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Dharmik News: भगवान सूर्यदेव की शिला से बने अस्त्र-शस्त्रों से हुआ दैत्यों का संहार, पढ़िए वाराणसी का पौराणिक प्रसंग

भारतीय पुराणों में वर्णित अनेक प्रसंग हमें यह बताते हैं कि देवताओं और दैत्यों के बीच संघर्ष सदैव चलता रहा। इसी कड़ी में एक रोचक कथा भगवान सूर्यदेव से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि बलिष्ठ दैत्यों द्वारा देवताओं को बार-बार युद्ध में पराजित कर दिया जाता था। उनके अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने सूर्यदेव की आराधना करने का निश्चय किया।

जानिए प्रसन्न होने के बाद सूर्यदेव ने उठाया था कौन सा कदम 

सूर्यदेव ने उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर अपने शरीर से एक अद्भुत शिला उत्पन्न की और देवताओं को दी। उन्होंने निर्देश दिया कि इस शिला को लेकर वाराणसी जाओ और विश्वकर्मा से शास्त्रोक्त विधि से मेरी मूर्ति का निर्माण करवाओ। साथ ही, मूर्ति बनाने के दौरान जो प्रस्तरखण्ड (पत्थर के टुकड़े) निकलेंगे, वे तुम्हारे लिए शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र बनेंगे।

देवताओं ने इस तरह से किया था आदेश का पालन 

देवताओं ने सूर्यदेव के आदेश का पालन किया। वाराणसी पहुँचकर उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा सूर्य की भव्य मूर्ति का निर्माण कराया। मूर्ति तराशते समय जो पत्थर के टुकड़े निकले, उनसे दिव्य अस्त्र-शस्त्र बने। इन दिव्य शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवताओं ने पुनः दैत्यों का सामना किया। इस बार दैत्य सूर्यदेव की कृपा से निर्मित अस्त्र-शस्त्रों के आघात को सहन न कर सके और पराजित होकर चारों ओर भाग गए।

फिर धार्मिक स्थान बना था केंद्र 

मूर्ति गढ़ते समय जहाँ गड्ढा बना, वह स्थान उत्तरमानस या उत्तरार्ककुंड कहलाया। यही स्थान बाद में धार्मिक आस्था का केंद्र बन गया। कहा जाता है कि कालांतर में एक अनाथ ब्राह्मण-कन्या ने इसी उत्तरार्क सूर्य के समीप कठोर तपस्या की।

देवों के देव्ए महादेव ने दिया था वरदान 

एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती वहाँ भ्रमण करते हुए पहुँचे। कन्या की तपस्या और उसकी दीनता देखकर दयामयी पार्वती ने भगवान शिव से कहा – प्रभो, यह ब्राह्मण कन्या बंधु-बांधवों से हीन है, अतः इसे कोई वरदान देकर अनुग्रहीत करें।

इस प्रकार यह कथा न केवल देवताओं और दैत्यों के संघर्ष को दर्शाती है, बल्कि वाराणसी में स्थित उत्तरार्ककुंड और सूर्यदेव की आराधना के महत्व को भी प्रकट करती है।

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