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पीलीभीत न्यूज़: मासूम अब्बास को RBSK योजना के तहत जन्मजात कटे होंठ का मुफ्त ऑपरेशन। सरकारी पहल से लौटी मुस्कान, गरीब परिवार को मिली नई उम्मीद।

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पीलीभीत में मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना के तहत 86 शिक्षकों को हेल्थ कार्ड वितरित। मिलेगा कैशलेस इलाज और बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा।

शिक्षकों के स्वास्थ्य सुरक्षा कवच को मिली नई ताकत: पीलीभीत में ‘मुख्यमंत्री शिक्षक कैशलेस चिकित्सा योजना’ का शुभारंभ, 86 शिक्षकों…

पीलीभीत को कृषि निर्यात हब बनाने की बड़ी पहल। 27 परियोजनाओं का लोकार्पण, हाईटेक नर्सरी, आधुनिक मंडियां, खेती और किसानों को नई सौगात।

पीलीभीत को मिला कृषि विकास का नया विजन: हाईटेक नर्सरी, एक्सपोर्ट सेंटर और आधुनिक मंडियों से किसानों की बदलेगी तस्वीर…

पीलीभीत, पूरनपुर तराई क्षेत्र के लिए बड़ी खुशखबरी। 26 जुलाई से कासगंज–ऐशबाग एक्सप्रेस शुरू होगी, यात्रियों को बेहतर रेल कनेक्टिविटी सुविधा।

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“योगी जी बचाओ!, घाघरा नदी खाए जात है”

घाघरा की तबाही से दहशत में गांव – पुश्तैनी जमीन और मकान लील रही नदी, बेबस ग्रामीण चीख रहे: “योगी जी, बचाओ!”

अजय देव वर्मा

मांझा कम्हरिया, आलापुर, अंबेडकरनगर

“योगी जी बचाओ!,घाघरा का रौद्र रूप- गांव के सिर पर तबाही का साया

अंबेडकरनगर जिले की आलापुर तहसील में स्थित मांझा कम्हरिया गांव आज घाघरा नदी की कटान से अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। इस गांव के लगभग सौ परिवारों ने पहले अपनी खेती योग्य भूमि को नदी में समाहित होते देखा, और अब उनके पुश्तैनी घरों की दीवारें भी दरकने लगी हैं

घाघरा का पानी अब केवल किनारों को नहीं काट रहा, वह अब सपनों, जीवन और भविष्य को भी निगलने को आतुर है।

“योगी जी बचाओ!, प्रशासन आया… देखा… और चलता बना!

स्थानीय प्रशासन कटान की खबर सुनकर आता जरूर है, लेकिन केवल मौका मुआयना कर लौट जाता है। न कोई बचाव कार्य शुरू हुआ, न ही कोई दीर्घकालिक योजना। ग्रामीणों की पुकारें अब सरकारी कागज़ों में खो रही हैं।

कब तक हम डर-डर कर जिएंगे? क्या हमारे मकान भी घाघरा को सौंप दें?” — गांव के बुजुर्ग बेबसी से पूछते हैं।

बचाओ! बचाओ! – गूंज रहा है गांव का एक ही स्वर

पूरे गांव में अब केवल एक ही स्वर सुनाई देता है —
“योगी जी बचाओ! घाघरा नदी खाए जात है!”
बच्चे, बूढ़े, महिलाएं… सभी नदी के किनारे खड़े होकर भगवान और सरकार दोनों से गुहार लगा रहे हैं।

यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई है, जो उत्तर प्रदेश की नदियों के किनारे बसे हजारों गांवों की नियति बनती जा रही है।

“योगी जी बचाओ!, मिट्टी नहीं- यादें बहा रही है घाघरा!

जिस ज़मीन पर कभी बैल चलाए गए, जहां पीढ़ियों ने झूले डाले, जहां मां ने चूल्हा जलाया, वह आज घाघरा के जलप्रवाह में विलीन हो रही है
यह केवल मिट्टी का कटाव नहीं, संस्कृति, विरासत और पहचान का नुकसान है।

सरकार से बड़ी उम्मीदें, पर कार्रवाई कब?

ग्रामीणों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उम्मीदें हैं। उनका मानना है कि अगर मुख्यमंत्री तक यह दर्द पहुंच जाए, तो वह ज़रूर कुछ ठोस कदम उठाएंगे।
स्थानीय नेताओं की निष्क्रियता पर भी लोग आक्रोशित हैं।

“हम वोट देते हैं, उम्मीद से… लेकिन संकट के समय हमारी सुध कोई नहीं लेता!”

“योगी जी बचाओ!, अब नहीं रुकी तो बचेगा क्या?

मांझा कम्हरिया अब एक और हादसे का इंतजार कर रहा है। अगर जल्द ही कटान रोकने के लिए बोल्डर, स्पर या तटबंध नहीं बनाए गए, तो ये गांव नक्शे से मिट सकता है।
यह केवल एक गांव नहीं, यूपी के सैकड़ों गांवों की आवाज है।

“योगी जी! घाघरा खाए जात है… कुछ कीजिए।”

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