Trump 100% Tariff India: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर कड़े प्रतिबंधों वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसका नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ है। कानून के तहत रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल या गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर अमेरिका 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, इसलिए इस कानून को भारत के लिए खास तौर पर अहम माना जा रहा है। हालांकि, अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100% टैरिफ तुरंत लागू हो गया है; कानून ऐसी अधिकतम दर लगाने का प्रावधान करता है।
ट्रंप ने किस कानून पर साइन किया और क्या बदलेगा?
अमेरिकी संसद के सीनेट ने इस कानून को अगस्त में 86-11 वोट से पास किया था। इसके बाद हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 16 सितंबर को 262-159 वोट से इसे मंजूरी दी। 18 सितंबर 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून बना दिया।
इस कानून का मुख्य निशाना रूस की ऊर्जा और रक्षा से होने वाली कमाई को कम करना है। इसमें रूस के अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों, ऊर्जा क्षेत्र, रक्षा ढांचे और उन नेटवर्क पर कार्रवाई का प्रावधान है जो प्रतिबंधों से बचकर रूसी तेल की बिक्री में मदद करते हैं।
भारत पर 100% टैरिफ का मतलब क्या है?
यहां एक बात समझना जरूरी है। कानून के लागू होने का मतलब यह नहीं है कि भारत के हर सामान पर सीधे 100% टैरिफ लग गया है। कानून के तहत पात्र देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।
इसके लिए रूस से तेल या गैस खरीदने वाले देशों को कानून में तय मानदंडों के आधार पर देखा जाएगा। कानून में सबसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदारों की सूची को समय-समय पर दोबारा देखने का प्रावधान भी है।
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की नजर
कानून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों से जुड़ा है। इसमें रूस के सबसे बड़े ऊर्जा खरीदारों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की व्यवस्था की गई है।
आपके दिए विवरण के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को संभावित प्रभावित देशों में रखा गया है। हालांकि कानूनी प्रक्रिया में यह सूची स्थायी नहीं है। कानून के तहत अमेरिकी प्रशासन को तय अवधि के बाद रूस से ऊर्जा आयात करने वाले शीर्ष देशों का दोबारा आकलन करना होगा।
हर 180 दिन में हो सकता है आकलन
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि यानी USTR को आगे चलकर रूस से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों का आकलन करना होगा। कानून में 180 दिन के अंतराल पर सूची की समीक्षा का प्रावधान है।
इसका मतलब है कि रूस से ऊर्जा खरीद का पैटर्न बदलने पर प्रभावित देशों की स्थिति भी बदल सकती है।
भारत रूस से इतना तेल क्यों खरीदता है?
भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के बड़े देशों में शामिल है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद काफी बढ़ाई।
रूस सस्ता तेल बेच रहा था
2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए। इसके बाद रूस ने भारत और चीन जैसे देशों को कई बार बाजार की तुलना में आकर्षक कीमतों पर कच्चा तेल उपलब्ध कराया।
भारत ने इसी वजह से रूस से तेल खरीद बढ़ाई। युद्ध से पहले रूस भारत के प्रमुख तेल सप्लायरों में नहीं था, लेकिन 2022-23 में वह भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया।
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा तेल आयात करता है
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 85% से ज्यादा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में जहां तेल बेहतर कीमत पर उपलब्ध होता है, भारतीय रिफाइनरियां वहां से खरीद बढ़ा सकती हैं।
आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक भारत अब अपनी जरूरत का 40% से ज्यादा कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है। इसी वजह से रूस के तेल पर अमेरिकी दबाव का भारत पर सीधा असर पड़ने की संभावना चर्चा में है।
भारतीय रिफाइनरियों को कैसे फायदा होता है?
