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प्रदेश का पहला स्किन बैंक खुलेगा हैलट के बर्न वार्ड में

जीएसवीएम हैलट में बन रहे  बर्नवार्ड में स्किन बैंक खोलने का काम चल रहा है। देहदानियों के शरीर की त्वचा यहां पर सुरक्षित रखी जा सकेगी। प्रदेश का यह पहला एक स्किन बैंक होगा । पार्थिव शरीर से निकली त्वचा जले हुए रोगियों के जख्मों के लिए अच्छी ड्रेसिंग के रूप में काम करती है। इससे जख्म बहुत जल्दी भर जाते हैं। ऐसे में 100 फ़ीसदी तक जले रोगियों का जीवन आराम से बचाया जा सकता है।

3 से 5 साल तक सुरक्षित रखी जा सकेगी त्वचा

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभागाध्यक्ष सर्जन डॉक्टर प्रेम शंकर ने बताया कि हैलट में बन रहे नए बर्न वार्ड  का काम इसी साल पूरा हो जाएगा। इसके साथ ही स्किन बैंक खोलने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। 100 फ़ीसदी बर्न रोगियों के लिए दान में मिलने वाली त्वचा जीवनदायनी होती है। दक्षिण भारत में स्किन बैंक खुले हुए हैं। इसके अलावा जयपुर में भी स्किन बैंक संचालित किया जा रहा है। देश का पहला स्किन बैंक 1972 में वाडिया चिल्ड्रन हॉस्पिटल मुंबई में खुला था। स्किन  3 से 5 साल तक सुरक्षित रखी जा सकती है।

जीएसवीएम का हैलट अस्पताल

त्वचा का रिजेक्शन नहीं होता, ब्लड ग्रुप की भी दिक्कत नहीं

डॉक्टर प्रेम शंकर ने बताया कि पार्थिव देह की त्वचा की पतली परत इपी डर्मिस  निकली जाती है। यह ड्रेसिंग पदार्थ की तरह काम करती है। जिससे किसी तरह के रिजेक्शन की दिक्कत भी नहीं होती है। किसी भी ब्लड ग्रुप के पार्थिव शरीर की त्वचा किसी भी ब्लड ग्रुप के व्यक्ति को लगाई जा सकती है। बर्न रोगियों के जख्मों पर त्वचा ना होने से शरीर का फ्लूईड निकलता रहता है। इसमें प्रोटीन भी निकल जाता है। त्वचा की परत लगाने से द्रव्य बाहर नहीं निकल पाता, जख्म भरने लगता है। 2 सप्ताह में रोगी की अपनी त्वचा बनने लगती है और ऊपर से ड्रेसिंग पदार्थ के रूप में लगाई गई दान की त्वचा पपड़ी बनकर निकल जाती है। ऊपर से लगाई गई त्वचा दो सप्ताह तक जिंदा रहती है। देहदानी के निधन के 8 घंटे के अंदर त्वचा की परत निकाल ली जाती है

ऐसा होता है स्किन बैंक

स्किन बैंक भी ब्लड बैंक की तरह ही होता है। यहां त्वचा को एक शीशे में भरकर माइनस तापमान में रखा जाता है। बैंक में 3 से 5 साल तक त्वचा सुरक्षित रखी जा सकती है। त्वचा को रखने से पहले संक्रमण की भी जांच की जाती है।