं रही है। तुम्हारी गति वायु के समान और तेज अग्नि के समान है। किन्तु मैं तुम्हारे प्रस्ताव को स्वीकार करने में असमर्थ हूँ। मैं अपनी इच्छा से अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के शरीर का स्पर्श नहीं कर सकती। मेरे जीवन में मेरे शरीर का स्पर्श केवल एक परपुरुष ने किया है और वह दुष्ट रावण है। जिसने मेरा हरण करते समय मुझे बलात् अपनी गोद में उठा लिया था। उसकी वेदना से मेरा शरीर आज तक जल रहा है। इसका प्रायश्चित तभी होगा जब राघव उस दुष्ट का वध करेंगे। इसी में मेरा प्रतिशोध और उनकी प्रतिष्ठा है।
 
माता सीता की बात सुन कर खुश हुए थे हनुमान 
 
जानकी के मुख से ऐसे युक्तियुक्त वचन सुनकर हनुमान का हृदय गद्-गद् हो गया। वे प्रसन्न होकर बोले, “हे देवि! महान सती साध्वियों को शोभा देने वाले ऐसे शब्द आप जैसी परम पतिव्रता विदुषी ही कह सकती हैं। आपकी दशा का वर्णन मैं श्री रामचन्द्र जी से विस्तारपूर्वक करूँगा और उन्हें शीघ्र ही लंकापुरी पर आक्रमण करने के लिये प्रेरित करूँगा। अब आप मुझे कोई ऐसी निशानी दे दें, जिसे मैं श्री रामचन्द्र जी को देकर आपके जीवित होने का विश्वास दिला सकूँ और उनके अधीर हृदय को धैर्य बँधा सकूँ।
 
माता सीता ने दी थी निशानी 
 
हनुमान के कहने पर सीता जी ने अपना चूड़ामणि खोलकर उन्हें देते हुए कहा, “यह चूड़ामणि तुम उन्हें दे देना। इसे देखते ही उन्हें मेरे साथ-साथ मेरी माताजी और अयोध्यापति महाराज दशरथ का भी स्मरण हो आयेगा। वे इसे भली-भाँति पहचानते हैं। उन्हें मेरा कुशल समाचार देकर लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव को भी मेरी ओर से शुभकामनाएं व्यक्त करना। यहाँ मेरी जो दशा है और मेरे प्रति रावण तथा उसकी क्रूर दासियों का जो व्यवहार है, वह सब तुम अपनी आँखों से देख चुके हो, तुम समस्त विवरण रघुनाथ जी से कह देना। लक्ष्मण से कहना, मैंने तुम्हारे ऊपर अविश्वास करके जो तुम्हें अपने ज्येष्ठ भ्राता के पीछे कटु वचन कह कर भेजा था, उसका मुझे बहुत पश्चाताप है और आज मैं उसी मूर्खता का परिणाम भुगत रही हूँ। पवनसुत! और अधिक मैं क्या कहूँ, तुम स्वयं बुद्धिमान और चतुर हो। जैसा उचित प्रतीत हो वैसा कहना और करना। इसके बाद जानकी के ऐसा कहने पर दोनों हाथ जोड़ कर हनुमान उनसे विदा लेकर चल दिये।
 
                                               “जय सियाराम – जय हनुमान”