रिलायंस, इंडियन ऑयल और नायरा एनर्जी जैसी भारतीय रिफाइनरियां कच्चे तेल को खरीदकर उसे पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं।
सस्ता कच्चा तेल मिलने पर रिफाइनिंग मार्जिन बेहतर हो सकता है। इन उत्पादों से भारत की घरेलू जरूरतें पूरी होती हैं और कुछ पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी किया जाता है।
भारत दूसरे देशों को पेट्रोलियम उत्पाद बेचता है
भारत रूस से अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल खरीदकर उसे अपनी रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है। इसके बाद उससे तैयार पेट्रोलियम उत्पादों को घरेलू बाजार के साथ-साथ दूसरे देशों को भी बेचा जा सकता है।
इस वैल्यू एडिशन से भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों को मार्जिन या मुनाफा मिल सकता है।
नोट: यूक्रेन युद्ध से पहले भारत सबसे ज्यादा कच्चा तेल इराक से खरीदता था।
अगर भारत रूस से तेल खरीदता रहा तो क्या होगा?
अगर भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिकी कानून के तहत भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो सबसे सीधा दबाव भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर पड़ सकता है।
भारतीय सामान अमेरिका में महंगा हो सकता है
अगर भारतीय सामान पर भारी अतिरिक्त टैरिफ लगता है तो अमेरिकी बाजार में उसकी कीमत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों से सामान लेने की कोशिश कर सकते हैं।
बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको और चीन जैसे देश कुछ क्षेत्रों में भारतीय उत्पादों के विकल्प बन सकते हैं।
किन भारतीय सेक्टरों पर असर पड़ सकता है?
टैरिफ बढ़ने की स्थिति में टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद और केमिकल्स जैसे निर्यात क्षेत्रों पर दबाव पड़ सकता है।
हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका भारत के किन उत्पादों पर कितनी दर लागू करता है और भारतीय कंपनियां कीमत, सप्लाई चेन और दूसरे बाजारों के जरिए कितना समायोजन कर पाती हैं।
अगर भारत रूस से तेल खरीदना कम कर दे तो?
दूसरी स्थिति यह होगी कि भारत अमेरिकी दबाव के बीच रूस से कच्चे तेल की खरीद कम कर दे और दूसरे देशों से ज्यादा तेल खरीदे।
दूसरे देशों से तेल महंगा पड़ सकता है
भारत रूस के अलावा इराक, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और कतर से भी कच्चा तेल खरीदता है। इसके अलावा नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और अमेरिका भी भारत के तेल सप्लायरों में शामिल हैं।
अगर रूसी तेल की जगह इन बाजारों से महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़े, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत बढ़ सकती है।
इसका असर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और रिफाइनिंग मार्जिन पर पड़ सकता है। हालांकि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत पर असर केवल कच्चे तेल की कीमत से तय नहीं होता; टैक्स, रिफाइनिंग लागत, रुपये की विनिमय दर और अन्य बाजार स्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
अमेरिका और भारत के बीच कितना व्यापार है?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार काफी बड़ा है। आपके दिए 2025 के आंकड़ों के मुताबिक दोनों देशों के बीच कुल ट्रेड करीब ₹12.64 लाख करोड़ था।
अमेरिका से भारत आने वाला सामान
अमेरिका से भारत को प्रमुख रूप से कच्चा तेल, पेट्रोलियम, कोयला, हीरे और विमान/अंतरिक्ष यान के पुर्जे जैसे सामान निर्यात किए जाते हैं।
आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका से भारत का निर्यात करीब ₹4.26 लाख करोड़ था।
भारत से अमेरिका जाने वाला सामान
भारत से अमेरिका को फार्मास्यूटिकल्स, टेलीकॉम डिवाइस, ज्वेलरी, पेट्रोलियम और कपड़ों जैसे उत्पाद निर्यात किए जाते हैं।
आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक भारत से अमेरिका का निर्यात करीब ₹8.38 लाख करोड़ था।
अमेरिकी Census Bureau के 2025 के आधिकारिक goods-trade आंकड़ों में अमेरिका ने भारत से करीब $103.8 अरब का माल आयात किया और भारत को करीब $45.4 अरब का माल निर्यात किया।
रूस के खिलाफ सिर्फ तेल पर ही कार्रवाई नहीं
यह कानून सिर्फ रूसी तेल खरीदने वाले देशों तक सीमित नहीं है। इसमें रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और रूसी नेतृत्व से जुड़े लोगों पर प्रतिबंधों का प्रावधान भी है।
रूस के ‘शैडो फ्लीट’ पर भी कार्रवाई
रूस के ऐसे टैंकरों और उनसे जुड़े नेटवर्क को ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचते हुए रूसी तेल को दूसरे देशों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है।
नए कानून में ऐसे प्रतिबंधों से बचने वाले नेटवर्क और रूसी ऊर्जा कारोबार से जुड़े लोगों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है।
रूस के सामान पर 500% तक टैरिफ
कानून का एक और बड़ा प्रावधान रूस से अमेरिका आने वाले सामान से जुड़ा है। इसमें राष्ट्रपति को रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगाने की शक्ति दी गई है।
यह प्रावधान 100% वाले उन टैरिफ से अलग है, जो रूस की ऊर्जा खरीद से जुड़े दूसरे देशों के सामान पर लागू हो सकते हैं।
ईरान के साथ व्यापार करने वाली कंपनियों पर भी दबाव
कानून का दूसरा हिस्सा ईरान से जुड़ा है। इसके तहत 1996 के ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ को पांच साल के लिए बढ़ाया गया है।
इस कानून का इस्तेमाल ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों से जुड़े कारोबार पर प्रतिबंध लगाने के लिए किया जाता है।
यूरोपीय देशों के लिए क्या प्रावधान है?
रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ देशों को भी कानून के दायरे में रखा गया है। हालांकि कानून में उन देशों के लिए छूट का प्रावधान है जिनका रूसी गैस आयात रूस के कुल गैस निर्यात के 15% से कम है और जो रूस पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं।
आपके दिए विवरण के मुताबिक चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम जैसे देश रूसी गैस खरीद के संदर्भ में चर्चा में हैं। वहीं 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से राहत देने की बात भी सामने आई है, क्योंकि उनकी रूसी गैस पर निर्भरता अपेक्षाकृत कम है और वे इसे घटाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।
डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा है कि कानून का निशाना यूरोपीय सहयोगी नहीं, बल्कि वे देश हैं जो रूसी तेल कारोबार को महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा दे रहे हैं।
अमेरिका अभी इन देशों पर कितना टैरिफ लगा रहा है?
आपके दिए आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान स्थिति इस तरह बताई गई है:
| देश | मौजूदा टैरिफ |
|---|---|
| चीन | 34% |
| भारत | 18% |
| स्लोवाकिया | 10% |
| हंगरी | 10% |
| अजरबैजान | 10% |
यह आंकड़े मौजूदा अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था के संदर्भ में हैं। नए रूस-तेल कानून के तहत संभावित 100% तक अतिरिक्त टैरिफ को इनके साथ अलग से समझना जरूरी है। यानी 100% की अधिकतम दर को सीधे मौजूदा दर का नया कुल आंकड़ा मानना सही नहीं होगा; कानून के तहत लगाए जाने वाले शुल्क अन्य लागू शुल्कों के ऊपर जुड़ सकते हैं।
भारत के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां
इस पूरे मामले में भारत के सामने मूल रूप से दो रास्तों का सवाल है।
एक तरफ रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना भारत की ऊर्जा लागत और रिफाइनिंग कारोबार के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत के रूसी ऊर्जा आयात को देखते हुए भारी अतिरिक्त टैरिफ का इस्तेमाल कर सकता है।
अगर भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है और अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारत के अमेरिकी बाजार वाले निर्यात पर दबाव आ सकता है।
वहीं अगर भारत रूसी तेल की खरीद तेजी से घटाता है, तो उसे दूसरे सप्लायरों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिसकी लागत अलग हो सकती है।
यानी इस कानून का असर सिर्फ तेल खरीद तक सीमित नहीं है। इसका संबंध भारत के निर्यात, रिफाइनिंग कारोबार, ऊर्जा लागत और अमेरिका-भारत व्यापार से भी जुड़ सकता है। आगे सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अमेरिकी प्रशासन भारत को किस सूची में रखता है और वास्तविक अतिरिक्त टैरिफ की दर कितनी तय करता है।
I have started working as a crime reporter in 2011 for a daily local newspaper named ‘Khusro Mail’. I have also worked for many news organization such as Public Vibe app and Oneindia Hindi news portal. Now I am working as Editor In Chief for Rocket Post Bharat (rocketpostbharat.com).