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पीलीभीत में उधार सिगरेट को लेकर विवाद खूनी संघर्ष में बदला। बेलचे से हमले में 70 वर्षीय दुकानदार की मौत, पिता-पुत्र समेत 3 आरोपी गिरफ्तार।

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Navratri Special 2023 – पढ़िए “मां काली” की “पावन कथा” और जाने क्यों पड़ा था “कालरात्रि” का नाम

UP Desk – भक्तों और देवी सज्जनों जैसा की आप जानते हो कि वर्तमान में शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों का समय है। जिसमें हम सभी को आदि शक्ति मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों के दर्शन और पूजा अर्चना का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आज नवरात्रि का सातवां दिन है जो मां कालरात्रि के लिए समर्पित है, जिनकी आराधना मात्र से बड़े-बड़े संकट दूर भाग जाते हैं, तो चलिए आज हमारे साथ दर्शन करते हैं मां काली के और जानते हैं कुछ चमत्कार जो हम भी पा सकते हैं। 
मां कालरात्रि का भव्य है स्वरुप 
 
देवी का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि है। मां कालरात्रि का रंग काला है और ये त्रिनेत्रधारी हैं। मां कालरात्रि के गले में कड़कती बिजली की अद्भुत माला है। इनके हाथों में खड्ग और कांटा है और इनका वाहन ‘गधा’ है। मां कालरात्रि को शुभंकरी भी कहते हैं। मां दुर्गा का विकराल रूप हैं मां काली और यह बात सब जानते हैं कि दुष्टों का संहार करने के लिए मां ने यह रूप धारण किया था। मां के इस रूप को धारण करने के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं और उनका व्‍याखान भी मिलता है।
 
आइए जानें मां के इस भयंकर रूप के पीछे की कथा
 
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक एक बार दारुक नाम के असुर ने ब्रह्मा को प्रसन्न किया। उनके द्वारा दिए गए वरदान से वह देवों और ब्राह्मणों को प्रलय की अग्नि के समान दुःख देने लगा। उसने सभी धार्मिक अनुष्ठान बंद करा दिए और स्वर्गलोक में अपना राज्य स्थापित कर लिया। 
 
सभी देवता, ब्रह्मा और विष्णु के धाम पहुंचे। ब्रह्मा जी ने बताया की यह दुष्ट केवल स्त्री द्वारा मारा जाएगा। तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देव स्त्री रूप धर दुष्ट दारुक से लड़ने गए. लेकिन वह दैत्य अत्यंत बलशाली था, उसने उन सभी को परास्त कर भगा दिया। 
 
ब्रह्मा, विष्णु समेत सभी देव भगवान शिव के धाम कैलाश पर्वत पहुंचे तथा उन्हें दैत्य दारुक के विषय में बताया। भगवान शिव ने उनकी बात सुन मां पार्वती की ओर देखा और कहा- हे! कल्याणी जगत के हित के लिए और दुष्ट दारुक के वध के लिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं। यह सुन मां पार्वती मुस्कराई और अपने एक अंश को भगवान शिव में प्रवेश कराया। 
 
मां भगवती का वह अंश भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर उनके कंठ में स्थित विष से अपना आकार धारण करने लगा। विष के प्रभाव से वह काले वर्ण में परिवर्तित हुआ। भगवान शिव ने उस अंश को अपने भीतर महसूस कर अपना तीसरा नेत्र खोला। उनके नेत्र द्वारा भयंकर-विकराल रूपी काले वर्ण वाली मां काली उत्पन्न हुईं। 
 
मां काली के ललाट में तीसरा नेत्र और चन्द्र रेखा थी। कंठ में कराल विष का चिन्ह था और हाथ में त्रिशूल व नाना प्रकार के आभूषण व वस्त्रों से वह सुशोभित थीं। मां काली के भयंकर व विशाल रूप को देख देवता व सिद्ध लोग भागने लगे। 
 
कहा जाता है कि मां काली के केवल हुंकार मात्र से दारुक समेत, सभी असुर सेना जल कर भस्म हो गई। 
 
         “जय हो माँ कालरात्रि”