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Pilibhit: दरिंदा मौलाना गिरफ्तार-बच्ची से मदरसे में छेड़छाड़, पूरनपुर दहला

एक हैवान दो बार – पूरनपुर की मासूमियत पर फिर पड़ी कलंक की छाया, कब जागेगा समाज?

पूरनपुर (पीलीभीत)
जब भी कोई बच्चा किसी धार्मिक संस्था या स्कूल में प्रवेश करता है, मां-बाप की आंखों में एक उम्मीद होती है – “अब यह बच्चा अच्छा इंसान बनेगा।” लेकिन क्या हो जब वही जगह किसी भेड़िए की खोह बन जाए? पूरनपुर के एक मदरसे में घटी यह दिल दहला देने वाली घटना सिर्फ एक बच्ची की कहानी नहीं, यह पूरे समाज के लिए एक आईना है।

वही मौलाना, वही दरिंदगी – 24 साल बाद फिर वही जुर्म

मोहल्ला रजागंज देहात के एक मदरसे में पढ़ने गई 10 साल की मासूम बच्ची के साथ मौलाना हाफिज फिरोज खान ने बृहस्पतिवार को छेड़छाड़ की। बच्ची ने किसी तरह खुद को बचाया और भागकर मां को सब बताया। पुलिस ने फौरन कार्रवाई की, लेकिन जो सच सामने आया, वह समाज की चुप्पी पर करारा तमाचा है।

क्योंकि यह वही मौलाना है, जिसने 12 दिसंबर 2001 को भी एक 7 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया था। तब कोर्ट ने उसे 10 साल की सजा सुनाई थी। जेल में साढ़े सात साल अच्छे व्यवहार की वजह से काटे और फिर वापस समाज में आकर वही घिनौना काम दोहराया।

समाज कब समझेगा – मौलाना की दाढ़ी नहीं, इंसान की नीयत देखिए!

आज भी हमारे समाज में ऐसे मामलों को लेकर ‘इज्जत के डर’, ‘धार्मिक संकोच’ या ‘जातीय चुप्पी’ को ढाल बना लिया जाता है। लेकिन सच यही है – दरिंदा, दरिंदा होता है, चाहे वह किसी भी वेशभूषा में क्यों न हो।

क्या किसी ने कभी यह सवाल पूछा कि 24 साल पहले जिस पर मासूम से बलात्कार का आरोप साबित हुआ था, वह दोबारा बच्चों को पढ़ाने के लिए कैसे मदरसे में नियुक्त हो गया?
क्या हम इतने उदार हैं कि भेड़ियों को मासूमों के बीच छोड़ देते हैं, बस इसलिए कि उसने ‘अच्छा व्यवहार’ दिखाया था?

जेल से बाहर आए अपराधी – क्या समाज तैयार है उन्हें दोबारा स्वीकारने के लिए?

यह घटना यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या जेल सच में किसी को सुधार सकती है? या फिर यह महज एक विश्रामगृह बन गई है, जहां से बाहर आने के बाद अपराधी पहले से ज्यादा निर्भय हो जाते हैं?

मौलाना हाफिज फिरोज खान की गिरफ्तारी यह दिखाती है कि कानून भले जाग रहा हो, पर समाज अभी भी सो रहा है।

बच्चियों की सुरक्षा सिर्फ सरकार की नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी है

हर स्कूल, मदरसे और धार्मिक संस्था में सख्त निगरानी, अनिवार्य चरित्र सत्यापन, और CCTV निगरानी जैसी व्यवस्थाएं लागू होनी चाहिए। साथ ही, मां-बाप को बच्चों को गुड और बैड टच के बारे में शिक्षित करना आज समय की मांग है।

यह घटना सिर्फ पुलिस या कोर्ट का विषय नहीं, यह हर मां-बाप, हर शिक्षक और हर धार्मिक गुरु की आत्मा को झकझोरने वाली है।

अब सवाल उठाइए – चुप रहना अब अपराध से कम नहीं

क्या हम दोबारा ऐसे दरिंदों को मौका देंगे?

क्या ‘अच्छे व्यवहार’ के नाम पर सब माफ है?

क्या अब भी हम अपने बच्चों को आंख मूंदकर ऐसे संस्थानों में भेजेंगे?

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