Partition Horrors Remembrance Day: जब आजादी मिली, लाखों घर उजड़ गए… पीलीभीत में मौन जुलूस ने याद दिलाया बंटवारे का वो दर्द
ड्रमण्ड कॉलेज से उपाधि महाविद्यालय तक निकला मौन जुलूस, प्रदर्शनी और लघु फिल्म ने सामने रखी 1947 की दर्दनाक दास्तान, राज्यमंत्री संजय सिंह गंगवार बोले—बंटवारे का दर्द कभी भुलाया नहीं जा सकता
पीलीभीत। देश आजादी का जश्न मनाने की तैयारी करता है, तिरंगा आसमान में लहराता है और हर तरफ राष्ट्रगान की गूंज सुनाई देती है। लेकिन इसी आजादी की दहलीज पर इतिहास का एक ऐसा पन्ना भी है, जिसे याद करते ही लाखों परिवारों के दर्द की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है। 1947 का विभाजन… वह समय जब किसी ने अपना घर खोया, किसी ने जमीन, किसी ने अपना शहर और किसी ने अपनों को हमेशा के लिए।
इसी दर्द, विस्थापन और उन अनगिनत परिवारों की पीड़ा को याद करने के लिए पीलीभीत में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर जिला प्रशासन की ओर से भावपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। ड्रमण्ड राजकीय इंटर कॉलेज से उपाधि महाविद्यालय तक निकला मौन जुलूस केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन लोगों को श्रद्धांजलि था, जिन्होंने इतिहास के उस भयावह दौर में अपना सब कुछ खो दिया।
Partition Horrors Remembrance Day: कदम खामोश थे, लेकिन इतिहास बोल रहा था
ड्रमण्ड राजकीय इंटर कॉलेज से शुरू हुआ मौन जुलूस सुनगढ़ी चौराहा होते हुए उपाधि महाविद्यालय पहुंचा। जुलूस में स्कूली बच्चों, अधिकारियों और जनपद के गणमान्य लोगों ने हिस्सा लिया।
हाथों में तिरंगा था, लेकिन चेहरों पर उत्सव की जगह गंभीरता थी। खामोश कदम उस इतिहास की गवाही दे रहे थे, जिसमें लाखों लोग अपने ही घरों से बेघर हो गए थे।
सोचिए… जिस घर में पीढ़ियों ने जिंदगी बिताई हो, जिस आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजी हों, जिस जमीन को अपना समझकर जीवन गुजारा हो—उसे अचानक छोड़कर अनजान रास्ते पर निकल जाना कैसा रहा होगा?
विभाजन की त्रासदी को समझने के लिए शायद यही सवाल काफी है।
आखिर ‘विभाजन विभीषिका’ का अर्थ क्या है?
Partition Horrors Remembrance Day: ‘विभाजन’ यानी देश का बंटवारा और ‘विभीषिका’ यानी ऐसा भयावह दौर, जिसने इंसानी जिंदगी को झकझोर कर रख दिया।
1947 में भारत की आजादी के साथ देश का विभाजन हुआ। सीमाएं बदलीं और देखते ही देखते करोड़ों लोगों की जिंदगी भी बदल गई। बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर-बार छोड़कर दूसरी जगहों पर जाना पड़ा। हिंसा और अव्यवस्था ने इस पलायन को और भयावह बना दिया।
किसी के पास सामान समेटने का समय नहीं था, किसी को यह पता नहीं था कि वह जिस घर से निकल रहा है, वहां कभी लौट भी पाएगा या नहीं।
आजादी मिली, लेकिन उसके साथ विस्थापन का ऐसा दर्द आया जिसकी टीस पीढ़ियों तक महसूस की गई।
इसीलिए 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में याद किया जाता है, ताकि इतिहास के उस दर्द को भुलाया न जाए और आने वाली पीढ़ियां समझ सकें कि नफरत और हिंसा की कीमत कितनी भयावह होती है।
Partition Horrors Remembrance Day: उपाधि महाविद्यालय की प्रदर्शनी में दिखाई दी उस दौर की तस्वीर
मौन जुलूस के बाद उपाधि महाविद्यालय में जिला प्रशासन की ओर से अभिलेख एवं पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई। प्रदर्शनी में भारत विभाजन, मानव विस्थापन और मजबूरी में पलायन से जुड़ी सामग्री, पोस्टर और पुस्तकें प्रदर्शित की गईं।
इन तस्वीरों और दस्तावेजों को देखने का अनुभव केवल इतिहास पढ़ने जैसा नहीं था। हर तस्वीर के पीछे एक परिवार की कहानी थी, हर दस्तावेज के पीछे किसी के उजड़ने का दर्द और हर पलायन के पीछे एक ऐसा जीवन था जिसे दोबारा शून्य से शुरू करना पड़ा।
