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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, रात में दबिश पर रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: हिस्ट्रीशीटर के घर देर रात नहीं जा सकेगी पुलिस!

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की उस आदत पर कड़ा रुख अपनाया है, जिसमें वह हिस्ट्रीशीटर और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के घरों पर रात के समय बिना किसी वारंट या स्पष्ट कारण के दबिश देती है। कोर्ट ने कहा है कि यह कार्यप्रणाली असंवैधानिक है और व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करती है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से अहम है, बल्कि यह आम लोगों के मानसिक और सामाजिक सम्मान को सुरक्षित रखने का भी एक ठोस कदम है।

अब हिस्ट्रीशीटर भी रात में चैन से सो सकेंगे, पुलिस को नहीं मिलेगी मनमानी की छूट

हाईकोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि अगर कोई व्यक्ति आपराधिक इतिहास रखता भी है, तो इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस उसे दिन-रात मानसिक रूप से प्रताड़ित करती रहे। किसी भी नागरिक को अपने घर में शांति से रहने का हक है, चाहे उसके खिलाफ केस हो या नहीं। पुलिस अब बिना ठोस कानूनी आधार के रात के समय घर में घुसकर दबिश नहीं दे सकती। यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए राहत है, जिनका नाम थाने में दर्ज होने के कारण उन्हें बार-बार परेशान किया जाता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा: बिना वारंट देर रात दबिश निजता का उल्लंघन है

कोर्ट ने यह बात दो टूक कही कि यदि पुलिस के पास वारंट या ठोस कानूनी आधार नहीं है, तो वह किसी के घर में देर रात दबिश नहीं दे सकती। यह सीधे-सीधे नागरिक के निजता के अधिकार (Right to Privacy) का हनन है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, और यह अधिकार किसी भी स्थिति में छीना नहीं जा सकता — यहां तक कि अपराधी के खिलाफ भी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: परिवार को हो रही मानसिक पीड़ा पर कोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा जवाब

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने एक परिवार की पीड़ा रखी गई, जिसमें बताया गया कि पुलिस रात में घर आकर दरवाजा पीटती है, घरवालों को जगा देती है और यह हरकत बार-बार दोहराई जाती है। इससे बच्चों और बुजुर्गों की नींद और मानसिक स्थिति पर असर पड़ रहा है। हाईकोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया और सरकार व संबंधित पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है।

1964 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला देकर कहा – संविधान सभी को बराबरी का अधिकार देता है

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1964)’ का हवाला दिया। उस केस में भी यह साफ किया गया था कि डोमिसिलरी विजिट यानी रात में घर की निगरानी या दबिश देना व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों के खिलाफ है। कोर्ट ने इस फैसले को दोहराते हुए कहा कि कानून सबके लिए बराबर है — चाहे वह आम नागरिक हो या हिस्ट्रीशीटर।

पुलिस की ‘डोमिसिलरी विजिट’ प्रणाली पर रोक की ओर पहला कदम

‘डोमिसिलरी विजिट’ वो प्रक्रिया होती है जिसमें पुलिस रात में आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों के घर पर जाती है, दस्तक देती है और जांच का नाटक करती है। यह प्रक्रिया अक्सर सिर्फ डर पैदा करने के लिए होती है, जिसमें किसी ठोस जांच या कार्रवाई की मंशा नहीं होती। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद इस प्रणाली पर पुनर्विचार की जरूरत पड़ेगी और पुलिस को नए सिरे से व्यवहारिक गाइडलाइन अपनानी होंगी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: प्रयागराज केस बना मिसाल, अब कानून का सहारा ले सकेंगे पीड़ित

जिस केस पर हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया, वह प्रयागराज का था जहां एक हिस्ट्रीशीटर ने याचिका दायर की थी। उसने बताया कि पुलिस उसे बार-बार रात में बिना सूचना के परेशान करती है। कोर्ट ने उस याचिका को गंभीरता से लिया और इसे निजता और नागरिक अधिकारों से जोड़ते हुए मिसाल बना दिया। अब यूपी ही नहीं, पूरे देश में ऐसे हजारों पीड़ित नागरिक इस फैसले को आधार बनाकर अपनी सुरक्षा की मांग कर सकते हैं।

आदेश की तारीख 8 जुलाई 2025, अगली सुनवाई 11 जुलाई को

यह ऐतिहासिक फैसला 8 जुलाई 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिया गया, जिसमें कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर प्रयागराज, उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित थाने को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। इस केस की अगली सुनवाई 11 जुलाई 2025 को होगी, जिसमें सरकार और पुलिस के पक्ष को सुना जाएगा और संभावना है कि पुलिस की दबिश प्रक्रिया के लिए स्थायी गाइडलाइन तय कर दी जाए।

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