यही इस प्रदर्शनी की सबसे बड़ी खूबी रही—इतिहास को किताब के पन्नों से निकालकर लोगों की आंखों के सामने ला देना।
लघु फिल्म ने दिखाई बंटवारे की पीड़ा
कार्यक्रम में राज्यमंत्री गन्ना विकास एवं चीनी मिलें संजय सिंह गंगवार ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और विभाजन की त्रासदी पर आधारित लघु फिल्म देखी।
फिल्म के जरिए उस दौर के विस्थापन, हिंसा और परिवारों की पीड़ा को सामने रखा गया। कई बार इतिहास के आंकड़े हमें केवल संख्या दिखाई देते हैं, लेकिन जब उसी इतिहास को किसी परिवार की कहानी, किसी मां की आंखों और किसी बच्चे के बिछड़ने की पीड़ा के रूप में देखा जाए तो उसका अर्थ कहीं ज्यादा गहरा हो जाता है।
यही वजह है कि ऐसी लघु फिल्में और प्रदर्शनियां नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बनती हैं।
राज्यमंत्री बोले—बंटवारे का दर्द कभी भुलाया नहीं जा सकता
राज्यमंत्री संजय सिंह गंगवार ने कहा कि देश के बंटवारे का दर्द कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से लाखों बहन-भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
उनका संदेश केवल अतीत को याद करने तक सीमित नहीं था। विभाजन की कहानी आज के समाज के लिए भी एक चेतावनी है—नफरत की शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन उसका परिणाम बहुत बड़ा और विनाशकारी हो सकता है।
बच्चों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को बनाया खास
कार्यक्रम में ड्रमण्ड राजकीय इंटर कॉलेज के बच्चों की भागीदारी खास रही। जिन बच्चों ने तिरंगे के साथ मौन जुलूस निकाला, उनके लिए यह शायद इतिहास का वह अध्याय था जिसे उन्होंने किताबों में पढ़ा था, लेकिन प्रदर्शनी और फिल्म के माध्यम से उसकी पीड़ा को महसूस करने का अवसर मिला।
आज की पीढ़ी के लिए विभाजन को याद करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जिन लोगों ने 1947 देखा था, उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। आने वाली पीढ़ियों तक उस दौर की स्मृतियां पहुंचाना अब केवल परिवारों की नहीं, बल्कि समाज और संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है।
एक सवाल छोड़ गया मौन जुलूस…
पीलीभीत की सड़कों पर निकला वह जुलूस कुछ कह नहीं रहा था, लेकिन शायद उसका मौन सबसे बड़ा संदेश दे रहा था।
क्या किसी इंसान से उसका घर छीनना आसान है? क्या किसी परिवार को उसकी जड़ों से अलग किया जा सकता है? और क्या नफरत की आग में खोई हुई जिंदगी कभी वापस लाई जा सकती है?
इन सवालों का जवाब 1947 का इतिहास आज भी देता है।
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस इसलिए केवल शोक का दिन नहीं है। यह स्मरण का दिन है, आत्ममंथन का दिन है और संकल्प का दिन है।
संकल्प इस बात का कि इतिहास को भुलाया नहीं जाएगा, लेकिन इतिहास की गलतियों को दोहराया भी नहीं जाएगा।
श्रद्धांजलि के साथ एक बड़ा संदेश
पीलीभीत में आयोजित मौन जुलूस, अभिलेख एवं पुस्तक प्रदर्शनी और लघु फिल्म का मूल संदेश यही रहा—आजादी की कीमत को समझिए, विभाजन के दर्द को याद रखिए और आने वाली पीढ़ियों को बताइए कि देश की एकता और सामाजिक सद्भाव कितने अनमोल हैं।
कार्यक्रम में मुख्य विकास अधिकारी सतीश प्रसाद मिश्र, अपर जिलाधिकारी (वि./रा.) प्रसून द्विवेदी, नगर मजिस्ट्रेट, जिला विकास अधिकारी, डीसी मनरेगा, उपायुक्त स्वतः रोजगार, परियोजना निदेशक, उप जिलाधिकारी सदर, क्षेत्राधिकारी, उपाधि महाविद्यालय के प्राचार्य, नायब तहसीलदार सहित अन्य अधिकारी, गणमान्य नागरिक और स्कूली बच्चे मौजूद रहे।
मौन जुलूस खत्म हो गया, प्रदर्शनी भी समाप्त हो जाएगी, लेकिन 1947 का वह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हम इतिहास के उस दर्द से इतना सीख पाए हैं कि ऐसी त्रासदी दोबारा कभी न हो?